शिक्षा का बाजारीकरण, सत्ता की विफलता और युवाओं के सपनों पर हमला

"NEET जैसी परीक्षाएँ अब “प्रतिभा की परीक्षा” कम और “व्यवस्था की सड़ांध” का प्रतीक अधिक बनती जा रही हैं।" - इसी आलेख से

NEET 2024 में पेपर लीक हुआ। करोड़ों छात्रों की मेहनत, उम्मीद और भविष्य पर सवाल खड़े हुए। देशभर में विरोध हुआ, छात्रों ने न्याय की माँग की, लेकिन सत्ता ने हमेशा की तरह मामले को दबाने और संभालने की कोशिश की। जाँच एजेंसियाँ सक्रिय हुईं, कमेटियाँ बनीं, बयान दिए गए — मगर व्यवस्था नहीं बदली। परिणाम यह हुआ कि 2026 में फिर वही शर्मनाक स्थिति सामने आई। पेपर फिर लीक हुआ, छात्र फिर सड़कों पर आए, और सरकार फिर “जाँच” का आश्वासन देने लगी।

यह कोई साधारण प्रशासनिक विफलता नहीं है। यह उस शिक्षा व्यवस्था का परिणाम है, जिसे पिछले वर्षों में योजनाबद्ध तरीके से बाजार और निजी मुनाफे के हवाले किया गया है।
आज शिक्षा ज्ञान का माध्यम नहीं, बल्कि मुनाफे का उद्योग बना दी गई है। कोचिंग माफिया, निजी शिक्षा, दलाल नेटवर्क और सत्ता-समर्थित भ्रष्ट तंत्र मिलकर ऐसी व्यवस्था बना चुके हैं जहाँ गरीब और मेहनतकश परिवारों के बच्चों के लिए अवसर लगातार सीमित होते जा रहे हैं। NEET जैसी परीक्षाएँ अब “प्रतिभा की परीक्षा” कम और “व्यवस्था की सड़ांध” का प्रतीक अधिक बनती जा रही हैं।

जो छात्र गाँवों, कस्बों और मजदूर-किसान परिवारों से आते हैं, वे दिन-रात मेहनत करके इस उम्मीद में तैयारी करते हैं कि शिक्षा उनके जीवन को बदल सकती है। लेकिन हर पेपर लीक के साथ उनका विश्वास टूटता है। दूसरी ओर, पैसे और पहुँच रखने वाले वर्ग के लिए शिक्षा व्यवस्था में “शॉर्टकट” उपलब्ध हैं। यही पूँजीवादी असमानता का असली चेहरा है — जहाँ मेहनत करने वाला युवा हाशिए पर धकेला जाता है और भ्रष्ट गठजोड़ फलता-फूलता है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर बार-बार पेपर लीक क्यों हो रहे हैं? क्या यह केवल तकनीकी कमजोरी है? नहीं। यह उस व्यवस्था द्वारा लादा गया संकट है, जहाँ सार्वजनिक संस्थाओं को लगातार कमजोर किया गया, जवाबदेही खत्म की गई और शिक्षा को सामाजिक अधिकार की जगह “प्रतिस्पर्धी बाजार” में बदल दिया गया।

प्रधानमंत्री “परीक्षा पे चर्चा” करते हैं, लेकिन जब छात्र पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन करते हैं तब सत्ता की संवेदनशीलता गायब हो जाती है। कैमरों के सामने युवाओं की चिंता जताई जाती है, लेकिन वास्तविक संकट के समय सरकार की प्राथमिकता छात्रों को न्याय देना नहीं, बल्कि अपनी छवि बचाना बन जाती है।

शिक्षा मंत्री की जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल हैं। यदि राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाएँ बार-बार भ्रष्टाचार और धांधली की शिकार हो रही हैं, तो केवल जाँच बैठा देना पर्याप्त नहीं है और न ही एक दो निचले स्तर के व्यक्ति को गिरफ्तार कर देना भर है लोकतंत्र में जवाबदेही का अर्थ पद से चिपके रहना नहीं, बल्कि विफलता की जिम्मेदारी स्वीकार करना होता है। लेकिन आज की सत्ता में नैतिकता की जगह प्रचार ने ले ली है।

असल में यह संकट केवल NEET का नहीं है। यह उस आर्थिक-राजनीतिक मॉडल का संकट है, जहाँ युवाओं को रोजगार नहीं, प्रतियोगिता दी जाती है; अधिकार नहीं, भ्रम दिए जाते हैं; और शिक्षा नहीं, “एग्जाम इंडस्ट्री” दी जाती है। करोड़ों युवा बेरोजगारी, महंगी शिक्षा, निजीकरण और असुरक्षित भविष्य के बीच पिस रहे हैं। पेपर लीक उसी सड़ चुकी व्यवस्था का परिणाम है।
रोजगार की कोई नीति नहीं है मात्र कुछ ही ऐसी डिग्री है, जो आज भी भरोसा दिलाती है कि आप इस डिग्री को प्राप्त करते ही निश्चित रूप से बेरोजगार नहीं रहेंगे। इसी का परिणाम है कि आज हिन्दुस्तान के अधिकांश बड़े शहरों में NEET और JEE की तैयारी कराना एक बड़ा उद्योग बन गया है। इसमें बड़े बड़े पूँजीपति अपना धन लगा रखे हैं और प्रत्येक छात्र से मोटी फीस वसूल रहे हैं और फिर सफल छात्रों को अपने बड़े-बड़े होल्डिंग पोस्टर में लगा कर ऐसे प्रचारित करते हैं, जैसे वो छात्र नहीं उनकी कम्पनी का कोई प्रोडक्ट है

हालांकि आज का यह लेख पेपर लीक पर आधारित है अन्यथा एक और बड़ा घोटाला उस पोस्टर में भी दिख जाएगा ।

जरूरत केवल दोषियों की गिरफ्तारी की नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था को बाजार और मुनाफाखोर तंत्र से मुक्त करने की है। शिक्षा को मौलिक सामाजिक अधिकार की तरह लागू करना होगा। सार्वजनिक शिक्षा संस्थानों को मजबूत करना होगा। परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी और लोकतांत्रिक बनाना होगा। और सबसे महत्वपूर्ण — युवाओं की मेहनत और सपनों के साथ हो रहे इस अन्याय के खिलाफ व्यापक सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष खड़ा करना होगा।

क्योंकि जब शिक्षा बिकने लगती है, तो सबसे पहले गरीब का सपना मरता है।

(यह लेखक का निजी विचार है। ‘लोकजीवन’ का इससे सहमत-असहमत होना आवश्यक नहीं है।)

जन पत्रकारिता को समर्थन देने के लिए उपर्युक्त QR Code को स्कैन करके 20, 50 या 100 रुपये की सहायता राशि प्रदान कर सकते हैं।
जन पत्रकारिता को समर्थन देने के लिए उपर्युक्त QR Code को स्कैन करके 20, 50 या 100 रुपये की सहायता राशि प्रदान कर सकते हैं।
अमर नाथ
अमर नाथ

शिक्षक, भौतिक बिज्ञान
कोषाध्यक्ष, बिहार राज्य समिति, एटक

Articles: 8

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *