शिक्षक और कुत्तों की गिनती : बिहार सरकार की वैचारिक बीमारी

"बिहार में शिक्षक को कक्षा से बाहर निकालने की एक स्थायी परंपरा बन चुकी है।......... हर बार तर्क एक ही दिया जाता है—“काम ज़रूरी है”। लेकिन सवाल यह है कि क्या बच्चों की पढ़ाई ज़रूरी नहीं? क्या शिक्षा हमेशा स्थगित की जा सकने वाली गतिविधि है?" - इसी आलेख से
(खबर का स्क्रीनशॉट)
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अमर नाथ
अमर नाथ

शिक्षक, भौतिक बिज्ञान
कोषाध्यक्ष, बिहार राज्य समिति, एटक

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6 Comments

  1. हमारा संविधान नालायकों को भी बराबरी का अधिकार देकर उन्हें अपनी काबिलियत साबित करने का मौका देता है। इस अवसर का उपयोग कर छल-प्रपंच और ठगों का गिरोह आम नागरिकों को विभ्रमित कर जब सत्तासीन हो जाता है तब वह सबसे पहले शिक्षा व्यवस्था को नष्ट कर उसकी जड़. में मट्ठा पटाने का अपराध करता है। ऐसी स्थिति में नागरिकों का यह संवैधानिक दायित्व होता है कि वे सड़क की शांति को भंग करें । लेकिन इस लक्ष्य को हासिल करने में शिक्षकों की भागीदारी महत्वपूर्ण है। इस राष्ट्रीय महाँ आपदा के निदान के लिए सालभर का कार्यक्रम बनाकर वे नागरिक अवज्ञा आंदोलन की अगली पंक्ति में शामिल होकर अगुआई करें।

    • निश्चय ही शिक्षकों की भूमिका परिवर्तनकारी हो सकती है। इस महत्वपूर्ण अभिप्रेरण के लिए धन्यवाद!

  2. सत्ता के नशा मे चूर सत्तासीन बहुरूपिया यह नही चाहता कि आने वाली पीढी पढ लिख कर इतना सबल और सक्षम हो जाये कि वो सत्ता से सत्तासीन बहुरूपिओ से सवाल करे।
    आज जब शिक्षा की भूख आम अवाम मे जगी है तब ये शिक्षा के दुश्मन बहुरूपिये भेड़िये शिक्षा को हर तरह से बर्बाद कर रहे है।

  3. जब सत्ता पर नालायक आसीन हो जाएँ तो कुछ भी नामुमकिन नहीं है।

    • यही हो रहा है। सत्ता पर ही नहीं, प्रशासन तक में ऐसे ही लोग भर गए हैं।

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