यह बात निर्विवाद है कि सरकारी ज़मीन पर अवैध रूप से बनी झोपड़ी को हटाने का कानूनी अधिकार राज्य के पास है। राज्य भावनाओं से नहीं, क़ानून से चलता है—और सार्वजनिक भूमि की रक्षा करना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है। लेकिन लोकतंत्र में क़ानून का प्रश्न वहीं समाप्त नहीं होता, वहीं से असली प्रश्न शुरू होता है। सवाल यह नहीं कि झोपड़ी हटाई जा सकती है या नहीं; सवाल यह है कि ऐसी झोपड़ियाँ शहरों में पैदा क्यों होती हैं और उन्हें हटाने के बाद राज्य का नैतिक दायित्व क्या रह जाता है।
झोपड़ी कोई शौक़ नहीं, मजबूरी का वास्तुशिल्प है। गाँव से शहर आया मज़दूर, रिक्शा चालक, घरेलू कामगार, निर्माण श्रमिक—ये लोग शहर की चमक-दमक के उपभोक्ता नहीं, बल्कि उसके निर्माता हैं। मॉल, मेट्रो, फ्लाईओवर और गगनचुंबी इमारतों पर गर्व करने वाला शहर उन्हीं हाथों के लिए सस्ती और सम्मानजनक आवास नीति बनाने में बार-बार असफल रहता है, जो इस विकास की नींव रखते हैं।
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झोपड़ियाँ इसलिए नहीं उगतीं कि लोग क़ानून तोड़ने का आनंद लेते हैं, बल्कि इसलिए कि शहर रोज़गार तो देता है, रहने की जगह नहीं। गाँवों से मजबूरी में हुआ पलायन, असंगठित श्रम, न्यूनतम मज़दूरी और महँगा शहरी आवास—ये सब मिलकर झोपड़ी को अपराध नहीं, बल्कि विकल्पहीनता का परिणाम बना देते हैं। काग़ज़ों में बनी आवास योजनाएँ ज़मीन पर उस वर्ग तक नहीं पहुँच पातीं, जिसके लिए उनका दावा किया जाता है।
इसी पृष्ठभूमि में “बुलडोज़र न्याय” का उभार देखा जाना चाहिए। अवैध निर्माण पर कार्रवाई प्रशासनिक अधिकार है, लेकिन जब बुलडोज़र न्याय का पर्याय बना दिया जाता है, तब लोकतंत्र असहज होने लगता है। तेज़, दिखावटी और कैमरे के सामने की गई कार्रवाई समस्या का दृश्य तो बदल देती है, जड़ नहीं। बुलडोज़र ढांचा गिराता है, असमानता नहीं।
संविधान राज्य को केवल शक्ति नहीं देता, विवेक भी देता है। अनुच्छेद 21 का आशय सिर्फ़ जीवित रहने से नहीं, बल्कि गरिमा के साथ जीवन से है। अगर किसी कार्रवाई का परिणाम यह हो कि परिवार सड़क पर आ जाए, तो यह पूछना ज़रूरी है कि क्या यह क़ानून का शासन है या शक्ति का प्रदर्शन। क़ानून की कठोरता और करुणा का संतुलन ही संवैधानिक नैतिकता की पहचान है।
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समकालीन राजनीति में समस्या यह है कि बुलडोज़र अब प्रशासनिक औज़ार नहीं, राजनीतिक संदेश बन गया है। चयनात्मक सख़्ती, त्वरित लोकप्रियता और कठोर भाषा—इनसे ताली तो मिल सकती है, भरोसा नहीं। लोकतंत्र तालियों से नहीं, न्याय से मजबूत होता है।
असली कसौटी यह नहीं कि राज्य कितनी तेज़ी से अवैध ढाँचे गिरा सकता है, बल्कि यह है कि वह नागरिकों के अधिकार और सार्वजनिक हित के बीच कितना न्यायपूर्ण संतुलन बना पाता है। झोपड़ी हटाई जा सकती है, लेकिन समस्या तभी सुलझेगी जब पुनर्वास, सस्ता आवास और समावेशी शहरी नीति को भी उतनी ही गंभीरता से अपनाया जाए।
लोकतंत्र में राज्य की महानता उसकी मशीनों की ताक़त से नहीं, बल्कि उसके संवैधानिक विवेक से आँकी जाती है। यही वह बिंदु है, जहाँ क़ानून, राजनीति और मानवता की असली परीक्षा होती है।
आज ज़रूरत इस बात की है कि शहरी विकास को केवल इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजना न मानकर सामाजिक परियोजना के रूप में देखा जाए। स्मार्ट सिटी, अमृत योजना और पुनर्विकास जैसे शब्द तभी सार्थक होंगे, जब उनके केंद्र में केवल सड़कें और इमारतें नहीं, बल्कि इंसान भी होगा। शहर अगर श्रमिक के बिना नहीं चल सकता, तो उसे श्रमिक के लिए जगह भी बनानी होगी—यही विकास की न्यूनतम नैतिक शर्त है।
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राज्य के पास विकल्प मौजूद हैं। चरणबद्ध पुनर्वास, किराया सहायता, कार्यस्थल के पास किफ़ायती आवास, और स्थानीय निकायों की जवाबदेही—ये सब ऐसे समाधान हैं, जो टकराव को नीति में बदल सकते हैं। लेकिन इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए, न कि त्वरित कार्रवाई से उपजी तात्कालिक वाहवाही।
इतिहास गवाह है कि जिन राज्यों ने शहरी गरीब को केवल समस्या समझा, उन्होंने अस्थिरता पाई; और जिन्होंने उसे साझेदार माना, उन्होंने टिकाऊ शहर बनाए। बुलडोज़र से खाली की गई ज़मीन पर खड़ी इमारतें भले चमक जाएँ, लेकिन अगर उस चमक में न्याय की छाया न हो, तो वह विकास नहीं, विस्थापन कहलाता है।
मेरे कहने का आशय क़ानून की अवहेलना का समर्थन नहीं है। सार्वजनिक भूमि का संरक्षण आवश्यक है। लेकिन उतना ही आवश्यक है यह स्वीकार करना कि क़ानून का उद्देश्य दंड नहीं, समाधान होना चाहिए। जब राज्य शक्ति और संवेदना के बीच संतुलन साधता है, तभी लोकतंत्र मज़बूत होता है।
अंततः प्रश्न यह नहीं है कि झोपड़ी रहे या हटे; प्रश्न यह है कि क्या हमारा शासन ऐसा है जो सबसे कमज़ोर नागरिक को भी यह भरोसा दे सके कि विकास की दौड़ में वह कुचला नहीं जाएगा। इसी भरोसे पर लोकतंत्र टिका होता है—और यही भरोसा किसी भी राज्य की असली पूँजी है।

शिक्षक, भौतिक बिज्ञान
कोषाध्यक्ष, बिहार राज्य समिति, एटक








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Best journalism
Thanks!