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इन दिनों : वक्त ने किया, क्या हँसी सितम…

“सच यह है कि आँधी-तूफ़ान तो यहाँ आया हुआ है, जिसमें देश की बौद्धिक क्षमता चुक गई है और अबौद्धिक …
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इन दिनों : कारवाँ गुजर गया, ग़ुबार देखते रहे 

“आज अपने इतिहास को ठीक से समझने की ज़रूरत है। एक बार फिर देश में खतरा मँडरा रहा है। ” …

इन दिनों :अनिर्वचनीयता के बीच सृष्टिखोर

“असली जानवर तो बड़े-बड़े नगरों में हैं, जो सृष्टि के असल दरिंदे हैं। यह अनपढों से भी गये गुज़रे हैं। …

इन दिनों : प्लेटफ़ॉर्म पर बिखरी ज़िंदगियाँ 

“लोकतंत्र के सिपाही और औपनिवेशिक तंत्र के सिपाही के स्वभाव, बातचीत और लहजे में अंतर तो होना चाहिए। यह हमने …

नोटिफिकेशन

लेखक को यह कहानी एक गीग वर्कर ने सुनाई थी। यह उसी का कथात्मक रूपांतरण है। उसकी आत्मकथा की वह …
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a close up of a lion on a field

इन दिनों : जड़ों को याद करने या भूलने का मतलब क्या है?

“जड़ों से उखड़े हुए लोग आदतन प्रेम, सद्भाव और सहकार से वंचित होते जाते हैं। माँ की गोदी, पिता से …
a lizard with its mouth open

इन दिनों : विष के दाँत तोड़ने ही होंगे

“हर देश को देखिए। उसने विष के दाँत विकसित किए हैं। अपनी आय या कर्जखोरी का बड़ा हिस्सा मारने के …

इन दिनों : विचार सरहदों में नहीं बँधते

“जहाँ रचना है, वहाँ सीमाहीनता है। जहाँ कट्टरता है, वहाँ सीमाएँ-ही-सीमाएँ हैं।” – इसी आलेख से …

इन दिनों : प्रकृति, असमय के मेघ और षडयंत्र

“मुड़वारा के बारे में तीन क़िस्से हैं, जिनमें से एक है अंग्रेज़ों और बाग़ियों से संबंधित। लोग सत्ता के ख़िलाफ़ …

20 साल की सत्ता से राज्यसभा तक

नीतीश कुमार की कहानी उस राजनीतिक बदलाव की कहानी है, जो, राष्ट्रीय राजनीति के दबाव में, सत्ता के केंद्र से …
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इन दिनों : कुछ ऐसा करें कि पड़ोसी का घर भी महक जाए

“धूप से जले हुए मंजर धरती पर बिखरे पड़े हैं। कुछ दिन पूर्व पेड़ों के लाड़ले थे, अब उपेक्षित हैं। …

इन दिनों : सोशलिस्ट, वामपंथी और दक्षिणपंथियों के दौड़ते घोड़े

18 मार्च, 1974 को आंदोलनरत तीन छात्रों से गोलियों से भून दिया गया था। इसलिए आज का दिन राजकीय उत्पीड़न …