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परीक्षा का पाप

“परीक्षा इतनी जरूरी हो गई है कि कुछ भी कर उसे जीतना है। युद्ध भी है, और प्यार भी — …

इन दिनों : शीर्ष पर बैठे घाघ लोग

“जब देश आजाद हुआ तो एक राष्ट्रीय सरकार बनी थी, जिसमें विरोधियों को भी जगह मिली थी। पचास-साठ वर्षों तक …
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मनुष्य क्या है?

“वैज्ञानिकों ने हमें Homo Sapiens कहकर पुकारा, जहाँ Sapiens का शाब्दिक अर्थ बुद्धिमान होता है। उनके कथन का अर्थ है …
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इन दिनों : जेफ्री एपस्टीन और मौजूदा विकास

“यह घटना मर्दवादी समाज की पोल खोलती ही है, साथ ही बताती है कि मनुष्य अभी तक निरा जानवर ही …

एक लेखक क्या चाहता है?

“लेखक अपनी बेटी को बताना चाहता है कि इस देश-समाज की उत्तराधिकारी तुम ही हो। पर इसके लिए तुम्हें नेता, …

इन दिनों : माननीयों के कुकर्म

“जिस मुख्यमंत्री को संविधान से प्यार नहीं है, उसे सम्मान नहीं देता, उस मुख्यमंत्री को कुर्सी पर क्यों रहना चाहिए? …

जो है, जरूरी है

‘जब मैं किताब हाथ में लेकर पढ़ा करता था, या किसी कॉपी पर अपनी कलम से लिख रहा होता था, …

इन दिनों : सैंया को कोतवाल नहीं होना चाहिए

अगर लोकतंत्र के प्रति आस्था न हो, तो लोकतांत्रिक ढंग से चुन कर आने के बाद या तत्कालीन राजनैतिक शख्सियत …

दुख का दर्शन

“आज हम, भारत के लोग सिर्फ़ इसलिए कष्ट नहीं झेल रहे कि देश की अर्थव्यस्था संकट में है। बल्कि हमारे …

बजट: बहेलिया आयेगा, दाना डालेगा….

“बजट समता कायम करने नहीं, आर्थिक गैर बराबरी बढ़ाने के लिए लाया जाता है। यह अमीरों का उपक्रम है। सरकार …

शिक्षा : अधिकार से बाजार तक – नागरिक, कॉर्पोरेट और राज्य

शिक्षा, जो ऐतिहासिक रूप से सामाजिक पुनरुत्पादन और नागरिक चेतना के निर्माण का माध्यम रही है, नवउदारवादी पूँजीवाद के चरण …
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इन दिनों : कहाँ आ गये हम, यों ही चलते-चलते

“मनुष्य में प्रकृति के दोनों गुण मौजूद हैं – सृजन भी और संहार भी। प्रकृति का अपना स्वभाव है। वह …