जब 12 मई, 2026 को NEET परीक्षा रद्द की गई, तब राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) के महानिदेशक ने इस निर्णय को उचित ठहराते हुए कहा कि सच्चाई को सामने लाना आवश्यक था, भले ही यह छात्रों और अभिभावकों के लिए एक “कठिन निर्णय” हो। दुर्भाग्य से — और यह इस संकट के प्रति राज्य की उदासीनता का स्पष्ट संकेत है — छात्रों के लिए प्रश्नपत्र लीक होने का यह पहला अनुभव नहीं है।
2024 में भी एक संगठित गिरोह द्वारा प्रश्नपत्र लीक किया गया था, जिससे परीक्षा की पवित्रता और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठे थे। इससे पहले 2018 में CBSE के प्रश्नपत्र लीक हुए थे; 2017 में स्टाफ सिलेक्शन कमीशन (SSC) की परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक हुए; और 2015 में अखिल भारतीय प्री-मेडिकल टेस्ट (AIPMT) को प्रक्रिया से समझौता हो जाने के कारण रद्द करना पड़ा था।
इसके अतिरिक्त विभिन्न राज्यों से भी अनेक उदाहरण सामने आते रहे हैं। उत्तर प्रदेश में कांस्टेबल भर्ती परीक्षा, मध्य प्रदेश का व्यापम घोटाला, राजस्थान और अन्य कई राज्यों की भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाएँ इस समस्या की व्यापकता को दिखाती हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि सत्ता में कोई भी राजनीतिक दल क्यों न हो, इस प्रकार की उदासीनता लगातार बनी रहती है।
सरकारें हमेशा वादे करती रही हैं और कानून भी बनाती रही हैं, लेकिन प्रश्नपत्र लीक की घटनाएँ बिना रुके जारी हैं। जाँच और गिरफ्तारियाँ इसका समाधान नहीं हैं, क्योंकि यदि वे समाधान होतीं, तो अब तक यह समस्या समाप्त हो चुकी होती।
क्या किसी सरकार ने कभी यह समझने की कोशिश की है कि इन परीक्षाओं में शामिल होने वाले युवाओं के भीतर इतनी बेचैनी और हताशा क्यों है? जब तक इस संकट को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर देखा जाएगा और उससे आगे गंभीर चिंतन नहीं किया जाएगा, तब तक पेपर लीक की घटनाएँ जारी रहेंगी।
2026 में NEET परीक्षा के लिए 22.7 लाख छात्रों ने पंजीकरण कराया, जबकि IIT-JEE 2026 के लिए 14.5 लाख छात्रों ने आवेदन किया। ये दोनों परीक्षाएँ कोचिंग उद्योग को भारी बढ़ावा देती हैं। वर्तमान में यह उद्योग लगभग 58,000 करोड़ रुपये का है और अनुमान है कि 2028 तक यह बढ़कर 1.3 लाख करोड़ रुपये का हो जाएगा।
यह व्यवस्था लगभग पूरी तरह अनियमित (unregulated) है। इसके कारण न केवल अग्नि-सुरक्षा जैसी गंभीर समस्याएँ पैदा हुई हैं, बल्कि छात्रों की आत्महत्याओं की घटनाएँ भी लगातार बढ़ी हैं। कोटा, जो देश का प्रमुख कोचिंग केंद्र माना जाता है, वहाँ 2026 के पहले पाँच महीनों में 14 छात्रों ने आत्महत्या की। 2024 में यह संख्या 17 थी और 2023 में 26।
यह सवाल उठता है कि इतनी अमानवीय प्रक्रिया और अधिकांश छात्रों की असफलता के बावजूद ये परीक्षाएँ इतनी आकर्षक क्यों बनी हुई हैं? अभिभावक मेडिकल डिग्री को आर्थिक सफलता का दुर्लभ रास्ता मानते हैं। धीरे-धीरे समाज में ऐसी मानसिकता विकसित हो गई है, जिसमें कोचिंग उद्योग “सफलता के तमाशे” का निर्माण करता है।
ब्राज़ीली शिक्षाविद् Paulo Freire ने जिस “बैंकिंग मॉडल ऑफ एजुकेशन” की बात की थी, उसी प्रकार की शिक्षा और सामाजिक दबाव के कारण छात्र इस तथाकथित “सफलता” के पीछे भागने को मजबूर हो जाते हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो दिखाई देते हैं, जिनमें छात्र कोचिंग संस्थानों के मालिकों के सामने साष्टांग प्रणाम करते हैं। यह दर्शाता है कि यह मानसिकता छात्रों और अभिभावकों के भीतर कितनी गहराई तक बैठ चुकी है।
राज्य इसके विरुद्ध कोई वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत नहीं करता। इस वर्ष की पहली तिमाही में युवाओं में बेरोजगारी दर 15 प्रतिशत तक पहुँच गई, जबकि शिक्षित युवाओं में यह दर राष्ट्रीय औसत से तीन गुना अधिक है। बेरोजगारी या कम वेतन वाली नौकरी का भय छात्रों को इन परीक्षाओं की जुए जैसी प्रतिस्पर्धा में धकेलता है।
वे देखते हैं कि राजस्थान में केवल 53,749 कार्यालय परिचारक (office attendant) पदों के लिए 24.76 लाख उम्मीदवारों—जिनमें PhD और MBA डिग्रीधारी भी शामिल हैं—ने आवेदन किया। हरियाणा में 18,000 निम्न स्तरीय सरकारी नौकरियों के लिए 18 लाख लोग प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं, और 6,000 क्लर्क पदों के लिए 25 लाख आवेदन आते हैं।
इस असुरक्षित अर्थव्यवस्था में परिवार अपनी उम्मीदें इन परीक्षाओं पर टिका देते हैं, जबकि कोचिंग उद्योग उनकी इस मजबूरी का लाभ उठाता है और यह धारणा मजबूत करता है कि चिकित्सा या इंजीनियरिंग ही भविष्य के एकमात्र सुरक्षित रास्ते हैं।
जब परीक्षाएँ रद्द होती हैं, तो छात्रों की उम्मीदें टूट जाती हैं। तैयारी की यांत्रिक दिनचर्या में ढल चुके छात्रों को फिर से शुरुआत करनी पड़ती है। कुछ छात्र पाँचवीं कक्षा से ही तैयारी कर रहे होते हैं, जबकि कुछ “डमी स्कूलों” के साथ कोचिंग नगरों में जाकर बस जाते हैं और अपना पूरा जीवन एक ही लक्ष्य के इर्द-गिर्द ढाल लेते हैं। वे बड़ी आशा के साथ परीक्षा देते हैं, लेकिन बाद में उन्हें बताया जाता है कि पूरी व्यवस्था ही दोषपूर्ण थी। जब वे निष्पक्षता की माँग करते हैं और बदले में हिंसा का सामना करते हैं, तब उनकी असहायता और गहरी हो जाती है।
नौकरशाही आधारित समाधान इस सामाजिक और आर्थिक जटिलता को समझने में विफल रहते हैं। वास्तव में आवश्यकता पूरी शिक्षा-व्यवस्था को नए सिरे से पुनर्गठित करने की है। वर्तमान परीक्षाएँ ज्ञान को यांत्रिक बहुविकल्पीय प्रश्नों (MCQs) तक सीमित कर देती हैं और बड़ी संख्या में छात्रों को बाहर कर देती हैं। यह व्यवस्था समावेशन से इनकार करती है और ज्ञान तथा रोजगार के लोकतंत्रीकरण की सामाजिक जिम्मेदारी से बच निकलती है।
इस समस्या का समाधान तभी संभव है, जब राज्य यह पुनर्विचार करे कि “ज्ञान” किसे कहा जाए; शिक्षा और परीक्षाओं का विकेंद्रीकरण करे; और ऐसा रोजगार ढाँचा तैयार करे जो छात्रों को वास्तविक और विविध विकल्प प्रदान कर सके।
(लेखक की सहमति से डेक्कन हेराल्ड में अंग्रेजी में पूर्व प्रकाशित इस लेख का हिंदी अनुवाद पुनर्प्रकाशित है। मूल लेख का लिंक : https://www.deccanherald.com/opinion/neet-cancelled-paper-leaks-expose-states-indifference-4001158)

रवि कुमार साउथ एशियन यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र पढ़ाते हैं।
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