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नोटिफिकेशन
लेखक को यह कहानी एक गीगा वर्कर ने सुनाई थी। यह उसी का कथात्मक रूपांतरण है। उसकी आत्मकथा की वह …
इन दिनों : जड़ों को याद करने या भूलने का मतलब क्या है?
“जड़ों से उखड़े हुए लोग आदतन प्रेम, सद्भाव और सहकार से वंचित होते जाते हैं। माँ की गोदी, पिता से …
इन दिनों : विष के दाँत तोड़ने ही होंगे
“हर देश को देखिए। उसने विष के दाँत विकसित किए हैं। अपनी आय या कर्जखोरी का बड़ा हिस्सा मारने के …
इन दिनों : विचार सरहदों में नहीं बँधते
“जहाँ रचना है, वहाँ सीमाहीनता है। जहाँ कट्टरता है, वहाँ सीमाएँ-ही-सीमाएँ हैं।” – इसी आलेख से …
इन दिनों : प्रकृति, असमय के मेघ और षडयंत्र
“मुड़वारा के बारे में तीन क़िस्से हैं, जिनमें से एक है अंग्रेज़ों और बाग़ियों से संबंधित। लोग सत्ता के ख़िलाफ़ …
20 साल की सत्ता से राज्यसभा तक
नीतीश कुमार की कहानी उस राजनीतिक बदलाव की कहानी है, जो, राष्ट्रीय राजनीति के दबाव में, सत्ता के केंद्र से …
इन दिनों : कुछ ऐसा करें कि पड़ोसी का घर भी महक जाए
“धूप से जले हुए मंजर धरती पर बिखरे पड़े हैं। कुछ दिन पूर्व पेड़ों के लाड़ले थे, अब उपेक्षित हैं। …
इन दिनों : सोशलिस्ट, वामपंथी और दक्षिणपंथियों के दौड़ते घोड़े
18 मार्च, 1974 को आंदोलनरत तीन छात्रों से गोलियों से भून दिया गया था। इसलिए आज का दिन राजकीय उत्पीड़न …
भारतीय भाषाओं को हाशिए पर क्यों और कैसे धकेला गया है?
“राष्ट्रों की भाषा छीनकर और सभी क्षेत्रों में एक अपारदर्शी एवं पराई भाषा थोपकर उन्हें नष्ट करना एक मानक औपनिवेशिक …
इन दिनों : अब तो इस तालाब का पानी बदल दो
“चुनाव में रोग लगा और अब यह कैंसर का रूप ले रहा है। इसका ठीक से इलाज नहीं हुआ तो …
इन दिनों : तन्वंगी गंगा और विस्थापन की त्रासदी
विस्थापन की त्रासदियों और पीड़ाओं को शब्दों में बाँधने की कोशिश करता साहित्यिक लेख …
इन दिनों : नैतिकता और वर्जनाएँ
दरअसल संसार वह है जो ससर रहा है यानी बदल रहा है। इस बदलाव के झोंके में नैतिकता और वर्जनाओं …












