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इन दिनों : और चाँद चू गया
“चाँद तो सूरज से रोशनी लेता है। आदमी भी एक-दूसरे से ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान ही तो आदमी की …
भारतीय भाषाओं को कितना खतरा है?
“इस दस्तावेज़ में किया गया आकलन उन सभी भारतीय भाषाओं पर लागू होता है, जिनका प्रयोग राज भाषाओं के रूप …
इन दिनों : अजीब दास्ताँ है ये, कहाँ शुरू, कहाँ ख़त्म…
“यह सच है कि काल की चक्की चल रही है, एक दिन उस चक्की में पिसना ही है, मगर मनुष्य …
इन दिनों : छाती पीटने और हाय-हाय करने के चैम्पियन
“प्रधानमंत्री और गृहमंत्री जानते थे कि जिस तरह की शर्तें वे महिला आरक्षण बिल में जोड़ रहे हैं, उन्हें विपक्ष …
इन दिनों : आँधी में भी गाँधी जी
“डॉ भीमराव अम्बेडकर की जयंती पर सभा हो और गांधी का ज़िक्र न हो, यह असंभव है। पूना पैक्ट के …
इन दिनों : रोपे पेड़ बबूल के तो आम कहाँ से होय
“हर जाति ने अपने नायक ढूँढ लिया है। आज़ादी की लड़ाई में वैसे नायक ढूँढे जाते थे, जिन्होंने देश के …
इन दिनों : एक बार, जाल फेंक रे मछेरे
“हर क्षण हम थोड़ा-थोड़ा जीते और मरते जाते हैं। जो चीज़ें छूट जाती हैं, वे मर ही तो जाती हैं। …
इन दिनों : अगर मैं रुक गई अभी तो जा न पाऊँगी कभी….
आशा भोंसले ने फ़िल्म इंडस्ट्री में अस्सी वर्ष बिताए और बीस भाषाओं में बारह हज़ार से अधिक गीत गाये। वे …
इन दिनों : डॉ अम्बेडकर को याद करते हुए
“हिन्दू समाज का जो भयानक दुर्गुण है, वह जाति ही है। जाति को क़ायम रखते हुए कोई हिंदू अपनी श्रेष्ठता …
इन दिनों : संवैधानिक मताधिकार और चुनाव आयोग के ठहाके
“आज़ादी मिली तो भारतीयों को वयस्क मताधिकार मिला। संविधान ने गारंटी दी कि हर भारतीय को वोट देने का अधिकार …
इन दिनों : अनासक्ति और कामना
“संसार से मुक्त होने की कामना भी क्या एक कामना नहीं है? मनुष्य भावनाओं और विचारों की दुनिया में छटपटाता …
इन दिनों : जाति-श्रेष्ठता और राष्ट्र की छाती से बहते लहू
“हम एक अँधेरी गुफा में धँसते जा रहे हैं, जहाँ अपनी मौत का ही उत्सव मनाने की तैयारी कर रहे …












