इन दिनों, जन पत्रकारिताइन दिनों : लोकतंत्र और निरंकुश सत्ता"हर तानाशाह के कुछ चमकते नारे होते हैं, जिसमें जनता उलझ-पुलझ कर रहे जाती है। जनता नारों का गुलाम बन कर देश की गुलामी पर दस्तखत कब कर देती है, इसका पता नहीं चलता।" - इसी आलेख से डॉ योगेन्द्रMarch 2, 2026