मैं लालटेन युग में पैदा हुआ। गाँव में रोजमर्रे के अंधेरे को भगाने का एकमात्र माध्यम था- लालटेन और भनसा घर ( किचन) में तीन टाँगों वाला दीया (दीपक)। इस दीये की बत्ती लुकलुकाती रहती। अगर हवा थोड़ी तेज हो जाय तो इसकी बत्ती गुल हो जाती। घर में, छतों पर और गलियों में अंधेरा पसरा रहता। अगर कोई थोड़ा मातबर (अमीर) होता तो उसके पास एवरेडी वाली बैटरी लगी चोरबत्ती (टार्च) होती। गाँव में चोरी होती थी कभी-कभी। चोर दीवार के बाहर से सिंघकाटी काटते और घरों में घुस आते। उन दिनों ज्यादातर घर मिट्टियों के होते और छतें खप्पड़ों से सजी होतीं। जब भी गाँव में नाटक या शादी समारोह होता तो भाड़े पर डिलेट (पेट्रोमेक्स) लाया जाता। मंच पर डिलेट लटका रहता और सामने घुप्प अंधेरा रहता, जहाँ दर्शक रहते।
यह सब जानकर आपको लग रहा होगा कि उन दिनों बहुत पिछड़ा समाज था। हाँ, उन दिनों सामान कम था, मगर संबंधों का अद्भुत आनंद था- माँ, पिता, भाई, बहन तो थे ही, काका, काकी, चचेरा भाई, बहन, भौजाइयों का हुजूम था। होली, दिवाली, दुर्गा-दशहरा, काली, सरस्वती पूजा आदि में संवेदनाओं का जो प्रवाह था, वह बेमिसाल था। कभी-कभी इच्छा होती है कि जीवन में जितने सामान आये हैं, सभी विलुप्त हो जाय और संबंधों की दुनिया लौट आये। खेतों में धान और गेहूँ। प्याज, आलू। बारिश के दिनों में सब्जियों की भरमार रहती – परोल, बोड़ा, सतपुतिया। इतनी अधिकता में पैदा होती कि लोग तो लोग, बैलों को सानी-पानी में देना पड़ता। बच्चे तरह-तरह के खेल खेलते – गुल्ली ( कंचे), गुल्ली-डंडा, सेल-कबड्डी, गोबर के रस रस, दोलपत्ता, लुका-छिपी। जो थोड़े बदमाश हो जाते, वे ताश के पत्ते भी फेंटते। खास कर ट्वेंटी नाइन।
अब बिजली-युग है। उसके आगे रोबोटिक युग आ रहा है। यंत्रों से घिरी दुनिया और यांत्रिक होता मन। पहले चोर होते थे, फिर डाकू आये और जो अब आये हैं, वे न चोर लगते हैं, न डाकू। पोशाक ठीक-ठाक है। वेश साधुओं का है। बहुत से लोग उन्हें उद्धारक भी मानते हैं, लेकिन चोर और डाकू के परदादा लगते हैं। सुविधाएँ अभूतपूर्व ढंग से बढ़ी हैं। दतवन की जगह पेस्ट है। भोजन की जगह फास्ट फूड है। सुनते हैं कि कई देशों में स्लो फुड का आंदोलन शुरू हुआ है। मैं तो फास्ट फूड का मजा नहीं ले सका। न मुझे रुचा, न पचा। आधुनिक हो नहीं पाया। गाँव की चेतना में लटका रहा। वैसे यांत्रिक फूड खाते-खाते लोगों को अब प्राकृतिक फूड चाहिए।
पिछले वर्ष जब आम का सीजन था तो एक सज्जन कह रहे थे, मुझे बीजू आम चाहिए। चाय प्लास्टिक तक में आयी थी। बेचारी कुल्हड़ में लौटने लगी। एक समय घरों में स्टील के कप आ गये थे। फिर वे विदा हो गये। चाय पीते हुए ओंठ जल जाते थे।
मैं संक्रमण युग में खड़ा हूँ। जो युग था, वह छूट गया और जो सामने है, वह बहुत रास नहीं आ रहा। जिन्हें यंत्रों से बहुत प्यार है, वे बिहार के भागलपुर जिले के एक प्रखंड कहलगांव चले जायें। 1982 में गंगा मुक्ति आंदोलन शुरू हुआ था। हम साथी वहाँ जाते और उत्तरायणी गंगा, गंगा के मध्य तीन पहाड़ियों, कहलगांव की गलियों में बसे गाँव, लोगों की सहजता, उनके व्यवहार बुलाते रहते। आज है उनकी एनटीपीसी के फ्लाई ऐश, अभूतपूर्व ढंग से गिट्टियों और बालू से लदी ट्रकें और धूलों की आंधी। लोग वहाँ कैसे रहते हैं, वे लोग ही जानें। लोगों की मजबूरी है, जो जी रहे हैं। वरना, वह जगह रहने लायक नहीं है। जादुगोड़ा आदि जगहों में तो बच्चे तक विकलांग पैदा हो रहे हैं। विकास करो भाई, लेकिन ऐसा नहीं कि विकास का मतलब विनाश हो जाये।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







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