एक जगह पढी यह बात मुझे सारी रात कचोटती रही। यह बात कोई माने न माने, कुछ धर्म अपनी जिद और जटिलताओं के चक्कर में संख्यात्मक भले खूब बढा हो, गुणात्मक ग्रोथ के स्केल पर उसका चढना बाकी रह गया।
यह सच भी है शायद। मुझे व्यक्तिगत साहित्य, सीरियल, संस्कृति इस्लाम के पसंद हैं। मैं पाकिस्तान के ड्रामे खूब देखती हूँ, मैं महकता ऑचल जैसी किताबें पढ़कर स्टेशन पर समय काटती बड़ी हुई। पाकिस्तान के ड्रामे में एक अलग लिबरेलाइजेशन को दिखाने की कोशिश है। वहॉ बुर्खा, दाढी तो दिख ही नहीं सकता, लड़कियाँ आराम से बिना दुपट्टे, कॉलेज जाती दिखाई जाती हैं। लड़कियों को हर दूसरे सीरियल में बिजनेसवुमन दिखाया जाता है, वे धड़ल्ले से गाड़ियाँ चलाती हैं। वहॉ के शायद ही किसी कहानी में, कभी आतंकवाद की चर्चा भी हो। वहॉ, सरकार पर, राजनीति पर, भ्रष्टाचार और गरीबी पर मजाक में किए व्यंग्य के डायलॉग जरूर होते हैं। वहॉ एक सकारात्मक स्वप्न है। सिनेमा, समाज का दर्पण है…मतलब वहॉ का समाज, ऐसी सहज संस्कृति चाह रहा है।
पर भारत में, उसी धर्म में, पहनावे-ओढावे, चाल-ढाल में एक अलग पहचान की किल्लत और जद्दोजहद नजर आती है…बेचैनी सी, अपने अस्तित्व और असर को स्थापित करने की। ढकोसलापन की सनक बढती दिखती है, कुछ संस्कृति और समय की माँग थी, अब समय जा चुका है। उसे बदलने की बजाय, धर्म के नाम पर उसे ढोए जा रहे हैं, ऊपर से उसकी शान में कसीदे भी पढ रहे हैं। अतार्किक बातों में भी जबरदस्ती सहमति दिखा रहे हैं, क्योंकि मामला हमारे धर्म का है।
तो फिलहाल जो पहली पंक्ति लिखी…उसका लक्षणार्थ ये है कि कुछ वर्षों में हिन्दुओं में भी वो सनक बढता दिख रहा है। क्रिसमस में चर्च जल रहे, युवाओं को पार्क में पीट रहे, नदी – मंदिर में किसी खास को जाने से रोक रहे। दूसरे धर्म के त्योहार में रुकावट बन रहे हैं तो अपने त्योहार को तमाशा बनाने पर तुले हैं। अरे, जबकि यह बस धर्म का विषय नहीं है, यह आपकी संस्कृति के हनन का विषय है। लोग अपने वैल्यू भूल पार्क को, बेडरूम बना बैठे, आप सोशल मीडिया का कुछ नहीं कर पा रहे। आपने उसे धर्म से जोड़ दिया। आपकी नदी महा गंदी हो चुकी है, आप फैक्ट्रीज से लेकर, पूजा के सामान और नाले तक का कुछ नहीं कर सकते, आप उसे धर्म से जोड़कर फ्रस्ट्रेशन निकालने लगे। मतलब, निराशा किसी और बात की है। रोजगार हो, जनसंख्या पर डॉक्टर और जज हों, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हो पर ये सब मिले कैसे, माँगे किससे। तो लो, बाँट लो जाति-धरम और फिर एक का देश मानकर बाकी के विरुद्ध उन्माद खड़ा करो। हिन्दू बाहुल्य है पर हिन्दुओं का ही है, ये थोड़ा अस्वीकार्य है। फिर ये हिन्दू थे कहाँ जब 712 ईस्वी में मोहम्मद बिन कासिम आया और तब, जब पूरा कश्मीर हिन्दू से मुसलमान बना। आर्यन तो खुद दो हजार साल पहले भारत आए…
इसलिए रीढविहीन बातों से बचना चाहिए। सर्वाइवल फॉर दैट फिटेस्ट है तो थ्यरी ऑफ नैचुरल सेलेक्शन भी है और थ्यरी ऑफ वैरिएशन भी है। सनातनता एक खूबसूरत कॉन्सेप्ट के साथ बढा है, हमें उसकी खूबसूरत विरासत को बचाने की जरूरत है, ना कि हो-हल्ला कर उसके कद को छोटा कर देने की। हम सही हैं, एक सच हो सकता है पर हम ही सही हैं… यह राजनीति तो नहीं, जरा सोचिए!

सामाजिक-समसामयिक विषयों पर पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र रचनाकार
( तीन किताबें प्रकाशित, शरारत, अनुभूति, सफेद चेहरा)
पटना, बिहार






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