किसी भी लोकतंत्र में प्रतिनिधि एक ख़ास अवधि के लिए चुने जाते हैं, और फिर सत्ता में बने रहने के लिए उन्हें दुबारा चुनकर आना पड़ता है। यहाँ सत्ता के पास नैतिकता की एक चुनौती है — चुनाव की चुनौती। सत्ता अपनी शक्ति का नाजायज़ इस्तेमाल कर चुनाव की प्रक्रिया को अपने पक्ष में कर सत्ता में बने रहने की हर संभव कोशिश कर सकती है। हाल के समय में वैश्विक स्तर पर देखा जा सकता है कि नैतिकता और न्याय को ताक पर रखकर सरकारें चल ही नहीं, लोक तो रौंदते हुए भाग रही है। अमेरिका का ही उदाहरण ले लीजिए — यौन अपराधों में संलिप्त एक आदमी ना सिर्फ़ अमेरिका को ग्रेट बना रहा है, बाक़ी दुनिया को भी ग्रेट बनाने का उसने ठेका ले रखा है। मुझे नहीं लगता, बहुमत में अमेरिका की जनता चाहती होगी कि एक ऐसा आदमी जो माँ-बहनों की इज्जत को रौंदता हो, वह उस देश को चलाये, जहाँ अपनी बेटियों को हमें पालना है। तार्किक निष्कर्ष साफ़ है कि यह व्यक्ति सत्ता की शक्ति का दुरूपयोग कर ही राष्ट्रपति बना बैठा है।
भारत को ही देख लीजिए। “अबकी बार ट्रम्प सरकार” बनवाने वाले मोदी जी, डोनाल्ड से ही परेशान हैं। होना भी चाहिए, ना जाने कल क्या फरमान सुना दे। “माय फ्रेंड ट्रम्प” के साथ ऐसा लग रहा मोदी जी देश की विदेश नीति तय नहीं कर रहे, कहाँ मुँह छिपाना है, इसकी तैयारी कर रहे हैं। सदन चल रहा होता है, वे विदेश चले जाते हैं। लोकसभा में उन्हें विपक्ष की महिला सांसदों से डर लगता है। टीवी पर छाए रहते हैं। पर जनता या पत्रकारों या संसद में सवाल का जवाब नहीं, बस मन की बात करने में यकीन रखते हैं। जाहिर है, जनता परेशान है। चंद लोगों के हित की रक्षा करना ही जब सरकार की रणनीति बन जाती है, तब दंगे होते हैं। एकता का आह्वान होता है। पर, सिर्फ़ एक संप्रदाय विशेष को एक होकर किसी अन्य पंथ के ख़िलाफ़ राजनीति के लिए तैयार किया जाता है। क्योंकि समता, शिक्षा और न्याय देने में सरकार असमर्थ हो गई। देश की अर्थनीति को सत्ता संभालने में नाकाम रह गई।
एक तरह से देखा जाए तो जब सरकार पब्लिक द्वारा दिए गए टैक्स के पैसे का सदुपयोग करने में असफल हो जाती है, तब उसे सत्ता में बने रहने के लिए दंडनीति का प्रयोग करना पड़ता है। साम-दाम-दंड-भेद सब जायज लगने लगता है। आज लोकतंत्र का जो ढांचा है उसमें एक बुनियादी कमी है। कहने को हर लोकतांत्रिक देश संविधान से चलता है, पर सवाल यह उठता है कि हमारे प्रतिनिधियों को उस संविधान के बारे में कितना पता होता है, जिसकी वे शपथ लेते हैं? यह बिल्कुल जरूरी नहीं है कि हमारे प्रतिनिधि पढ़े-लिखे हों। कोई किसान, कोई मज़दूर, कोई आदिवासी, कोई भी इस देश का नेतृत्व कर सकता हो। तभी लोकतंत्र का कोई मतलब है। मगर जब उसे देश की जिम्मेदारी दी जाए, तब तो उसे पता होना चाहिए कि उस देश के संविधान में क्या लिखा है। किन शर्तों का पालन करने की वह शपथ लेने वाला है। चुनाव से छह महीने पहले उम्मीदवारों का नामांकन हो जाना चाहिए। अगले कुछ महीने उनकी ट्रेनिंग होनी चाहिए। ट्रेनिंग देने की जिम्मेदारी शिक्षकों, वरिष्ठ सेवा-निवृत अधिकारियों, न्यायाधीशों की गठित समिति की होनी चाहिए। किसी परीक्षा की कोई जरूरत नहीं है। उनकी परीक्षा तो जनता लेगी ही। मगर, ट्रेनिंग समिति को हर उम्मीदवार का रिपोर्ट कार्ड निकालना चाहिए, जिसमें उनकी चुनावी रणनीति, वर्तमान और पूर्व वादे आदि का जिक्र होना चाहिए। इसे जनहित में हर वोटर तक पहुँचाना चाहिए। साथ ही हर वोटर के पास उसकी जिम्मेदारी और अधिकारों की साफ़-सुथरी समझ हो, इसका ध्यान शिक्षा व्यवस्था को रखना चाहिए।
चुनाव के बाद हमारे प्रतिनिधियों की छह महीने और ट्रेनिंग होनी चाहिए जिसमें उन्हें संसदीय कार्य प्रणाली और शासन-प्रशासन के बारे में, वर्तमान स्थिति से पूर्व सांसदों को अवगत करवाने का मौका मिले। सत्ता का हस्तांतरण द्वेष या क्लेश का कारण ना बने, पक्ष और विपक्ष से कहीं जरूरी लोक है। लोक ही नहीं बचा, तो तंत्र क्या झाल बजाएगा?
क्या ऐसा संभव है?
पब्लिक पालिका मॉडल के अंतर्गत ऐसा करना संभव हो सकता है, क्योंकि पब्लिक पालिका इस लोकतंत्र की आर्थिक इकाई होगी। इस मॉडल में हमारे टैक्स का पैसा केंद्र से पंचायत से होते हुए हम तक नहीं पहुँचेगा। बल्कि, हमारा पैसा पंचायत से होता हुआ, राज्य और केंद्र तक पहुँचेगा। ताकि पहले जो सरकार की बुनियादी जिम्मेदारी, जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य स्थानीय स्तर पर सुनिश्चित किया जा सके। जन सुविधाओं की आर्थिक जिम्मेदारी इस इकाई के पास होगी। सारी प्रशासनिक और सरकारी सेवाओं का भुगतान करना इस इकाई का काम होगा। जो बजट विधायिका पास करेगी, उसके प्रयोग और आवंटन की प्रक्रिया पब्लिक पालिका से होकर गुज़रेगा। यह इकाई लोकतंत्र का चौथा मजबूत खंभा बन पत्रकारिता को सरकारी ग़ुलामी से मुक्त कर सकती है। कार्यपालिका में प्रतिनिधियों और लोक सेवकों के बीच एक स्थायी इकाई बन लोकतंत्र का बिगड़ा संतुलन पब्लिक पालिका संभाल सकती है।
आइए! देखते हैं कैसे?
हर निर्वाचन क्षेत्र पर एक पब्लिक पालिका का गठन होगा। चाहे वह पंचायत का चुनाव हो, या लोकसभा का। इस क्षेत्र का हर नागरिक इस पालिका का सदस्य होगा। वह अपनी सार्वजनिक माँग पालिका के सामने रख सकता है। जैसा स्कूल या हॉस्पिटल में किसी सुविधा की कमी की। पब्लिक पालिका की निर्णायक समिति में चुने हुए जन प्रतिनिधियों के अलावा, अन्य बुद्धिजीवियों और संगठनों जैसे छात्र, मजदूर, किसान संगठनों के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे। जन पत्रकारिता और अन्य कला और साहित्य के संपादन के लिए भी पालिका में व्यवस्था होगी। जब स्थानीय स्तर पर बुनियादी जरूरतें पूरी हो जायेंगी, तब हमारे टैक्स का पैसा राज्य सरकार तक पहुँचेगा। जिसकी पहले जिम्मेदारी होगी कि उन पालिकाओं तक पैसे और संसाधन पहुँचाये, जहाँ कमी है। राज्य से होते हुए हमारा पैसा केंद्र तक पहुँचे, जो राज्यों की कमी को पूरा करे।
संभव है, आज यह एक कल्पना लगे। पर हो सकता है, कल यह लोकतंत्र की जरूरत बन जाए। आपको क्या लगता है, अपनी राय हमें जरूर बतायें। साथ ही अपने सुझाव भी हम तक पहुँचायें, ताकि इस मॉडल को हम और बेहतर बना सकें। एक बेहतर लोकतंत्र — इहलोकतंत्र बनाने में हम आपके सहयोग के अभिलाषी हैं।

युवा लेखक और चिंतक, दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री ( गोल्ड मेडलिस्ट)






