
शिक्षा, जो ऐतिहासिक रूप से सामाजिक पुनरुत्पादन और नागरिक चेतना के निर्माण का माध्यम रही है, नवउदारवादी पूँजीवाद के चरण में एक ऐसी वस्तु में रूपांतरित की जा रही है जिसे बाज़ार में खरीदा–बेचा जा सकता है। राज्य, जो शिक्षा के माध्यम से सामाजिक समानता और पुनर्वितरणकारी न्याय की भूमिका निभाने वाला कारक था, अब पूँजी के हितों के अनुरूप अपनी जिम्मेदारियों का स्थानांतरण कर रहा है। इस प्रक्रिया में नागरिक श्रम–शक्ति के वाहक और ऋणग्रस्त उपभोक्ता में बदलता जा रहा है, जबकि कॉर्पोरेट शिक्षा के क्षेत्र में मूल्य–अधिशेष के नए स्रोत के रूप में स्थापित हो रहा है।

शासन की व्यवस्था के भीतर पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों में अक्सर भाषा को अभिव्यक्ति का साधन बताया जाता है। लेकिन भाषा केवल साधन नहीं है, स्वभाव भी है - वर्गीय स्वभाव। प्रस्तुत लेख में भाषा के इसी वर्गीय चरित्र का विश्लेषण किया गया है।

"बाहरी लोगों के लिए वह जंगल पर्यटन-स्थल था, प्राकृतिक धरोहर था, सेल्फी-पॉइंट था। लेकिन गाँव के लोगों के लिए राशन कार्ड था, औषधालय था, रोजगार था और सुरक्षा भी।" - इसी आलेख से

दुनिया के कई देशों की शिक्षा प्रणाली बेहतर मानी जाती है और कई प्रसंगों में उदाहृत होती है। इस लेख में कई देशों की शिक्षा प्रणाली की विशेषताओं पर विहंगम दृष्टि डाली गयी है ताकि वैश्विक परिप्रेक्ष्य को समझ सकें और अपने देश की शिक्षा व्यवस्था के बारे में सोच सकें।

दुनिया में सबसे अधिक पढ़नेवाले देशों में भारत का स्थान दूसरा है। जबकि यहाँ बमुश्किल 10 प्रतिशत लोग मैट्रिक पास हैं। उनकी पढ़ाई का स्तर भी श्लाघनीय नहीं है। तो फिर वे कौन हैं, जिनके कारण भारत दुनिया का दूसरा सबसे पढ़ाकू देश है? - पढ़िए इस आलेख में।

'मनरेगा' के बदले 'वीबी जी राम जी' लाया जाना केंद्र सरकार के कई उद्देश्यों की पूर्ति एक ही साथ करता है। इसीलिए उसने विपक्ष के भारी विरोध को बिल्कुल अनसुना कर दिया। कैसे? पढ़ें इस लेख में।

दुनिया के अलग-अलग देशों में गहरी आर्थिक असमानता है और यह असमानता एक देश के भीतर अलग-अलग-क्षेत्रों और समुदायों में भी चिंताजनक रूप से व्याप्त है। यह आर्थिक असमानता शैक्षिक अवसरों की असमानता सृजित करती है और शैक्षिक असमानता सामाजिक-आर्थिक असमानता को पुनर्स्थापित करती है।

आलेख में अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर के मेयर के रूप में चुने जाने वाले ममदानी और काउंसलर के रूप में निर्वाचित होने वाले कम्युनिस्ट नेताओं की राजनीतिक रणनीति की विवेचना है और इसके साथ ही जन-जुड़ाव के चुनावी अभियान की संभावना की भारतीय राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में पड़ताल है।

कहानी में कुछ ऐसा नहीं है, जो आकर्षित कर सके - न कथ्य, न शिल्प। लेकिन यह कुछ ऐसा है, जिसे बार-बार दुहराया गया है। इसीलिए बार-बार कहे जाने की जरूरत भी है। इसी जरूरत के कारण इसे फिर से कहा गया है। आप चाहें तो इसे फिर से पढ़ सकते हैं।

क्या बिहार में मतदाता सूची वास्तव में 'शुद्ध' हो गई है?इस आलेख में, जमीनी स्तर के प्रमाणों के साथ एसआईआर की अंतिम सूची, जिसे 'शुद्ध' कहा गया है, का विश्लेषण प्रस्तुत है।