मैं क्यों कॉपी किताब पर वापस जा रहा हूँ? मेरे पास आईपैड है, मैकबुक है, किंडल है। मैं आईपैड पर अपनी लिखावट में नोट्स लिख सकता हूँ। मैकबुक पर मैं ना जाने कितने लेख लिख भी सकता हूँ, पढ़ भी। किंडल पर मैंने ना जाने कितनी किताबें ख़रीदी और पढ़ी। एक आभासी दुनिया मेरे सामने हैं। इंसानों से ज़्यादा मैं मशीनों से बात करता हूँ। विश्वास ना हो तो आप मेरे ब्लॉग पर, मेरी किताब में मेरी कहानी पढ़ सकते हैं। पर आप क्यों पढ़ेंगे? पढ़ना तो आपको ख़ुद को है, आप जो कुछ भी पढ़ें। पर एक किताब, एक कॉपी जो हाथ में होती है, उसका विकल्प मशीनें क्यों नहीं बन सकती? आइए! जानते हैं।
क्या आपको पता है, स्मृतियों में कोई ज्ञान नहीं होता? ज्ञान की पढ़ाई दर्शनशास्त्र करता है, और मन का अध्ययन मनोविज्ञान। आज हम ज्ञान और मन के बीच दर्शन का बाँध बनाने की कोशिश करेंगे।
भारतीय ज्ञानमीमांसा (Indian Epistemology) छः प्रमाणों को ज्ञान का आधार मानता है, जिन्हें ‘प्रमा’ की श्रेणी में रखा गया: प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमान, अर्थापत्ति, और अनुप्लब्धि।साथ ही अज्ञानता के चार कारणों की भी चर्चा हमें यहाँ मिलती है, जिन्हें ‘अप्रमा’ कहा गया: भ्रम, संशय, तर्क और स्मृति।
आपको सोचकर शायद हैरानी हुई होगी कि तर्क और स्मृति में कोई ज्ञान नहीं होता। फिर क्यों हर परीक्षा, कोर्ट-कचहरी में तर्क पर ही सवाल-जवाब होते हैं? इसका जवाब भी आपको यहाँ मिलेगा।
आइए! पहले एक-एक कर ज्ञान के प्रमाणों और कारणों को व्यावहारिक स्तर पर समझने की कोशिश करते हैं।
प्रत्यक्ष ज्ञान वह है जो हमें इन्द्रियों के माध्यम से मिलता है। जो कुछ भी देखते हैं, सुनते हैं, स्वाद लेते हैं, जिस स्पर्श और ख़ुशबू को हम भूल नहीं पाते — हमारे प्रत्यक्ष ज्ञान का हिस्सा है। अनुमान प्रत्यक्ष ज्ञान पर आधारित है। अपने प्रत्यक्ष ज्ञान के आधार पर जब भूत या भविष्य पर हम चिंतन करते हैं, हम अनुमान लगा रहे होते हैं। धुंआ देखकर आग का अनुमान लगाना, बादल देखकर बारिश की भविष्यवाणी करना, अनुमान है। विज्ञान अनुमान के ज्ञान पर ही तो आधारित है।
वैसे तो कुछ ग्रंथों में वेदों को शब्द प्रमाण का आधार माना गया है। लेकिन, इसकी एक और व्याख्या हमें मिलती है। अब हमारे पास कुछ प्रत्यक्ष और अनुमान है। पर, अब समस्या यह है कि इसका आदान-प्रदान कैसे करें? इसलिए शब्द को प्रमाण के अन्तर्गत रखा गया है। ताकि संवाद स्थापित हो सके। वक्ता का अधिकार है कि वह अनुभव से मिले अपने प्रमाणों और अनुमानों को समाज के साथ साझा करे। यह अधिकार हमें शब्द प्रमाण देते हैं। मगर, ध्यान रहे हर अधिकार के साथ जिम्मेदारी का अंतरंग संबंध होता है।
चौथा आता है, उपमान। इसे समझना आसान है। यह एक प्रकार का अनुमान है, जहाँ हम किसी नए अनुभव से तुलनात्मक ज्ञान अर्जित करते हैं। जैसे हम गाय से परिचित है। और हमें जंगल जाते समय किसी ने बताया कि अगर गाय जैसा कोई प्राणी जंगल में दिखे तो हो सकता है वह नील गाय होगी।
हम कुछ भी मानने को स्वतंत्र हैं। यह स्वतंत्रता हमें अगला प्रमाण — अर्थापत्ति देता है। यहाँ अलग बात है कि हमारी सामाजिक मान्यताएँ अलग-अलग हों। पर ऐसा होने से किसी की मान्यता ग़लत नहीं हो जाती। साहित्य ही नहीं, विज्ञान की भाषा गणित अर्थापत्ति पर ही आधारित है। हम मानते हैं कि एक को एक ही कहा जाता है। शब्दों के मतलब को भी मानना ही पड़ता है, वरना संवाद असंभव हो जाता।
आख़िरी प्रमाण है अनुपलब्धि। इसे समझना बहुत जरूरी है। प्रयोग का आधार ही अनुप्लब्धि है। एक ही काम करके अगर हमें अनुप्लब्धि मिलती है, तो यह अनुमान लगा लेना चाहिए कि हम कुछ तो ग़लत कर रहे हैं।
यह तो हुई ज्ञान से जुड़े प्रमाणों की बातें। अब हम अज्ञानता के कारणों को समझते हैं। जितना ज्ञान को समझना जरूरी है, उतनी ही आवश्यक अज्ञानता को भी समझना है। क्योंकि यहीं से हमें अभाव या अनुपलब्धी का ज्ञान मिलता है। जिज्ञासा का आधार अज्ञानता ही तो बनती है।
भ्रम और संशय में बस मनोवैज्ञानिक अंतर है। विपर्यय या भ्रम तब होता है, जब हम हम निश्चित होता है कि हमारा अनुभव सही है। मगर वास्तविकता अलग होती है। उदाहरण के लिए अगर हमने रस्सी को साँप समझ लिया तो, हमें भ्रम होता है। भूत-प्रेत, अंधविश्वास इसी श्रेणी में आते हैं।
संशय में हमारी परिस्थिति अनिश्चित होती है। जैसे, धुंध में सामने खंभा है या आदमी, जब हम इसका निर्धारण नहीं कर पाते, हम संशय की स्थिति में होते हैं। करियर से लेकर जीवन में लिए जाने वाले हर महत्वपूर्ण फैसला लेते समय हमारी मनोदशा संशय में ही तो होती है।
अब आते हैं, तर्क पर। ख़ुद में तर्कों से कोई ज्ञान हासिल नहीं होता। फिर भी संवाद का आधार जब शब्द बनते हैं, तब आदान-प्रदान का माध्यम तर्क बनते हैं। इसलिए, तर्कशास्त्र अपने-आप में एक अलग विधा है। कंप्यूटर की कल्पना भी तर्क पर ही तो आधारित है। सोचिए! कितनी शक्ति है हमारी अज्ञानता कि हमें एक दुनिया ही बसा डाली — आभासी दुनिया, जहाँ हमारी और आपकी मुलाक़ात हो रही है।
आख़िर में आती है, स्मृति। यादों में खोए रहने से हमारी दुनिया जिसे हम भोग रहे हैं, नहीं बदल जाती। मगर, सोचिए स्मृति की अज्ञानता ना होती तो क्या हम कोई अनुमान लगा पाते।
और स्मृति ही वह कारण है, जिस कारण मैं अपने आईपैड, मैकबुक और ख़ासकर किंडल से दूरी बनाऊँगा। क्योंकि इनका प्रभाव स्मृति पर बड़ा नकारात्मक पड़ते हुए, मैंने अनुभव किया है।मेरी अज्ञानता में ये चार-चाँद लगा रहे हैं। जब मैं किताब हाथ में लेकर पढ़ा करता था, या किसी कॉपी पर अपनी कलम से लिख रहा होता था, तब सिर्फ़ मेरी वैचारिक स्मृति ही नहीं, Image Memory भी बन रही होती थी। जब से मैंने अपने नोट्स आईपैड पर लिखना शुरू किया, और किंडल पर किताबें पढ़ना, तब से कोई छवि नहीं बचती। जैसे ही इनका स्क्रीन बंद हुआ, एक काली सी छवि ही बच जाती है। मगर ऐसा भी नहीं है कि मैं उपकरणों का उपयोग पूर्णतः बंद कर दूँगा। उपन्यास पढ़ने के लिए अभी भी किंडल एक अच्छा साधन है। आईपैड पर चित्रकारी करने का अपना ही मजा है। जीवन में कुछ अच्छा या बुरा नहीं होता, जो होता है जरूरी होता है।

युवा लेखक और चिंतक, दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री ( गोल्ड मेडलिस्ट)






