
अहमदाबाद में आरबीआई के पैसों की चोरी से जाहिर होता है कि राजकीय व्यवस्था अपने कर्तव्य-पालन में कितनी सुस्त, मगर विज्ञापन में कितनी चुस्त है।

नारे हैं, नारों का क्या? नारों के झाँसे में देश देश संकट में फँसता गया, राष्ट्रीय संपत्तियाँ नीलाम होती गईं, मार्केट क्रैश कर गया, राष्ट्रीय संप्रभुता गिरवी पड़ती गई और अब तो पेमेंट तक का क्राइसिस खड़ा हो गया है।

" हो सकता है, यह सभ्यता टूट-बिखर जाये। नयी सभ्यता खड़ी हो और मनुष्य नये तरीक़े से जीने लगे तो फिर नये-नये शब्द भी जीवन में आ जायें। जीवन के बदलते तरीक़ों में हमने एक तरीक़ा सीखा है कि प्रकृति की कत्ल करते जायें। " - इसी आलेख से

"मौजूदा भारत में हिप्पोक्रेसी का बाज़ार सर्वोत्तम है। सरकार चाहे तो हिप्पोक्रेसी को अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में बोली लगा सकती है। हरेक दिशा में असफलता के बाद हिप्पोक्रेसी में वह गगनचुंबी छलाँग और सफलता प्राप्त कर सकती है।" - इसी आलेख से

"आप सॉफ्ट और हार्ड की बात मत कीजिए। आपने संविधान की शपथ खाई है। संविधान के तहत काम कीजिए। जो संविधान के तहत काम नहीं करता है, उसका व्यवहार चाहे जितना सॉफ्ट हो, वह कम ख़तरनाक नहीं है।" - इसी अल्लेख से

"भारत की मौजूदा राजनीति एक चक्रव्यूह में फँस गई है। इस राजनीति के लिए भ्रष्टाचार बहुत ज़रूरी है। अगर आप भ्रष्ट और बदतमीज़ नहीं हैं तो इस राजनीति से दूर रहिए। " - इसी आलेख से

"राजनीति में सुपुत्रों की कोई कमी नहीं है। हमाम में अब सब नंगे हैं। इसकी आलोचना और निंदा भरपूर करें। राजनीति में गिरावट के प्रति भी चिंतित हों, लेकिन मेरा सवाल है कि राजनीति में गिरावट की क्या यह अकेली वजह है?" - इसी आलेख से

"गृहस्थ को तो घर चलाना है। उसकी चिंता समझ में आती है, लेकिन संत क्यों चिंतित है? दरअसल संत आज ज़्यादा चिंतित है, क्योंकि संतई छोड़ कर संतई का धंधा कर रहा है और धंधा तो महान चिंता का कारण है।" - इसी आलेख से

"हर नेता कहता है कि मैं तो जनता का सेवक हूँ, लेकिन सच यह है कि वह जनता का शासक है। जीत के बाद सेवा का कोई मतलब नहीं होता। यह तो महज एक जुमला है।" - इसी आलेख से

"आज संभव है कि सभी विपक्षी दल इस पर न सोचे और सिर्फ़ अपनी बारी की प्रतीक्षा करते रहें। यह भी हो सकता है कि सचेत नागरिक सत्ता की विकरालता और उसकी धौंस का सामना न कर सके, लेकिन लोकतंत्र के अपहरण का यह जीता-जागता मिसाल है।" - इसी आलेख से