दरअसल गुजरात को लेकर, इतने लोगों ने और पहले चैटजीपीटी मैडम ने ( मेरे साथ शायद लड़की ही बतियाती है, लड़के मुझसे कहॉ टिक पाते हैं😃😃) बताया तो ‘स्टैचू ऑफ यूनिटी’ के लिए एक दिन बफर रखना ही पड़ा। डैम देखना, खासकर जाड़े में अच्छा फैमिली डेस्टिनेशन भी हो जाता है तो खैर ! हम सरदार सरोवर डैम के बहाने वहाँ पहुँच गए।
तो हम अहमदाबाद से एकदम छ: बजे सुबह निकल गए और आराम से रूकते-उतरते, सोते-अघाते, बतियाते-गुनगुनाते साढे ग्यारह तक सरदार सरोवर डैम के नर्मदा नदी वाले, नर्मदा जिले में पहुँच गए। हम बीच में बडौदरा से भी गुजरे, पर बस गुजर ही सके। यहाँ के पैलेस, बैंक ऑफ बड़ौदा के किस्से अपने आप में अनूठे हैं। मैंने यहाँ की वर्तमान महारानी के दो-एक लंबे इंटरव्यूज भी देखे हुए थे, वो मुझे आकर्षित कर गयी थीं। उनका, महारानी गायत्री के मायके से रिश्ता, नॉर्थ पोल के बर्फीले समंदर में उतरने वाली पहली महिला, बैंक बनने, रियासत खतम होने, उस समय कौड़ियों में बेशकीमती चीजों के बिकने का, अपने इस्टेट के खतम होने का दु:ख, अभी के महल के किस्से -कोने सब उन्होंने साझा किए थे। हम उसे देखने बीच में उतर नहीं सकते थे क्योंकि हमारे अकाउंट में जो समय था, वो बहुत सोच-समझकर खर्चना था।
तो सरदार सरोवर डैम के ही एरिया को टूरिजम व्यूप्वाइंट से वाइजली एक्सटेंड करते हुए स्टैचू ऑफ लिबर्टी, जंगल सफारी ( जो एक जू है, शायद पटना जून सा या उससे सादा ही), बटरफ्लाई एंड फ्लावर गार्डेन, क्रूज, बोटिंग, राफ्टिंग आदि में एलोबरेट करने की कोशिश की गयी है। वहाँ पर इवनिंग लेजर शो ऐडेड फ्लेवर था, जो अब ऐसे लाखों जगह पर आम से हैं।
तो हम ये सब एक महँगे यूनिफाइड टिकट पर निपटाते हुए दोपहर को पटेल जी के दर्शन के लिए पहुँचे। मेरे लिए पटेल जी एक महान व्यक्तित्व में से रहे हैं। एक चार सदस्यीय घर को जोड़कर रखना कितना कठिन है, मुझे हमेशा से ये खींचता है कि कितना मजबूत व्यक्तित्व रहा होगा उनका। कांग्रेस की सरकार, विपरीत विचारधारा का व्यक्ति बना पहला गृह मंत्री और साढे पाँच सौ से अधिक प्रिंसली इस्टेट को दु:खी कर, निराश कर, दुश्मनी मोल लेकर उनका विलय कर भारत को राज्यों का संघ बनाने की दिशा में मजबूत कदम बढा दिया। मेरे लिए वे उस समय के अग्रिम पंक्ति के नेता हैं, वे सब महान थे क्योंकि वे हमसे ज्यादा समझदार थे। वे मतभेद में थे, पर मनभेद ना रखकर साथ खड़े थे। और हम खोजते रहें, उन सबमें ग्रे जोन पर हमारी इतनी औकात है क्या। गांधी, नेहरू, पटेल हो या जिन्ना ही, वे बोल कहाँ रहे हैं कि वे बेदाग हैं। एक अणु में भी प्रोटोन है तो बराबर इलेक्ट्रॉन तो है ही। क्या हम नहीं सोचते हैं कि काश भगत सिंह में थोड़ा गांधीत्व होता और गांधी में सत्य को जीने और छुपाने का थोड़ा सा और साहस।
दुनिया की सबसे ऊँची मूर्ति, उसी तरह की भयावह भीड़, किसी पौराणिक मंदिर की तरह एक घंटे में एक-दो कदम सरकने वाली स्थिति से होते हुए हम भीतर लिफ्ट से ऊपर पहुँचे, जहाँ गैलरी में देखने के नाम पर ऐसा कुछ नहीं था। कुछ आदमकद ऐतिहासिक फोटोज, बस! ऊपर से उस भव्य मूर्ति के अंदर की इंजीनियरिंग जरूर दिखती है, जो साथ में एक इंजीनियर के रहने के कारण हमेशा मुफ्त में समझना पड़ता है। यह बढिया लगा, क्योंकि आप भव्यता के पीछे का मेहनत, खर्चा, दर्द, हैसियत आदि सब समझ जाते हैं और शायद फिर उसको निर्माण करना सफल हो जाता होगा और आपका देखने जाना भी। ऊपर से नदी दिखती है सूखी हुई, डैम जो अलग-अलग लोकेशन से आप ऐसे भी बाहर से बैटरी गाड़ी से घुमते हुए देखते हैं। डैम मुझे, राज को, काव्या को अलग-अलग उद्देश्य से आकर्षित करता है ( बहुउद्देशीय शायद इसलिए नाम है उसका😄😄)। तो बस परिसर में घुसकर नीचे बैठकर घंटों निहारकर समय बचाइए, भीतर घुसकर लिफ्ट से ऊपर गैलरी के अनुसंधान में समय जाया करना बुद्धिमानी नहीं है। अच्छा पर्यटन स्थल है यह कुल मिलाकर और बहुउद्देशीय परियोजना के संपूर्ण परिभाषा का पैसा वसूल कॉन्सेप्ट है। गुजरात ऐसे ही देश में सबसे आगे नहीं है…यहाँ बात-बात पर पैसा वसूल कर राज्य का कैपिटल बढाया गया है जबकि ट्रैफिक, अनुशासन में बिहार से कहीं भी आगे नहीं है। आज की तारीख में भी राजधानी में लोग बिना हैलमेट, बिना सीट बेल्ट धड़ल्ले से भाग रहे हैं और किसी टिकट रेस में मुझे क्यू सेंस नहीं दिखा मुझे।
खैर डैम है तो पहाड़ है, नदी है, हरियाली है और पीछे छूट गए कुछ वीरान कहानियाँ। हमने भीतर घुमने के लिए जो बैटरी गाड़ी हायर की, उसकी ड्राइवर महिला थी। हर वक्त मुस्कुराती, सांवली, मर्दानी-सी शानदार स्त्री। गुजराती खूब पैसे लेते हैं, पर वे शानदार सर्विस देते हैं। हमें लगता रहा कि ये इतने देर शाम कहाँ-कहाँ घुमाएगी पर वे साढे सात तक एक-एक कोना हमें ले जाती रही, पूरे धैर्य से हमारा इंतजार करती, कोई किच-किच नहीं। रात के जगमग-जगमग जागते उस एकता नगर में, नर्मदा की कहानी, वहॉ के डैम के पीछे लोकल्स का संघर्ष, मेधा पाटेकर सब मुझे याद आते रहे। स्टे को लेकर जानकारी लेने के दौरान, उसने बात-बात में बताया कि यहाँ कभी दो-एक गाँव थे जो भेंट चढ गए। कहीं रिहैविलिटेट किए गए होंगे या पता नहीं। कुछ कागज पर, समाचार में, अखबार में अच्छा हुआ होगा पर घर टूटना या छूटना कभी भी किसी के लिए अच्छा कहाँ हो पाता होगा!
और अब उसी जगह एक शानदार फाइव स्टार अमैनिटिज वाला दो सौ कपैसिटी का टेंट सिटी बसाया गया है। ऊपर डैम से जगमग दिख रहा था और स्विमिंग पूल पर इठलाते कुछ लोग। हमारा मन ललचाया, थोड़ा बजट से बाहर भी लगा पर कहते हैं न, ग्रे शेड हर इंसान का हिस्सा है, उससे आप किसी के अच्छाई वाले शेड को कमतर मत करिए। गांधी बनना आसान नहीं है, असंभव है। इसलिए उनपर राजनीति कम-से-कम मैं तो नहीं कर सकती। सारे भावों के उठते-गिरते लहरों को समेटकर हमने एक रात उस टेंट सिटी में रूकने का फैसला किया जहाँ कुछ पल पहले ही, वहाँ के विस्थापितों के लिए मेरा मन रो रहा था। हमें स्विमिंग पूल के ठीक सामने वाला कॉटेज मिला था, हमसब बहुत उत्तेजित थे, काव्या बहुत ज्यादा। हालाँकि हमने पैसे बचाने के लिए रात का खाना बाहर खा लिया और यह एक बुद्धिमानी भरा फैसला था, क्योंकि फिर हमारा प्रोटोन-इलेक्ट्रॉन मजे से संतुलन में रह सकता था, हमें चोरी-चपाटी की नौबत तक गिरना नहीं पड़ता। ब्रेकफास्ट हमारे पैकेज में था तो अगली सुबह की सारी ऐक्टिविटिज का पैसा वसूल कर हम ग्यारह बजे वहॉ से सानन्द विदा हुए।
दिसम्बर के अंत आते-आते, कहीं गॉड के अस्तित्व पर बहस छिड़काव हो गया, कहीं क्रिसमस पर चर्च जले, कहीं त्रिपुरा का बच्चा चाइनीज समझ लिया गया, कहीं बनारस के घाट पर जापानी को नदी में उतरने नहीं दिया गया के समाचार से दिमाग फटने लगा और लगा यह मूर्ति बहुत जरूरी निर्माण था। जिसने इस पूरे देश को एक रखने का खतरा मोल लिया था, आखिर में अब ये ठीकरा तो उसी के सर फूटना चाहिए कि झेलो अपनी गलती का नतीजा। देखते रहो ऊपर से ये जहालत कि हम एक कैसे हो सकते हैं। ये बकवास है कि गॉड है कि नहीं, कुछेक जावेद अख्तर को छोड़कर बाकी सब जानते हैं कि वो है पर वो हिन्दू का राम है, मुस्लिम का अल्लाह है, ईसाइयों का ईसा है…बाकियो का भी कुछ-न-कुछ है। पर वो कोई एक नहीं है। और जबकि वो एक नहीं है तो तुमने कैसे सोच लिया कि ये साढे पाँच सौ रियासतों में बँटा देश, लाखों जातियों और दसियों धर्मों में बँटा देश कभी एक होकर भारत हो जाएगा। बुत बनकर खड़े रहो और कुढ़ते रहो अपनी गलती पर, आखिर यही तो तुम्हारे व्यक्तित्व का था ग्रे शेड। हम जेन जी हैं, फिलहाल हमारा सारा काम AI करता है, हमने बस इतिहास में छुपे सबके ग्रे शेड को उजागर करने का ठेका अपने सर ले लिया है। काश पटेल अपने समय में वापस जी उठते और उस समय के भारतीयों से पूछते कि भारत तुम सबका था तो फिर इतना बँटा हुआ कैसे था और अगर तुम सब सातवीं सदी में ही इतना बँटे ही हुए थे कि एक आक्रमणकारी को नहीं रोक सके तो फिर आज भारत को बस अपना समझने का ठेका खुद से अपने सर कैसे ले रहे हो!
[गुजरात का द्वारिका, सोमनाथ, कृष्ण कनेक्शन, सीधा पल्ला साड़ी और अंगिका के ‘छै’ सा ‘छू’ आंत शब्दों पर शोध बाकी रहा पर ये मुझे जानना ही है।]
और स्टैचू ऑफ यूनिटी दरअसल भारतीयता का मानक तब होगा जब हम पंजाब, सिध, गुजरात, मराठा, द्राविड़, उत्कल, बंगा, विंध्य, हिमाचल, यमुना, गंगा उच्छल- जलधि – तरंगा… के सम्भाव को समझ पायेंगे तब तक हम भारतीय कहलाना डिजर्व नहीं करते।

सामाजिक-समसामयिक विषयों पर पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र रचनाकार
( तीन किताबें प्रकाशित, शरारत, अनुभूति, सफेद चेहरा)
पटना, बिहार



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