भारतीय दर्शन हमें तीन प्रकार के दुख का विवरण देता है। पहला, आध्यात्मिक दुख जो आंतरिक है, शरीर और मन से जुड़ा हुआ है। शरीर बीमार पड़ सकता है, और मन — काम, क्रोध, भय, ईर्ष्या, और विषाद से त्रस्त। दूसरा दुख आधिभौतिक है, यह बाह्य पीड़ा है — जो बाहर से आती है। जैसे, कभी जंगल में जानवरों से डरकर। हमने जंगल काटकर शहर बना लिए, अब प्रदूषण से लेकर कोरोना जैसे संक्रमण से परेशान। आधिभौतिक दुख का कारण कुछ प्राकृतिक और कुछ मानव-जन्य भी हो सकता है। तीसरा और आख़िरी दुख जिसका जिक्र हमें संतान दर्शन में मिलता है वह आधिदैविक है, वैसा दुख जो हमारी नियंत्रण के बाहर है, जैसे बाढ़, सूखा, भूकंप आदि।
आधिदैविक दुख से अलावा ऐसा कोई दुख नहीं है, जिसका निदान दैविक शक्ति के हाथ में है। अब जंगल में अगर शेर आया, तो कोई भूत या भगवान काम नहीं आयेंगे। हमें भागना ही पड़ेगा, या लड़ना पड़ेगा। चुनाव हमारा है। शरीर अगर बीमार है, तो डॉक्टर के पास जाना ही पड़ता है, माला जपने से बुखार नहीं भाग जाता। मन अगर क्रोध से, भय से ग्रस्त है तो हमें ख़ुद अपने मन को कभी बहलाना पड़ता है, तो कभी उसे हिम्मत देनी पड़ती है। हम ना मन हैं, ना शरीर, हम बस चेतना हैं। चेतना आत्मा का क्षणिक रूप है। हर क्षण अनंत है। सोचिए, आप कितनी जगह हो सकते थे, कितना कुछ कर सकते थे। पर अभी आप जहाँ हैं, वहाँ आप बस इसलिए हैं क्योंकि वहाँ आप जरूरी हैं।
गांधीजी ने कहा है — “इस धरती पर हर किसी की जरूरत के लिए पर्याप्त है, लेकिन किसी के लालच के लिए नहीं।”
आज हम, भारत के लोग सिर्फ़ इसलिए कष्ट नहीं झेल रहे कि देश की अर्थव्यस्था संकट में है। बल्कि हमारे सामने आपदा यह है कि जितना भी संसाधन हमारे पास है, उसका प्रबंधन हम, भारत के लोग नहीं कर पा रहे हैं। आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार भारत में एक सामान्य आदमी दिन का 314 कमाता है, मतलब महीना 9,420! एक ढंग की किराए वाली छत भी 15-20,000 से शुरू होती है। और इधर देश के धनपतियों के पास इतना पैसा है कि 4-5 करोड़ तो बस शादी में खर्च कर देते हैं। अगर भारत के हर आदमी को इस एक दिन का खर्चा बाँट दिया गया होता, तो भी सबके अकाउंट में 35-35 रुपये आ गए होते। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना में अगर उन आँकड़ों के आधार पर ही हिसाब लगाया जाये, तो प्रति व्यक्ति प्रति दिन मात्र 7 रुपये सरकार खर्च कर रही है। एक दिन की शादी में देश के सारे गरीब 5 दिन भोज करते। यह लोकतंत्र का मजाक नहीं, तो और क्या है?
इतना धन किसी एक उद्योग के उद्यम का नतीजा होता तब भी न्याय होता। लेकिन, यहाँ तो सरकार हम, भारत के लोगों से टैक्स के नाम पर वसूली कर सीधा निजी क्षेत्रों में निवेश कर रही है। उनकी योजना है कि जैसे ही ये बड़े-बड़े उद्योगपति मुनाफा कमाएंगे जनता को भी रोजगार देंगे, और देश का विकास भी करेंगे। और जो थोड़ा-बहुत पैसा सरकारी खजाने में बचेगा, उसे सरकार गरीब कल्याण में लगा देगी। सरकार का ही सारा पैसा डूब गया। अब हमसे और माँग रही है। पैसे से देश नहीं चलता। देश नियम, कानून और संविधान से चलता है ताकि न्याय का राज स्थापित हो सके।
क्या होता है न्याय?
प्रेम की प्राण-प्रतिष्ठा जहाँ सुरक्षित है, वहाँ न्याय है। प्रेम जीवन है। जीवन कभी भूत या भविष्य में नहीं हो सकता, जीवन सिर्फ़ और सिर्फ़ वर्तमान में संभव है। जीवन में अर्थ है, और अर्थशास्त्र के केंद्र में भी जीवन है। जीवन में ऊर्जा है। ऊर्जा के संरक्षण का नियम अर्थशास्त्र पर भी लागू होता है। जिस प्रकार ऊर्जा का ना तो उत्पादन संभव है, ना ही उसे नष्ट किया जा सकता है; इसे केवल एक रूप से दूसरे रूप में बदला जा सकता है। उसी प्रकार कोई भी सरकार अपने मन से पैसे नहीं छाप सकती। अगर वह ऐसा कर पाती, तो देश में कोई क्यों गरीब होता। उसे जब ज़रूरत पड़ती, वह सरकार से जा कर पन्ने के उस टुकड़े को ले आता, जिसे हम पैसा मानते हैं। पैसा किसी के पास ज़्यादा किसी के कम हो सकता है। पर जिस देश में जनता पाँच किलो अनाज पर जिंदा हो। उस देश को अपनी अर्थनीति पर चिंतन, और न्याय के लिए सत्याग्रह करना ही चाहिए।
हमें न्याय क्यों चाहिए?
ताकि हम सब आराम से जी सकें, और चैन से मर सकें। अहिंसा न्याय है। गांधीजी कहते थे, आँख के बदले आँख दुनिया को अंधा कर देगी। दिखता तो सबको है, पर दर्शन हर किसी के पास नहीं होता। हिंसा सिर्फ़ आध्यात्मिक दुख ही नहीं, आधिभौतिक भी है। एक उदाहरण से इस बात को समझते हैं। मुझे किसी ने थप्पड़ मारा, अगर मैंने भी उसे एक थप्पड़ मारा तो मैंने अपने अनुभव में पाया है कि कम-से-कम एक थप्पड़ तो मुझे और झेलना ही पड़ता है। पहली पीड़ा तब हुई जब किसी ने मुझे थप्पड़ मारा — आधिभौतिक, और दूसरी तब जब मुझे क्रोध आया — आध्यात्मिक दुख। यह सच सिर्फ मेरा ही नहीं है, देश-विदेश की राजनीति में भी यही चल रहा है। कल ही मैं संसद देख रहा था। लोकतंत्र का यह ड्रामा बड़ा मजेदार था।
एक तरफ़ राहुल गांधी खड़े थे। दूसरी तरफ़ पूरी सरकार, राहुल बस किसी आलेख से पाँच पंक्ति पढ़ना चाहते थे। उन्होंने पढ़ना शुरू किया। पूरी सरकार ऐसे चीख पड़ी जैसे किसी ने थप्पड़ मारा हो। संसद बहुत चीख़ा-चिली से बाद शांत हुई। राहुल फिर वहीं से शुरू करते हैं। संसद में फिर शोर। शांति और शोर के बीच लगभग पौने घंटा बीत गया। मगर राहुल गांधी को रक्षा मंत्री, गृह मंत्री, और संसदीय कार्य मंत्री ने पढ़ने नहीं दिए। स्पीकर महोदय ने भी सरकार का पूरा सहयोग किया। इस बहस में अनुमानित एक-आध करोड़ रुपया खर्च हो गया। किस बात का इतना भय है? क्यों आज देश की सरकार इस हाल में नहीं है कि सत्याग्रह कर सके? क्यों वह सत्य के आग्रह को भी मिटा देना चाहती है?
क्या होता है सत्याग्रह?
सत्य का आग्रह — सत्य जीवन है। जीवन का आग्रह सत्य है। कल संसद के प्रकरण से यह मैं यह अंदाजा लगा पाया कि मामला चाइना और भारत से जुड़ा था। क्या हो जाएगा अगर चीन हमारे बॉर्डर में घुस आया तो? कौन सा यहाँ हमारा जीवन सुरक्षित है? ना शिक्षा है, ना स्वास्थ्य का कोई ठिकाना। पानी पीकर, सांस लेकर हम भारत के लोग मर रहे हैं। हम, भारत के लोगों की बातें संसद में कब होंगी?

युवा लेखक और चिंतक, दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री ( गोल्ड मेडलिस्ट)







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