दो साल, 11 महीने और 18 दिन में 64 लाख रुपये 389 लोगों ने मिलकर खर्च कर दिए। इस दर पर प्रति व्यक्ति प्रति दिन 15 रुपये 26 पैसा खर्चा कर रहा था, मतलब महीने का 457.8 रुपया। बात सन् 1950 की है। अगर महँगाई को ध्यान में रखते हुए अनुमान लगायें तो संविधान सभा के हर सदस्य पर 50-55,000 रुपये खर्च हुए। आज तो हर सांसद की तनखा दुगुनी है, अलग से ना जाने कितनी सुविधाएँ भोग रहे हैं। फिर भी इनका खर्चा पूरा नहीं पड़ रहा। यही नहीं, हर मिनट संसद चलाने में ही दो-ढाई लाख खर्च हो रहे हैं, डेढ़ करोड़ प्रति घंटा छह घंटे की बहस के लिए। इस रफ़्तार से दिन का लगभग 9 करोड़, और साल का लगभग 700 करोड़ रुपये तो हम, भारत के लोग केंद्र सरकार को बस बकवास करने के लिए दे रहे हैं। अब सोचिए, राज्य से लेकर पंचायत पर कितना खर्चा हो रहा होगा?
हम यह खर्चा कर क्यों रहे हैं? ताकि जन, गण, मन अधिनायक बने रहें। जो जन्म लिया जन बन गया। कई जन मिलकर भीड़ बनाते हैं। जब जन के मन मिलकर एक समूह बनाते हैं, तब गण कहलाते हैं। मन का मिलना, विचारों के मतभेद में भी संभव है। समस्या मतभेद में नहीं है, समस्या मतभेद के केंद्र में होती है। अगर केंद्र में अमृत है, तो मंथन जरूरी है। विष्णु पुराण में सुर, असुर ने मिलकर मंदार पर्वत से समुद्र मंथन के द्वारा अमृत निकाला था। क्या अकेले देवता यह कर पाते? घी निकालने के लिए दही को मथना ही पड़ता है।
भागलपुर-दुमका राज्य मार्ग पर भागलपुर से लगभग 40-50 किमी पर बांका में मंदार पर्वत स्थित है, जहाँ समुद्र मंथन हुआ था। मेरी जन्म भूमि यहीं है। आज से दो साल पहले गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर मैंने कुछ बच्चों को करतब करते देखा। उनके फटे कपड़े, चीथड़ों पर उनका करतब बता रहा था कि शायद ही आज उनको जलेबी मिलेगी। वे बस जन हैं, वैसे भी गण की गिनती तक में आज घोटाला चल रहा है। उस दिन मैंने अपनी चार साल बेटी को एक चिट्ठी लिखी थी:
मेरी प्यारी तितली 🦋
तुम्हारा पिता,
तुमसे से वादा करता है, तुम्हें वो इस काबिल बनाएगा कि एक देश के लोकतंत्र की गद्दी को चुनौती दे सको। तुममें इतनी ऊर्जा और ईमानदारी होगी की तुम इस लोक में इस तंत्र को सम्भाल सको। फिर तुम अपने जैसा इस देश की हर बेटी और उनके भाइयों को बनाना, ताकि वे तुमसे तुम्हारी गलती का हिसाब संवैधानिक तरीक़े से ले सके। अगर वे तुमसे काबिल निकले तो तुम गद्दी छोड़ देना। तुम उस गद्दी के काबिल नहीं हो, सहजता से मान लेना अपनी कमियों को। फिर उन कमियों को दूर कर पाओगी और तुम्हें अहंकार का कभी सामना नहीं करना पड़ेगा। तुम विपक्ष के साथ भी विकास कर सकती हो, ये भरोसा उन्हें हर पल जताते रहना। उनका सम्मान करना।
बिटिया! तुम इस देश को सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाना। बेटा! तब आएगा अमृतकाल। तुम इंतज़ार ही मत करना, एक दिन बग़ावत भी करना। ये अमृतकाल तुम्हें हर पल बनाये रखना है। ये बताना कि हर पल में एक पूरा युग बसता है। सोचो आज तुम जहाँ भी हो, वहाँ सिर्फ़ इसलिए हो, क्योंकि तुम वहाँ ज़रूरी हो। तुम्हारा जीवन हर पल परफ़ेक्ट है, ये तुम हर पल याद रखना। तुम्हें कभी उदासी नहीं पास बुलाएगी, सुख की सखियाँ साथ निभाती रहेंगी।
अभी और बहुत काम बाक़ी हैं, जल्द मिलेंगे!
तुम्हारा,
सुक्कू
आज भी जब मैं अपने आस-पड़ोस में देखता हूँ, बहुत नहीं बदला। अब सब कुछ ऑनलाइन हो गया है। हमारे बच्चे मुजरा अब ऑनलाइन कर रहे हैं। छोटे-मोटे बच्चे तो प्रवचन दे रहे हैं, और जन का बस मन लगा हुआ है। गण को तो भक्ति चला रही है। व्यवस्था तो अब बची है। जहाँ दिखते हैं, लोग अनमने ढंग से जिए जा रहे हैं। मजदूर होने में कोई बुराई नहीं है, मजबूर होने में क्या अच्छाई है? यहाँ मैं आपके सामने मजबूर हूँ। मैं प्रेमचंद की तरह ख़ुद भी कलम का मजदूर हूँ। मुझे मेरी मजदूरी नहीं मिल रही।
मेरे पिता हिंदी विभाग के अध्यक्ष होकर सेवानिवृत हुए। बचपन से उन्होंने मुझे बाल उपन्यास से लेकर महाभारत, रामायण और संविधान तक लाकर दिया। महाभारत के अठारह खण्ड मेरे क़द से भी ऊँचे थे। मुझे तब पढ़ना कहाँ आता था। पर पिताजी कहानियाँ सुनाया करते थे। लेखक बनने का सपना मेरा बचपन से रहा है। एक दिन मैंने पिताजी पूछा कि कोई लेखक कैसे बनता है? उनका जवाब बड़ा सरल था। जो लिखता है, लेखक है। मैंने लिखना शुरू कर दिया। दो साल तक मैं लिखता चला गया। हर दिन। आप मेरी किताबों को पढ़ सकते हैं। लिखने से पहले मैंने बहुत पढ़ाई भी की। Information Technology से BTech की डिग्री भी मिली। जिसका परिणाम हुआ कि मैंने अपनी रचना को दुनिया के सामने रख दिया। आप मेरे ब्लॉग और पब्लिक पालिका के वेबसाइट पर मेरा काम देख सकते हैं।
पब्लिक पालिका वह सपना है जो आज हमें गणतंत्र के सपने को सच करने में अहम भूमिका निभा सकता है। क्या होता है गणतंत्र?
गणतंत्र वह व्यवस्था है, जिसमें सत्ता किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि जनता की सामूहिक चेतना और सहमति की होती है। सत्ता के शीर्ष पर पहुँचने की क्षमता हर जन के मन में हो, बस यही गणतंत्र है। मन का जो अधिनायक है, वही तो स्वराज का अधिकारी है। हमें अधिकारी नहीं बनना, हमें तो बस ख़ुद का भाग्य-विधाता बनना है।
आज के हालात पर कविता के साथ मैं आपको गणतंत्र दिवस की मंगलकामना देता हूँ।
रोज़ जीता, मरता हूँ,
हर दिन भागता फिरता हूँ,
मैं ही पैदा होता हूँ,
मैं ही मरने वाला हूँ।
मैं पब्लिक हूँ।
कभी स्कूल में, कहीं दफ्तर में,
मैं हर जगह पाया जाता हूँ,
मैं सब कर्ता-धर्ता हूँ,
मैं ही तो भाग्य विधाता हूँ।
मैं पब्लिक हूँ।
पैसा मेरा, सरकार मेरी,
फिर भी सड़कों पर गड्ढे पाता हूँ,
कभी रेलों में, कभी मेलों में कुचला जाता हूँ,
न्यायालय से लेकर हॉस्पिटल के चक्कर मैं लगाता हूँ।
मैं पब्लिक हूँ।
साँस बड़ी मुश्किल से लेता हूँ,
पानी भी गंदा पीता हूँ,
शोर शराबे में जीता हूँ,
पाँच किलो अनाज पर मैं ज़िंदा हूँ।
मैं पब्लिक हूँ।
मर-मर कर सरकारी खजाना भरता हूँ,
फिर फ़ीस से लेकर फाइन पर साइन करता हूँ,
शिक्षा, सेहत से लेकर मौत पर खर्चे करता हूँ,
कुछ और नहीं तो देश-दुनिया पर चर्चे मैं करता हूँ।
मैं पब्लिक हूँ।
हर पार्टी, हर मज़हब में मैं ही पाया जाता हूँ,
इस लोक और इसके तंत्र को मैं ही तो चलाता हूँ,
मैं ही प्रधान से लेकर संतरी सेवक बनता हूँ,
बाजार से लेकर परिवार मैं ही तो बनाता हूँ।
मैं पब्लिक हूँ।
नायक भी मैं, खलनायक भी मैं,
मैं ही तो अधिनायक हूँ।
जन-गण में मैं,
मैं ही मंगलदायक हूँ।
मैं पब्लिक ही नहीं, रिपब्लिक हूँ।

युवा लेखक और चिंतक, दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री ( गोल्ड मेडलिस्ट)









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