रुपेश रॉय

रुपेश रॉय

शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना 
रुपेश रॉय एक समर्पित शोधार्थी हैं जिनका राजनीतिक विज्ञान में किया गया कार्य शासन, नीति और सामाजिक न्याय के बीच के अन्तर्संबंधों का अन्वेषण करता है। उनका शोध समकालीन समाज के सामने आने वाली चुनौतियों को समझने और संबोधित करने की प्रतिबद्धता से निर्देशित है।

हार के बाद क्यों शुरू होता है ‘आंतरिक लोकतंत्र’?

प्रस्तुत आलेख में चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस में हो रही टूट के बहाने भारत के राजनीतिक परिदृश्य की विवेचना की गयी है।

क्या डीके शिवकुमार बदल पाएंगे सत्ता-विरोधी राजनीति का चार दशक पुराना गणित?

"कर्नाटक का मतदाता आर्थिक प्रदर्शन, सामाजिक प्रतिनिधित्व और नेतृत्व विश्वसनीयता—तीनों का संयुक्त मूल्यांकन करता है।" - इसी आलेख से

उच्च शिक्षा में ग्रामीण क्षेत्रों का योगदान

"जब किसी गरीब किसान का बेटा या मजदूर की बेटी विश्वविद्यालय तक पहुँचती है, तब केवल एक छात्र शिक्षित नहीं होता—बल्कि एक पूरा परिवार, एक गाँव और एक पीढ़ी अपने भविष्य को बदलने की संभावना के करीब पहुँचती है।" - इसी आलेख से

आर्थिक संकट, सरकारी अपील और जनता पर बढ़ता बोझ

"सरकार का दावा है कि देश के पास पर्याप्त ऊर्जा भंडार है, लेकिन दूसरी तरफ प्रधानमंत्री स्वयं ईंधन बचत की अपील कर रहे हैं। यहीं से राजनीतिक प्रश्न उठते हैं? यदि स्थिति नियंत्रित थी, तो जनता से अचानक इतनी बड़ी मितव्ययिता की माँग क्यों की जा रही है?" - इसी आलेख से

दक्षिण की नई धुरी बनेगा तमिलनाडु

"तमिलनाडु का यह चुनाव केवल सरकार परिवर्तन की घटना नहीं है। यह उस नई राजनीतिक बेचैनी का परिणाम है, जिसमें युवा मतदाता पारंपरिक दलों से अलग विकल्प की तलाश कर रहा है। विजय उसी बेचैनी की राजनीतिक अभिव्यक्ति हैं।" - इसी आलेख से

20 साल की सत्ता से राज्यसभा तक

नीतीश कुमार की कहानी उस राजनीतिक बदलाव की कहानी है, जो, राष्ट्रीय राजनीति के दबाव में, सत्ता के केंद्र से हाशिये की ओर ढकेला जाता है।

सिद्धांत और सत्ता के बीच फँसी नीतीश की राजनीति

"भारतीय राजनीति में आदर्श और व्यवहारिकता के बीच संघर्ष नया नहीं है। अनेक नेता सिद्धांतों की बात करते रहे हैं, लेकिन समय और परिस्थितियों के दबाव में उनके निर्णय बदलते रहे हैं। नीतीश कुमार का हालिया कदम भी शायद इसी राजनीतिक यथार्थ का हिस्सा है।" - इसी आलेख से

हज़ारों करोड़ का चंदा, चुनिंदा कंपनियाँ और वही दल—क्या भारत का लोकतंत्र अब अमीरों का खेल बन चुका है?

"सवाल सीधा है और असहज करने वाला भी— भारत का लोकतंत्र किसके लिए काम कर रहा है? उस आम नागरिक के लिए, जो टैक्स देता है, वोट देता है और नियम मानता है? या फिर उन कॉरपोरेट कंपनियों के लिए, जो राजनीतिक दलों को हज़ारों करोड़ रुपये का चंदा देकर नीतियों तक सीधी पहुँच बना लेती हैं?" - इसी आलेख से

जब तेल पर यथार्थवाद, तो भूगोल पर संकोच क्यों?

"ईरान के साथ संबंधों का कमजोर होना भारत की मध्य एशिया, अफगानिस्तान और यूरोप तक पहुँच को सीमित करेगा—और यह एक ऐसी रणनीतिक रिक्तता होगी, जिसे भरने के लिए चीन तत्पर रहेगा।" - इसी आलेख से

विदेशी पूंजी-पलायन और रुपये का अवमूल्यन (2025): भारतीय अर्थव्यवस्था के अधूरे संक्रमण का राजनीतिक–अर्थशास्त्रीय पाठ

"रुपये का गिरना कोई आकस्मिक दुर्घटना नहीं; यह भारतीय विकास मॉडल के भीतर छिपे उस अंतर्विरोध का परिणाम है, जिसे तीन दशक से अनदेखा किया जा रहा है।" - इसी आलेख से