लगता है कि अब दुनिया में मनुष्य नहीं, एआई का वर्चस्व होगा। एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी कृत्रिम मेधा। जो लोग सत्रहवीं सदी के मंदिर-मस्जिद विवाद के मजे ले रहे हैं, वे भी दुनिया के सबसे बड़े एआई एक्सपो का उद्घाटन कर रहे हैं। एक्सपो मतलब प्रर्दशनी। थोड़ा और साफ करें तो एक्सपो यानी व्यापारिक मेला। अभी तो एआई की धूम है। घोषणा यह भी की जा रही है कि जो एआई के धुरंधर होंगे, उन्हें नौकरी मिलेगी। जो यह हुनर सीख नहीं पायेंगे, वे टापते रह जायेंगे। दुनिया में रहना है तो एआई में दक्ष होना होगा।
बेचारा आदमी, क्या करे और क्या न करे! दुनिया के बड़े धनपशु एलन मस्क कह रहे हैं कि अब मनुष्य को कोई काम नहीं करना है। बैठे-बैठे मजा लेना है। एआई अलादीन का चिराग है – घिसिए और ‘क्या हुकुम है आका‘ कहता हुआ रोबोट नमूदार होगा और आपकी सारी ख्वाहिशें पूरी कर देगा। शायद दास मलूका का सपना पूरा होने वाला है – ‘अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम, दास मलूका कह गए सबके दाता राम।’ आधुनिक राम का जन्म हो चुका है। एआई आधुनिक राम है। वह सबकुछ कर देगा। ऐसा विश्वास जताया जा रहा है कि वह खाना भी देगा और शिक्षा भी देगा। लेकिन जब सबकुछ बैठे ठाले मिल ही जायेगा, तब फिर मनुष्य पढ़ कर क्या करेगा? एआई ही पढ़ लेगा और मनुष्य के लिए सबकुछ जुटा देगा।
क्या हम श्रम विहीन दुनिया में प्रवेश करने जा रहे हैं? अभी तक की मनुष्य की संस्कृति श्रम आधारित है। यंत्रों ने मनुष्य को श्रम से काटने की शुरुआत की। पहले उसने मदद की और अब यंत्रों ने उसे घेर लिया है। यंत्र ने शरीर और मन दोनों पर कब्जा करना शुरू किया है।
मैंने बचपन में शिवमंगल सिंह ‘सुमन‘ की एक कविता पढ़ी थी- ‘हम पक्षी उन्मुक्त गगन के।’ कवि ने पिंजरे में बंद एक पक्षी को देखा और उसकी ख्वाहिशों को शब्द देना शुरू किया – ‘हम पंछी उन्मुक्त गगन के, पिंजरबद्ध न गा पाएँगे/कनक-तीलियों से टकराकर पुलकित पंख टूट जाएँगे।’ पंछी तो खुले आकाश में ही जी सकता है, गा सकता है। पिंजरे में बंद रहना उसका स्वभाव नहीं है। पंछी कहता है कि पिंजरे में कैद रह कर खा नहीं पायेंगे और पिंजरे की तीलियाँ, जो सोने की बनी है, उससे मेरे पुलक से भरे पंख टूट जायेंगे। कवि आजादी की मर्म कथा कहता है- ’हम बहता जल पीनेवाले मर जाएँगे भूखे-प्यासे,/ कहीं भली है कटुक निबौरी, कनक-कटोरी की मैदा से।’ पंछी के बहाने कवि जो कुछ कहता है, क्या वह हम सब पर लागू नहीं होता? पंछी तीखे फल खाकर भी खुश रहेगा। उसे सोने की कटोरी में मैदा नहीं चाहिए। मनुष्य ने पंछी को पिंजरे में कैद कर रखा है और उदास होकर पंछी निवेदन करता है – ‘स्वर्ण-श्रृंखला के बंधन में अपनी गति, उड़ान सब भूले,/बस सपनों में देख रहे हैं तरु की फुनगी पर के झूले।’ पंछी के अरमान है कि वह तरु की फुनगियों पर झूले।
मनुष्य का ख्वाब क्या है? क्या एक-दूसरे को गुलाम बनाना या एक दूसरे को मुक्त करना। मुझे तो लगता है कि मनुष्य धीरे-धीरे गुलाम होता जा रहा है। सत्ता और संस्कार की गुलामी थी ही और अब एक नयी गुलामी की चुनौती हमारे सामने हैं। एआई के प्रमुख विशेषज्ञ और व्यापारी योशुआ बेंजियो, ज्याफ्रे हिंटन, साम आल्टमन, इलान मस्क और मुस्तफा सुलैमान ने जनता को चेतावनी दी है – एआई हमारी सभ्यता को नष्ट कर सकता है।
बेंजियो, हिंटन और अनेक विशेषज्ञों द्वारा संयुक्त रूप से लिखे एक लेख में कहा है – “एआई की अनिंयत्रित प्रगति जीवन और जीवमंडल की बड़े पैमाने पर क्षति और मनुष्यता को हाशिए पर फेंक दिए जाने या उसकी विलुप्ति तक का कारण बन सकती है।” आगे क्या होगा, यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन पालने में भी पूत के पाँव देखने की परंपरा है। अनियंत्रित एआई सृजन नहीं, विनाश का कारण बन सकती है।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर





