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समुद्र, चांद और सूरज का लाल गोला
“समुद्र पर काला अंधेरा फैला है, हहराती लहरें हैं। सिर्फ समुद्र की लहरों के सफेद झाग दिखाई पड़ते हैं। निरंतर …
पोल्युशन का सलूशन
“अस्तित्वगत त्रयों की जरूरतें व्यक्ति और समाज के संबंध को आकार देती हैं। शरीर को कसरत चाहिए, चेतना को ज्ञान, …
इन दिनों : सागर होता आदमी
“मनुष्य में संभावनाएँ बहुत हैं। वह बहुत तरल होता है। उसमें संवेदनाएं बहती रहती हैं, इसलिए उसमें बदलाव की अपार …
मैं रिपब्लिक हूँ
“गणतंत्र वह व्यवस्था है, जिसमें सत्ता किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि जनता की सामूहिक चेतना और सहमति की होती है। …
इन दिनों : चिंता और चिंतन
“चिंता होती है, तभी चिंतन होता है। चिंता तात्कालिक स्थितियों से जुड़ी होती है और चिंतन चिंता की एक समझ …
इन दिनों : सफर के क्षण
“यह दुनिया आज नदी, सागर और जंगल के खिलाफ खड़ी है। जिन कारकों से दुनिया का सृजन हुआ है, आज …
ना जी-राम-जी, ना मनरेगा
“क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि सिर्फ़ हमारा दिया आयकर सीधा स्थानीय इकाई को मिले, हमारे वार्ड और को …
इन दिनों : अधूरे अनुभवों के सत्य-असत्य
“गोवा के शहर और गाँव में बहुत अंतर नहीं है। बस या कार से जब आप चलेंगे तो स्थानीय घरों …
धर्म का धरना
“जब धर्म गुरुओं को भी हड़ताल करने की नौबत आ जाए, तब तो हमें इस भ्रम से बाहर आ जाना …
इन दिनों : सफर और सांस्कृतिक उदात्तता
“भारत में तरह-तरह के रजवाड़े हुए और उनकी आपसी लड़ाई हुई। उनके बीच के अंतर्विरोध और संघर्ष ने बाहरी लोगों …
अर्थ, बाज़ार और सरकार
अर्थशास्त्र की बुनियाद अभाव पर टिकी है, और वाणिज्यशास्त्र का आधार व्यापार पर। आइए! समझते हैं कैसे? इस अध्याय में …
इन दिनों : मंदिरों की ऊँचाई और असली हिन्दुस्तान
“पंडितों ने भी गजब कहर बरपा रखा है। ठंड है तो मंदिरों के देवता काँपने लगते हैं। पंडित ऊनी कपड़े …












