पराधीन शिक्षक : नौकरशाही वर्चस्व और शिक्षकीय स्वायत्तता का संकट
“राज्य को शिक्षक से एक वैचारिक कार्य — सहमति, अनुशासन और सामाजिक व्यवस्था की वैधता का निर्माण— चाहिए। परंतु वह उसे उसी बिना उत्पादक योगदान के आर्थिक लाभ निचोरने वाले नौकरशाही ढाँचे के अधीन रखता है, जो अर्थव्यवस्था के अन्य निम्न-वेतन संविदा श्रम को नियंत्रित करता है।” – इसी आलेख से
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