इन दिनों : जाति-श्रेष्ठता और राष्ट्र की छाती से बहते लहू

“हम एक अँधेरी गुफा में धँसते जा रहे हैं, जहाँ अपनी मौत का ही उत्सव मनाने की तैयारी कर रहे हैं।” – इसी आलेख से