
"एक वैज्ञानिक सार्वभौमिक शिक्षा प्रणाली- सामान्य, सुवित्तपोषित, निरंतर मूल्यांकित तथा उच्च-जोखिम से पूर्ण परीक्षाएँ लीक व रैकेटों से मुक्त- कोई काल्पनिक स्वप्न नहीं, बल्कि ठोस, पहले से परखे जा चुके तत्वों का एक समुच्चय है, जिसे मिलाने के लिए बस राजनीतिक इच्छाशक्ति की प्रतीक्षा है।" - इस आलेख की स्थापना

"निम्न और मध्यम आय वाले देशों में 37% बच्चों को दूसरी भाषा में पढ़ाया जाता है, जिससे उन्हें स्कूल काल के दौरान हर समय नुकसान होता है और उनकी सीखने की क्षमता सीमित हो जाती है।" - इसी आलेख से

यह आलेख पॉलो फ्रेरे के शिक्षा-सिद्धांत का छठा और अंतिम भाग है। इस भाग में गांधी, अम्बेडकर और फ्रेरे के शिक्षा-सिद्धांतों की समीक्षा की गयी है। आलेख में तीनों की पृष्ठभूमि और दिशा की भिन्नता के बावजूद साझा बिंदु की पड़ताल की गयी है और उनकी तुलना भी।

यह आलेख 'उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र' के विश्लेषण का पाँचवाँ भाग है। इस भाग में बताया गया है कि प्रभुत्वशाली वर्ग अपने प्रभुत्व को कायम रखने के लिए किन युक्तियों का इस्तेमाल करता है और उत्पीड़ित वर्ग को अपनी मुक्ति के लिए किन उपायों का उपयोग करना चाहिए। अगले अंक में पढ़ें अंबेडकर, गांधी और पॉलो फ्रेरे के शिक्षा-दर्शन की तुलनात्मक विवेचना।

ब्राज़ील में अनपढ़ों को वोट देने का अधिकार नहीं था। इस तरह आधी से अधिक आबादी राजनीतिक प्रक्रिया से बाहर थी। उन अनपढ़ मजदूरों को पढ़ाने के लिए पॉलो फ्रेरे ने शिक्षा प्रदान करने का जो ऐतिहासिक प्रयोग किया, उसने न केवल उन मज़दूरों के जीवन को बदला, बल्कि राजनीतिक व्यवस्था का भी संतुलन बदल दिया।

पॉलो फ्रेरे के शिक्षाशास्त्र का यह सबसे महत्वपूर्ण भाग है। इस भाग में फ्रेरे के द्वारा की गयी चेतना और कर्म की विवेचना और दोनों के समन्वय की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया है।

प्रस्तुत आलेख पौलो फ्रेरे के 'उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र (Pedagogy of the Oppressed) की समीक्षा-शृंखला का दूसरा भाग है। इस अंक में शिक्षा के बैंकिंग मॉडल और उसके तोड़ के रूप में प्रस्तुत संवादात्मक शिक्षा प्रणाली की विवेचना की गयी है।

ब्राजील के पौलो फ्रेरे का 'उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र' दुनिया की मशहूर किताबों में एक है। यह आलेख-माला इसी पुस्तक पर आधारित है। इसे चार भागों में प्रस्तुत किया जा रहा है। पहले भाग में पौलो फ्रेरे के 'उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र' का संक्षिप्त परिचय, दूसरे भाग में शिक्षा के बैंकिंग मॉडल और संवादात्मक कार्रवाई के परिणाम, तीसरे भाग में सामाजिक चेतना और 'प्रैक्सिस' का सिद्धांत तथा चौथे भाग में गांधी और अंबेडकर के सिद्धांतों के साथ फ्रेरे के सिद्धांतों की तुलना की गई है।

"जब किसी गरीब किसान का बेटा या मजदूर की बेटी विश्वविद्यालय तक पहुँचती है, तब केवल एक छात्र शिक्षित नहीं होता—बल्कि एक पूरा परिवार, एक गाँव और एक पीढ़ी अपने भविष्य को बदलने की संभावना के करीब पहुँचती है।" - इसी आलेख से

"NEET जैसी परीक्षाएँ अब “प्रतिभा की परीक्षा” कम और “व्यवस्था की सड़ांध” का प्रतीक अधिक बनती जा रही हैं।" - इसी आलेख से