
"आज हम, भारत के लोग सिर्फ़ इसलिए कष्ट नहीं झेल रहे कि देश की अर्थव्यस्था संकट में है। बल्कि हमारे सामने आपदा यह है कि जितना भी संसाधन हमारे पास है, उसका प्रबंधन हम, भारत के लोग नहीं कर पा रहे हैं।" - कैसे? पढ़ें यह आलेख

"जीवन अर्थवान है। इस अर्थ के वितरण की एक परिकल्पना है, पब्लिक पालिका। इस लोकतंत्र को एक चौथा मजबूत खंभा चाहिए, वह खंभा आर्थिक हो सकता है। पत्रकारिता तो दर्शक मात्र है। कहीं से सुनकर ख़बरें सुनाती है। आर्थिक अगर कोई खंभा होता तो सोचिए!" - इसी आलेख से।

"रुपये का गिरना कोई आकस्मिक दुर्घटना नहीं; यह भारतीय विकास मॉडल के भीतर छिपे उस अंतर्विरोध का परिणाम है, जिसे तीन दशक से अनदेखा किया जा रहा है।" - इसी आलेख से

भारत आज विकास की राह में एक चौराहे पर खड़ा है। लोकतंत्र की ताक़त और आर्थिक आज़ादी को मिलाकर हम नई ऊँचाइयों तक पहुँच सकते हैं।