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इन दिनों : वैचारिक उदात्तता और संकीर्णता

“अंदर गया तो एक शिक्षिका अकेली अपने कमरे में बैठी थी। मुझे देखते ही खड़ी हो गई। प्रणाम किया और …

हार के बाद क्यों शुरू होता है ‘आंतरिक लोकतंत्र’?

प्रस्तुत आलेख में चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस में हो रही टूट के बहाने भारत के राजनीतिक परिदृश्य की विवेचना …
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इन दिनों : युवाओं का प्रदर्शन: साज़िश, संदेह और उम्मीदें

“ये लोग हिंदू-मुसलमान, पाकिस्तान, देशद्रोही जैसे शब्दों से शुरू होते हैं और वहीं ख़त्म।” – इसी आलेख से …
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इन दिनों : हवा के नये झोंके से कुछ सवाल

“एक बार फिर फ़िज़ाओं में बदलाव की गंध है। वह किस रूप में व्यक्त होगा, कहा नहीं जा सकता, लेकिन …

इन दिनों : वक्त का तराना

“आज़ादी इसलिए नहीं मिली थी कि जिनके पूर्वजों ने ख़ून बहाया, उनकी नागरिकता पर ही सवाल उठने लगे। उन्हें ‘परजीवी’ …

इन दिनों : बदजुबानी की राजनीतिक संस्कृति

“नेताओं की बदज़ुबानी के पीछे कुशिक्षा ही है। पहले के नेताओं की औपचारिक शिक्षा बहुत नहीं भी होती थी तो …

क्या डीके शिवकुमार बदल पाएंगे सत्ता-विरोधी राजनीति का चार दशक पुराना गणित?

“कर्नाटक का मतदाता आर्थिक प्रदर्शन, सामाजिक प्रतिनिधित्व और नेतृत्व विश्वसनीयता—तीनों का संयुक्त मूल्यांकन करता है।” – इसी आलेख से …

उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र (भाग 1)

ब्राजील के पौलो फ्रेरे का ‘उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र’ दुनिया की मशहूर किताबों में एक है। यह आलेख-माला इसी पुस्तक पर …
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Two pine trees bent by the wind on a grassy coastal dune, under a cloudy sky.

इन दिनों : सीने में जलन, आँखों में तूफ़ान-सा क्यूँ है?

“सत्ता चलाने वाला भ्रष्ट होगा तो उसके अधिकारी कर्मचारी ईमानदार रह ही नहीं सकते। जनता में अगर सांस्कृतिक चेतना सजग …

इन दिनों : खुदा मेहरबान तो अनाड़ी पहलवान

“प्रधानमंत्री ने अपने मंत्रियों को निर्देश दिया कि देश में गर्मी काफ़ी है, इससे बचने के लिए खूब पानी पियें। …

जेन-जी आंदोलन : पैटर्न, परिणाम और सीख 

आलेख में दुनिया के अनेक हिस्सों में हुए जेन-जी के आंदोलनों का अध्ययन करके उनके आंदोलन के पैटर्न को समझने …
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इन दिनों : अब जनता कोर्ट में ही अपील करें

“सवाल है कि रास्ता क्या है? देश जिस मुहाने पर खड़ा है, उससे निकलने का कोई तरीक़ा बचा है या …