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इन दिनों : संस्कृतिहीनता के युग में

“वे खूब ज्ञान परंपरा की तलाश करें, लेकिन वे बतायें कि वे ज्ञान परंपराएँ इतनी निर्बल क्यों थीं कि भारतीय …
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शिक्षा, भाषा और समानता का सवाल

शिक्षा-सिद्धांत और अंतरराष्ट्रीय व्यवहार के आधारों पर अंग्रेजी माध्यम स्कूलों को अच्छे स्कूल नहीं कहा जा सकता। कैसे? तथ्यों और …
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इन दिनों : मुझे रहजनों से गिला नहीं, तेरी रहबरी का सवाल है

“अड़ानी एनटीपीसी स्थल में ज्योंही हमलोगों ने प्रवेश किया, पहाड़िया जाति के बीसों स्त्री-पुरुष आ गए। ये लोग हताश-निराश हैं। …
A mother correcting her teenage daughter's behavior during breakfast, conveying parenting dynamics.

इन दिनों : सच्चे बच्चों की चेतना में भूकंप

“बच्चों को किताबों और नेट में झोंक दीजिए, फिर तो यंत्र ही बनेंगे और नहीं बन सके तो किसी कुकांड …
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इन दिनों : अँधेरे में लिपटता सत्य

सोशल मीडिया पर या तो आप एआई की गिरफ्त में हैं या नफ़रत की या विज्ञापनों की। बहुत कम पोस्ट …

संसाधनों के दोहन से बिगड़ता प्राकृतिक संतुलन : एक विश्लेषण

“प्राकृतिक संतुलन का तात्पर्य उस सामंजस्य से है, जिसमें सभी जैविक और अजैविक घटक एक-दूसरे के साथ संतुलित रूप से …

इन दिनों : वक्त ने किया, क्या हँसी सितम…

“सच यह है कि आँधी-तूफ़ान तो यहाँ आया हुआ है, जिसमें देश की बौद्धिक क्षमता चुक गई है और अबौद्धिक …
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इन दिनों : कारवाँ गुजर गया, ग़ुबार देखते रहे 

“आज अपने इतिहास को ठीक से समझने की ज़रूरत है। एक बार फिर देश में खतरा मँडरा रहा है। ” …

इन दिनों :अनिर्वचनीयता के बीच सृष्टिखोर

“असली जानवर तो बड़े-बड़े नगरों में हैं, जो सृष्टि के असल दरिंदे हैं। यह अनपढों से भी गये गुज़रे हैं। …

इन दिनों : प्लेटफ़ॉर्म पर बिखरी ज़िंदगियाँ 

“लोकतंत्र के सिपाही और औपनिवेशिक तंत्र के सिपाही के स्वभाव, बातचीत और लहजे में अंतर तो होना चाहिए। यह हमने …

नोटिफिकेशन

लेखक को यह कहानी एक गीग वर्कर ने सुनाई थी। यह उसी का कथात्मक रूपांतरण है। उसकी आत्मकथा की वह …
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इन दिनों : जड़ों को याद करने या भूलने का मतलब क्या है?

“जड़ों से उखड़े हुए लोग आदतन प्रेम, सद्भाव और सहकार से वंचित होते जाते हैं। माँ की गोदी, पिता से …