देश का दुर्भाग्य है कि यहाँ कोने-कतरे में से लेकर एआई सम्मिट तक में फ्राडिज्म चल रही है। एक विश्वविद्यालय ने चीन में आविष्कृत रोबोट को अपना आविष्कृत कह कर प्रस्तुत किया। चीनी मीडिया ने इसका माखौल उड़ाया। विश्वविद्यालय फ्राडिज्म कर रहा है। आप किसी भी निजी विश्वविद्यालय में पहुँचिये और देखिए खेला। पीएच-डी की डिग्री लिखनी नहीं है, खरीदनी है। चार-पाँच वर्ष का समय और रुपए गाँठ में है, आपका डॉक्टर बनना तय है। कानून से लेकर मास्टर की डिग्री बिक रही है।
शिक्षा बीच बाजार में खड़ी है। हर स्तर की डिग्री का मोल भाव हो रहा है। यहाँ तक कि सरकारी विश्वविद्यालयों की हालत कम खराब नहीं है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सिर्फ नारों में सिमट गई है। विभागों की हालत यह है कि ज्यादातर रिसर्च गाइड अपना घर भर रहे हैं। विश्वविद्यालय में हर कोई जानता है कि कौन गाइड डकैत है, तब भी उसके पास रिसर्च स्कॉलर पहुँच रहे हैं। रिसर्च स्कॉलर को भी रिसर्च नहीं, डिग्री चाहिए। चाहे वह जैसे मिल जाए। अद्भुत गिरावट है शिक्षा में। शिक्षा मंत्री क्या अंधे-बहरे हैं और क्या यूजीसी मर चुकी है? क्या देश को मूर्ख बनाने का व्यापार नहीं चल रहा? दरअसल जनता ने भी कम बड़ा पाप नहीं किया है। उसने ऐसे लोगों को उच्च पद पर बैठाया है, जिसे अपनी डिग्री का नहीं पता। डिग्री नहीं दिखाने के लिए जो व्यक्ति कोर्ट में लड़ाई लड़े, वह डिग्री की महत्ता को कितना समझेगा? ऐसा व्यक्ति जब यह कहता है कि भारत एआई से आत्मनिर्भर बनेगा तो कबीरदास की बात याद आती है – कबीरदास की उलटी बानी, भींगे कंबल, बरसे पानी।
देश में ईमानदारी का जबर्दस्त क्षरण हुआ है। संसद में प्रधानमंत्री का दुलरुवा सांसद जब नेहरू की भांजी को उसकी प्रेमिका बता कर पेश करता है तो प्रधानमंत्री के पक्षधर सांसद ठहाके लगाते हैं। द्रौपदी के चीरहरण जैसा दृश्य है। अध्यक्ष मना करते रहे और उसकी जरा भी सांसद ने नहीं सुनी। पू्र्व प्रधानमंत्री पर कीचड़ उछालना, खासकर उन पर, जो देश की आजादी के लिए तेरह वर्ष जेल में बिताए, शर्मनाक है। शर्मनाक इसलिए है कि ऐसे सांसद के अंदर न विवेक बची है, न ईमानदारी, तब भी वे भी विधान मंडल के सदस्य हैं। खैर, मैं निजी प्रसंगों में बहुत रुचि नहीं लेता। सांसद को ही यह मुबारक। एक सांसद है जो आजकल मंत्री भी हैं। उनके दो हजार करोड़ के घोटाले की मालकिन मनोरमा देवी से उनके गहरे संबंध थे, वे विपक्ष के नेता को लुच्चा कह रहे हैं। प्रधानमंत्री अपने सांसदों को कुछ नहीं कह रहे। इसका मतलब है कि उन्होंने भी हरा सिग्नल दे रखा है। प्रधानमंत्री जी, जब देश को दाँव पर लगा ही दिया है तो फिर ऐसे बदतमीज सांसदों को आस्तीन में छिपाकर रखना तो आपकी मजबूरी ही है।
ईमानदारी कोई ऐसी चीज नहीं है, जो बड़े पदों पर बैठे हुए लोगों के पास होती है। मेरे यहाँ एक अखबार वाला अखबार देने आया है। जनवरी का उसने बिल दिया। बिल में तीस दिनों का ही उल्लेख था। पत्नी ने उससे पूछा कि जनवरी तो 31 दिनों का होता है। आपने तीस दिन का ही बिल दिया। अखबार वाले ने कहा कि एक दिन अखबार नहीं दिया था। इसके विपरीत पहले वाला था। वह अखबार दे, न दे, उसे कीमत पूरे महीने की चाहिए थी।
प्रधानमंत्री की कुर्सी चाय वाले को मिल सकती है और डिग्री धारी को भी, लेकिन उसके व्यक्तित्व का अंकन अंततः उसकी ईमानदारी और व्यवहार पर निर्भर करेगा। गाल बजाना और बार-बार बजाना अलग बात है।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर





