"जाति एक दड़वा बनाती है, जिसमें इंसान घुटता रहता है। जाति के हजारों दड़वे हैं और उन दड़वों में इंसान जितना भी स्नान कर ले, लेकिन देह पर फिर भी मैल जमी ही रहती है, मुक्तिबोध के ब्रह्मराक्षस की तरह।" - इसी आलेख से
"आजादी की लड़ाई में जाति थोड़ी दबी थी। एकजुटता का बोध बढ़ा था। आजादी के बाद की राजनीति ने जातियों को और गाढ़ा किया है और अब सिर पर नाच रहा है।" - इसी लेख से