Category राजनीति

समावेशी लोकतान्त्रिक राजनीति और मुसलमान

राजनीति में मुस्लिम प्रतिनिधित्व का घटते जाना चिंता का विषय है। इसे केवल एक प्रमुख समूह की राजनीतिक उपेक्षा के रूप में नहीं देखा जा सकता है, बल्कि इसके दूरगामी राजनीतिक कुप्रभाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।

बछवाड़ा विधानसभा क्षेत्र : काँटे की टक्कर के बीच मिनी बिहार में तब्दील  

पिछले लेख में आपने पढ़ा था तेघड़ा विधानसभा क्षेत्र के चुनाव का विश्लेषण। इस लेख में प्रस्तुत है बछवाड़ा विधानसभा क्षेत्र के चुनाव का विभिन्न आधारों पर विश्लेषण।

एनडीए : बहुत कठिन है डगर पनघट की (तेघड़ा विधानसभा चुनाव का विश्लेषण)

इस विश्लेषण में लेखक ने तेघड़ा विधानसभा के चुनावी परिदृश्य का विश्लेषण किया है। लेखक के अनुसार चुनाव आसान नहीं है। लेकिन संभावनाओं का विश्लेषण किस ओर इंगित करता है, इसे जानने के लिए पढ़ें यह लेख -

‘शुद्ध’ मतदाता सूची की अशुद्धता

क्या बिहार में मतदाता सूची वास्तव में 'शुद्ध' हो गई है?इस आलेख में, जमीनी स्तर के प्रमाणों के साथ एसआईआर की अंतिम सूची, जिसे 'शुद्ध' कहा गया है, का विश्लेषण प्रस्तुत है।

बिहार का पलायन : एक बड़ा चुनावी सवाल

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 ऐसे समय पर हो रहे हैं जब युवाओं का पलायन राज्य के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। लाखों लोग रोज़गार और बेहतर अवसर की तलाश में बाहर जा चुके हैं, जिससे गांव और कस्बे खाली होते जा रहे हैं। यह चुनाव इस सवाल का सामना करेगा कि क्या राजनीति अब सच में रोजगार और विकास को केंद्र में रखेगी, या फिर बिहार एक बार फिर पीछे छूट जाएगा।

जेन-जी आंदोलन एवं नेपाल में लोकतंत्र का भविष्य

a large crowd of people standing in a street
दक्षिण एशिया के कई देश राजनीतिक अस्थिरता और आंदोलनों के थपेड़ों को झेल रहे हैं। इसी की अगली कड़ी नेपाल का जेन-जी आंदोलन है। नेपाल का आंदोलन वहाँ के आर्थिक-राजनीतिक परिदृश्य का परिणाम है। सत्ताधारियों को इस आंदोलन से सीख लेकर राज्य की नीतियों को जनोन्मुखी बनाने की जरूरत है।

भारत के लोकतंत्र की अनूठी कहानी: पश्चिमी विशेषज्ञों की समझ से परे

people gathering in a concert
यह लेख प्रोफेसर सल्वातोरे बाबोन्स के विचारों पर आधारित है, जिसमें वे बताते हैं कि भारत का लोकतंत्र पश्चिमी मॉडल से अलग और अद्वितीय है। वे मानते हैं कि सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, धार्मिक परंपराएँ और नागरिक भागीदारी इसकी मजबूती का आधार हैं, जिसे पश्चिमी विशेषज्ञ अक्सर गलत समझते हैं।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और पूँजीवाद

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ न तो धार्मिक संगठन है और न ही सांस्कृतिक। साहित्य, कला, संस्कृति के विकास में इसका कोई योगदान नहीं है। पूँजीवाद के दलदल में संस्कृति की खाल ओढ़कर खड़े इस संगठन की हुल्लड़बाजी के सिवा कोई उपलब्धि नहीं है।

पूँजीवाद की उच्चतर अवस्था है क्रॉनी कैपिटलिज्म

AI से जेनरेट किया गया प्रतीकात्मक चित्र
इस आलेख में क्रॉनी कैपिटलिज्म के वर्तमान चरित्र एवं उत्तर अवस्था का विश्लेषण किया गया है। यदि अंत तक पढ़कर लाइक, कमेंट और शेयर करते हैं तो, इस विचार-यात्रा में आपकी सहभागिता के कारण, हमें ख़ुशी होगी।

संविधान पर चर्चा या कांग्रेस पर वार?

लोकसभा के शीतकालीन सत्र में संविधान के 75वें वर्ष के उपलक्ष्य में संविधान पर विशेष चर्चा आयोजित की गई थी। सत्तारूढ़ दल और उसके मुखिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सारी ऊर्जा, लोकतंत्र के सशक्तिकरण और संवैधानिक मूल्यों को व्यावहारिक जीवन में उतारने के दृष्टिकोण की प्रस्तुति की अपेक्षा कांग्रेस की निंदा करते हुए खर्च हो गई।