Dr. Anil Kumar Roy

Dr. Anil Kumar Roy

कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।

सामाजिक-मानवीय आधार पर शिक्षा के पुनर्गठन की ज़रूरत

सत्ता और पूँजीवाद के गठजोड़ ने शिक्षा को अपने हितों की पूर्ति का साधन बना लिया है। सामाजिक और मानवीय हित कहीं खो गए हैं। सामाजिक और मानवीय हितों को पुनर्स्थापित करने के लिए समाज और सामाजिक लोगों को ही शिक्षा के स्वरूप के पुनर्गठन की चिंता करनी होगी।

शिक्षा नीति 2020 में शिक्षकों के हितों की पड़ताल

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यह शिक्षा नीति शिक्षकों के ‘प्राचीन सम्मान’ को लौटाने का वाचिक आश्वासन भले ही देती हो, शिक्षकों से एक स्पंदनशील शैक्षिक वातावरण के निर्माण की अपेक्षा भले ही करती हो, परंतु उनके वेतनमान पर चुप्पी साध लेती है, सेवाशर्तों को कमजोर बनाने की अनुशंसा करती है, उनके व्यक्तित्व के दब्बू होने का इंतजाम करती है और विद्यालीय परिवेश में उनके महत्व का अवमूल्यन करती है।

इलाज

गाँव से आए भोले-भाले माधो को अस्पताल में अपने-आप विकसित हो गए इस व्यवसाय-तंत्र का तो पता ही नहीं था। जाँच कराने में सहायता करने वाले जिस लड़के को, दवा की दूकान दिखाने वाले जिस सज्जन को और डॉक्टर का पता बतानेवाले जिस आदमी को वह देवदूत समझ रहा था, वास्तव में वे सारे अपने-अपने धंधे के एजेंट थे, जो अस्पताल के परिसर में ही दिन भर घूम-घूमकर भोले-भाले मरीजो को बहला-फुसलाकर ले जाने का धंधा करते थे, जिसके लिए उन्हें कमीशन मिलता था। अस्पताल की निःशुल्क व्यवस्था के समानांतर विकसित यह कमीशन-तंत्र प्रशासन की ऐच्छिक अनदेखी के कारण खूब फल-फूल रहा था। माधो-जैसे लोग ही उनके लक्ष्य होते थे, जो आसानी से उनके जाल में फँसते भी थे और ऊपर से उन्हें दुआएँ भी देते थे।

कहीं लोकतंत्र हाईजैक तो नहीं हो गया?

चुनावी प्रक्रिया लोकतंत्र में नागरिक भागीदारी को सुनिश्चित करती है। परंतु चुनावी प्रक्रिया में यदि अपारदर्शिता हो, संदेह की उँगलियाँ उठ रही हों तो यह लोकतंत्र के लिए ख़तरा है।

सामाजिक न्याय के अस्पताल में शिक्षा की शव-परीक्षा

‘सामाजिक न्याय’, ‘सबका साथ, सबका विकास’ आदि आजकल बास्केट बॉल खेल की गेंद की तरह हर राजनीतिज्ञ के हाथ में उछलता हुआ जुमला है और हर दल इस गेंद को अपने पाले में करने की कोशिश में लगातार लगा हुआ है. यह जुमला/नारा/वादा इतना लोक-लुभावन और प्रभावी है कि जो कोई भी इस नारे का अपने पक्ष में जितना ज्यादा उपयोग कर लेता है, वह सत्ता पर उतनी मजबूती के साथ कायम हो जाता है. अर्थात अवाम को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए राजनीतिक दलों के पास यह परीक्षित और कामयाब हथियार है.

आपातकाल का पुनरावलोकन -1 : क्या संविधान की हत्या हुई थी?

12 जून, 2024 को केंद्र सरकार ने घोषणा की कि 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाया जायेगा। ज्ञात हो कि 25 जून, 1975 को ही आपातकाल की घोषणा की गई थी। 25 जून, 1975 से 21 मार्च, 1977 तक अर्थात् 21 महीने की इस कालावधि को ‘लोकतंत्र की हत्या’, भारतीय इतिहास का काला अध्याय’ आदि विशेषणों से अभिहित किया जाता रहा है। इस घटना के व्यतीत हुए 49 वर्ष बीत चुके हैं। उस आंदोलन में भाग लेने वाली पीढ़ी के अनेक लोग अब नहीं हैं और जो बचे हैं, वे जीवन के अंतिम पड़ाव पर हैं। आम जीवन की स्मृतियों में वह प्रसंग धुँधला हो गया है। फिर आज वह कौन-सी विशेष बात हो गई, जिसके कारण आधी शताब्दी पूर्व के प्रसंग को पुनर्जीवित करने की ज़रूरत आ पड़ी?

हिन्दी साहित्य में विद्यापति का स्थान

यह आलेख हिन्दी साहित्य में विद्यापति के महत्व पर प्रकाश डालता है। वे एक ओर ‘वीरगाथकाल’ के सर्वाधिक प्रामाणिक कवि हैं, वहीं दूसरी ओर भक्तिकाल और शृंगारकाल के भी उपजीव्य हैं। हिन्दी-साहित्य में गीत की परंपरा के स्रोत-पुरुष भी विद्यापति ही ठहरते हैं। इस तरह हिन्दी साहित्य में जितना दीर्घगामी प्रभाव विद्यापति का है, उतना किसी दूसरे कवि का नहीं है। ………. यह आलेख पहली बार मुजफ्फरपुर से प्रकाशित होने वाली आनंद मंदाकिनी के जनवरी-मार्च, 1990 अंक में प्रकाशित हुआ था और पुनः इसका मैथिली अनुवाद 2005 में चेतना समिति, पटना की स्मारिका में प्रकाशित हुआ।

बरगद कभी नहीं मरता

पुराने लोग कहते हैं कि उन्होंने पुरखों से सुना है कि पहले भी बरगद एक बार इसी तरह झुक गया था, मानो कमर टूट गयी हो। उस समय भी इसी तरह बाढ़ और तूफ़ान ने एक ही साथ क़हर मचाया था। गाँव के लोग बरगद के झुक जाने से उदास हो गये थे और उन्हें लगा था कि बरगद अब कभी नहीं उठेगा। लेकिन लोगों की उदासी को प्रसन्नता में बदलते हुए यह फिर से खड़ा हो गया था। यह बरगद है। कभी मर नहीं सकता। सदा झुका हुआ भी नहीं रह सकता। इसीलिए इसकी अमर जिजीविषा इसे फिर से खड़ा कर देगी।