Category इन दिनों

इन दिनों : हवा के नये झोंके से कुछ सवाल

gray printing paper on white surface
"एक बार फिर फ़िज़ाओं में बदलाव की गंध है। वह किस रूप में व्यक्त होगा, कहा नहीं जा सकता, लेकिन लोगों को अपनी राय स्पष्ट रूप से रख देनी चाहिए।" - इसी आलेख से

इन दिनों : वक्त का तराना

"आज़ादी इसलिए नहीं मिली थी कि जिनके पूर्वजों ने ख़ून बहाया, उनकी नागरिकता पर ही सवाल उठने लगे। उन्हें 'परजीवी' और 'कॉकरोच' कहा जाने लगे। ऐसे ही वक़्त में रणभेरी बजती है।" - इसी आलेख से

इन दिनों : बदजुबानी की राजनीतिक संस्कृति

"नेताओं की बदज़ुबानी के पीछे कुशिक्षा ही है। पहले के नेताओं की औपचारिक शिक्षा बहुत नहीं भी होती थी तो भी किताबें पढ़ते थे और बौद्धिक जनों से जीवंत रिश्ता बनाए रखते थे। आजकल के नेताओं की तरक़्क़ी बदज़ुबानी से होती है, इसलिए वे एक-से-एक बयान देते हैं।" - इसी आलेख से

इन दिनों : सीने में जलन, आँखों में तूफ़ान-सा क्यूँ है?

Two pine trees bent by the wind on a grassy coastal dune, under a cloudy sky.
"सत्ता चलाने वाला भ्रष्ट होगा तो उसके अधिकारी कर्मचारी ईमानदार रह ही नहीं सकते। जनता में अगर सांस्कृतिक चेतना सजग नहीं है, तो वह भी देखा-देखी भ्रष्टाचार की मनोवृत्ति का शिकार होगी।" - इसी आलेख से

इन दिनों : खुदा मेहरबान तो अनाड़ी पहलवान

"प्रधानमंत्री ने अपने मंत्रियों को निर्देश दिया कि देश में गर्मी काफ़ी है, इससे बचने के लिए खूब पानी पियें। मजा यह था कि यह ख़बर ब्रेक कर गयी और चैनल पर महान एंकरों ने इसे ब्रेकिंग ख़बर बनाया। " - इसी आलेख से

इन दिनों : चौदह वर्ष के बाद गौ माता की क़ुर्बानी और राजनीतिक मिथ्याचार

A brown cow grazing on a green pasture in Germany, surrounded by trees.
"चौदह वर्ष तक की गाय माता रहेगी और उसके बाद उसे माता के पद से उतार कर उसकी गर्दन रेत देने में कोई दिक़्क़त नहीं है।" - इसी आलेख से

इन दिनों : ‘गैंग ऑफ वासेपुर’ ने डाला आरबीआई में डाका

अहमदाबाद में आरबीआई के पैसों की चोरी से जाहिर होता है कि राजकीय व्यवस्था अपने कर्तव्य-पालन में कितनी सुस्त, मगर विज्ञापन में कितनी चुस्त है।

इन दिनों : नारों का डंका, आग में जले लंका

Diverse group holding protest signs demanding change, highlighted by night lighting.
नारे हैं, नारों का क्या? नारों के झाँसे में देश देश संकट में फँसता गया, राष्ट्रीय संपत्तियाँ नीलाम होती गईं, मार्केट क्रैश कर गया, राष्ट्रीय संप्रभुता गिरवी पड़ती गई और अब तो पेमेंट तक का क्राइसिस खड़ा हो गया है।