
यह आलेख पॉलो फ्रेरे के शिक्षा-सिद्धांत का छठा और अंतिम भाग है। इस भाग में गांधी, अम्बेडकर और फ्रेरे के शिक्षा-सिद्धांतों की समीक्षा की गयी है। आलेख में तीनों की पृष्ठभूमि और दिशा की भिन्नता के बावजूद साझा बिंदु की पड़ताल की गयी है और उनकी तुलना भी।

कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को अक्सर जीत और हार के साँचे में विवेचित किया जाता है। जीत-हार की बहस से अलग इस आलेख में देश की राजनीति और नागरिक समाज पर इस आंदोलन के पड़ने वाले प्रभाव को विवेचित किया गया है।

यह आलेख 'उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र' के विश्लेषण का पाँचवाँ भाग है। इस भाग में बताया गया है कि प्रभुत्वशाली वर्ग अपने प्रभुत्व को कायम रखने के लिए किन युक्तियों का इस्तेमाल करता है और उत्पीड़ित वर्ग को अपनी मुक्ति के लिए किन उपायों का उपयोग करना चाहिए। अगले अंक में पढ़ें अंबेडकर, गांधी और पॉलो फ्रेरे के शिक्षा-दर्शन की तुलनात्मक विवेचना।

ब्राज़ील में अनपढ़ों को वोट देने का अधिकार नहीं था। इस तरह आधी से अधिक आबादी राजनीतिक प्रक्रिया से बाहर थी। उन अनपढ़ मजदूरों को पढ़ाने के लिए पॉलो फ्रेरे ने शिक्षा प्रदान करने का जो ऐतिहासिक प्रयोग किया, उसने न केवल उन मज़दूरों के जीवन को बदला, बल्कि राजनीतिक व्यवस्था का भी संतुलन बदल दिया।

पॉलो फ्रेरे के शिक्षाशास्त्र का यह सबसे महत्वपूर्ण भाग है। इस भाग में फ्रेरे के द्वारा की गयी चेतना और कर्म की विवेचना और दोनों के समन्वय की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया है।

प्रस्तुत आलेख पौलो फ्रेरे के 'उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र (Pedagogy of the Oppressed) की समीक्षा-शृंखला का दूसरा भाग है। इस अंक में शिक्षा के बैंकिंग मॉडल और उसके तोड़ के रूप में प्रस्तुत संवादात्मक शिक्षा प्रणाली की विवेचना की गयी है।

ब्राजील के पौलो फ्रेरे का 'उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र' दुनिया की मशहूर किताबों में एक है। यह आलेख-माला इसी पुस्तक पर आधारित है। इसे चार भागों में प्रस्तुत किया जा रहा है। पहले भाग में पौलो फ्रेरे के 'उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र' का संक्षिप्त परिचय, दूसरे भाग में शिक्षा के बैंकिंग मॉडल और संवादात्मक कार्रवाई के परिणाम, तीसरे भाग में सामाजिक चेतना और 'प्रैक्सिस' का सिद्धांत तथा चौथे भाग में गांधी और अंबेडकर के सिद्धांतों के साथ फ्रेरे के सिद्धांतों की तुलना की गई है।

आलेख में दुनिया के अनेक हिस्सों में हुए जेन-जी के आंदोलनों का अध्ययन करके उनके आंदोलन के पैटर्न को समझने की कोशिश की गयी है। साथ ही उन आंदोलनों के क्या परिणाम हुए और उनसे क्या सीखा जा सकता है, इन बातों की विवेचना की गयी है।

"भारत की शिक्षा को केवल ‘स्मार्ट क्लास’ नहीं चाहिए, बल्कि मानवीयता, वैज्ञानिक दृष्टि, लोकतांत्रिक संस्कृति, सामाजिक न्याय और बौद्धिक स्वतंत्रता की आवश्यकता है।" - इसी आलेख से

यह कहानी इतिहास और कल्पना के धागों से बुनी हुई है। मई क्रांति को आधार बनाकर लिखी गई यह कहानी उत्पीड़ितों के जीवन और उत्पीड़न से मुक्ति के संघर्ष का बयान करती है।