एक लेखक बस इतना चाहता है कि उसकी बेटी सुने। जब पढ़ सके तब पढ़े, इस चिट्ठी को जो उसने अपनी बेटी के नाम लिखा है:
मेरी प्यारी तितली 🦋
तुम्हारा पिता,
तुमसे वादा करता है, तुम्हें वो इस काबिल बनाएगा कि एक देश के लोकतंत्र की गद्दी को चुनौती दे सको। तुममें इतनी ऊर्जा और ईमानदारी होगी कि तुम इस लोक में इस तंत्र को सम्भाल सको। फिर तुम अपने जैसा इस देश की हर बेटी और उनके भाइयों को बनाना, ताकि वे तुमसे तुम्हारी गलती का हिसाब संवैधानिक तरीक़े से ले सके। अगर वे तुमसे काबिल निकले तो तुम गद्दी छोड़ देना। तुम उस गद्दी के काबिल नहीं हो, सहजता से मान लेना अपनी कमियों को। फिर उन कमियों को दूर कर पाओगी और तुम्हें अहंकार का कभी सामना नहीं करना पड़ेगा। तुम विपक्ष के साथ भी विकास कर सकती हो, ये भरोसा उन्हें हर पल जताते रहना। उनका सम्मान करना।
बिटिया! तुम इस देश को सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाना। बेटा! तब आएगा अमृतकाल। तुम इंतज़ार ही मत करना, एक दिन बग़ावत भी करना। ये अमृतकाल तुम्हें हर पल बनाये रखना है। ये बताना हर पल में एक पूरा युग बसता है। सोचो, आज तुम जहाँ भी हो, वहाँ सिर्फ़ इसलिए हो, क्योंकि तुम वहाँ ज़रूरी हो। तुम्हारा जीवन हर पल परफ़ेक्ट है, ये तुम हर पल याद रखना। तुम्हें कभी उदासी नहीं पास बुलाएगी, सुख की सखियाँ साथ निभाती रहेंगी।
लेखक अपनी बेटी को बताना चाहता है कि इस देश-समाज की उत्तराधिकारी तुम ही हो। पर इसके लिए तुम्हें नेता, अधिकारी बनने की जरूरत है। इस देश का हर नागरिक इस देश का अधिनायक है। एक कवि अपनी बेटी को अपना हाल कुछ ऐसे सुनाता है:
रोज़ जीता, मरता हूँ, हर दिन भागता फिरता हूँ, मैं ही पैदा होता हूँ, मैं ही मरने वाला हूँ। मैं पब्लिक हूँ। कभी स्कूल में, कहीं दफ्तर में, मैं हर जगह पाया जाता हूँ, मैं सब कर्ता-धर्ता हूँ, मैं ही तो भाग्य विधाता हूँ। मैं पब्लिक हूँ। पैसा मेरा, सरकार मेरी, फिर भी सड़कों पर गड्ढे पाता हूँ, कभी रेलों में, कभी मेलों में कुचला जाता हूँ, न्यायालय से लेकर हॉस्पिटल के चक्कर मैं लगाता हूँ। मैं पब्लिक हूँ। साँस बड़ी मुश्किल से लेता हूँ, पानी भी गंदा पीता हूँ, शोर-शराबे में जीता हूँ, पाँच किलो अनाज पर मैं ज़िंदा हूँ। मैं पब्लिक हूँ। मर-मर कर सरकारी खजाना भरता हूँ, फिर फ़ीस से लेकर फाइन पर साइन करता हूँ, शिक्षा, सेहत से लेकर मौत पर खर्चे करता हूँ, कुछ और नहीं तो देश-दुनिया पर चर्चे मैं करता हूँ। मैं पब्लिक हूँ। हर पार्टी, हर मज़हब में मैं ही पाया जाता हूँ, इस लोक और इसके तंत्र को मैं ही तो चलाता हूँ, मैं ही प्रधान से लेकर संतरी सेवक बनता हूँ, बाजार से लेकर परिवार मैं ही तो बनाता हूँ। मैं पब्लिक हूँ। नायक भी मैं, खलनायक भी मैं, मैं ही तो अधिनायक हूँ। जन-गण में मैं, मैं ही मंगलदायक हूँ। मैं पब्लिक ही नहीं, रिपब्लिक हूँ।
उस लेखक ना नाम जरूरी नहीं है। जरूरी उसका काम है। उस लेखक के पास लिखने का कारण है। वह लिखता है, क्योंकि वह अपनी बेटी से प्यार करता है। वह लिखता है, क्योंकि उसे चिंता है उस दुनिया की, जिसमें वह रहता है। बेटी अपने ही पड़ोस में सुरक्षित कहाँ है। दादा ने उसके पिता को बताया कि लेखक वह होता है, जो लिखता है। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि अर्थोपार्जन तो तुम्हारा हो जाएगा, मगर जीविकोपार्जन कैसे करोगे? आजकल लोग पढ़ते ही कहाँ हैं?
उनकी बात बिल्कुल सही है। लोग नहीं पढ़ते, अगर कहीं कभी कुछ पढ़ना है, है तो ख़ुद को पढ़ना है। ख़ुद को पढ़ने का मौक़ा ही यह सिस्टम कहाँ दे पा रहा है?
लेखक ने छह किताबें लिखी। एक प्रकाशित भी हुई। पैसे देकर दादा ने छपवाये थे। आजकल प्रकाशक साहित्य की सेवा भाव से नहीं, वाणिज्य की आवभगत में व्यस्त है। जिस समाज से उसका साहित्य छीन लिया जाएगा, वह अंधा हो जाएगा। साहित्य सिर्फ़ समाज का दर्पण ही नहीं, उसका दर्शन भी है। लेखक ने एक लेख लिखा जरूरत-ए-साहित्य, जरूर पढ़ें। यह इहलोकतंत्र भाग एक का हिस्सा भी है। कुछ पंक्तियाँ उस लेख से:
साहित्य भावनाओं में बसता है। किसी भी देश या समाज को अगर ग़ुलाम बनाना है, तो उससे साहित्य रचने की क्षमता को छीन लो, वो समाज अपने-आप आपका वफ़ादार बन जाएगा।पत्रकारिता भी साहित्य का ही एक हिस्सा है। जो ख़ुद आज़ाद नहीं है, वो कैसे हमारी भावनाओं की रक्षा कर पाएगा? “वन्दे-मातरम्” के बाद देशभक्ति जता सके, अब वे नारे कहाँ हैं? अब तो नारे भी सस्ते हो गये हैं – “मैं भी चौक़ीदार” से “चौक़ीदार ही चोर है” के बीच ही हमारी कल्पनाओं के घोड़े दम तोड़ देते हैं। बड़े नारे लगा सकें, किसी में अब इतनी हिम्मत कहाँ है?
कहानी लिखना तो छोड़िये, सुनने-सुनाने का भी मौक़ा कहाँ मिलता है?
कुछ देर फ़ुरसत से आख़िरी बार कब बैठे थे, आप अपने बच्चों को कहानियाँ सुनाने या सुनने उनकी कहानियाँ?
बचपन में शरारत करने की भी अब कौन सोचता है?
कौन सी हमें कहानियाँ लिखनी है? कहानी लिखना भी हमें किसी ने सिखाया कहाँ है? रामायण एक कहानी है, महाभारत भी। उस राम को पूजने के पहले उसकी कहानी सुनना भी हम ज़रूरी समझते कहाँ हैं? कृष्ण बना यहाँ हर आशिक़ घूम रहा है, राधा की तलाश में, पर रासलीला की कहानी वो जानता कहाँ है? सस्ता हो गया है, हंगामा मचाना, इसलिए अब महाकाव्य या महागाथा के लिये पर्याप्त मसाला मिलता कहाँ है?
कहाँ से लायेंगे हम अर्जुन दोबारा, इतनी मेहनत की अब किसी को फ़ुरसत कहाँ है? कहाँ से एकलव्य कोई बन पाएगा, इतना ज़िद्द किसी की चेतना में कहाँ है? कैसे आयेंगे अब राम यहाँ?उन्हें पहचान पायें इतना हमारी आँखों में हुनर कहाँ है? आधार कार्ड, पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस,… सब लेकर रहीम आ भी गये, तो पूछेंगे हम उनसे, बाक़ी के कागज कहाँ हैं? स्कूल के रिपोर्ट कार्ड में फँसा बचपन, डिग्रियों की रेस में दौड़ती जवानी, दफ़्तर के काग़ज़ों से अब फ़ुरसत कहाँ है? फिर पेंशन की लाइन में घुटता बुढ़ापा, अफ़सोस अब नये क़िस्से हम लायेंगे कहाँ से? एक ही कहानी थी, क़िस्से अलग-अलग। इस मशीनी दुनिया में नये क़िस्से भी हम लायेंगे कहाँ से?
सवालों की एक झड़ी लगा दी लेखक ने। वह ख़ुद जवाब ढूँढ रहा है। भटकते-भटकते वह पब्लिक पालिका तक पहुँचा। उसने सोचा क्या पब्लिक मिलकर एक ऐसा प्रकाशन नहीं खोल सकती, जहाँ कोई लेखक अपनी रचना सहजता से अपने पाठकों तक पहुँचा पाये। इस पब्लिक प्रकाशन से ना सिर्फ़ प्रकाशक, बल्कि शिक्षक, प्रोफेसर, शोधार्थी, और वो कोई भी जो पढ़ना-लिखना चाहता हो। देश की सबसे छोटी प्रशासनिक इकाई पर इसका गठन हो। अगर लेखक की रचना उनके पाठकों को पसंद आए, तो राज्य स्तर पर स्थापित पब्लिक पब्लिकेशन के पास यह रचना पहुँचे। कितनी आसानी से कोई कहानी, कोई लेख देश तक पहुँच सकता है। मगर आज तो मीडिया का ख़ुद ही ठिकाना नहीं है। ऐसा कुछ हम पत्रकारिता के साथ तो कर सकते हैं — पब्लिक पत्रकारिता। आज तो ऐसा करना और भी आसान है। ईमेल से लेकर, ना जाने सूचनाक्रांति ने हमारी पहुँच को कहाँ-से-कहाँ पहुँचा दिया है। अगर कोई कमी है, तो उस सपने की जिसके पीछे हम भाग रहे हैं। क्या मिलेगा बच्चे को डॉक्टर, इंजीनियर बनकर जब वह लेखक बनना चाहता हो, या पत्रकार। पब्लिक पालिका ना जाने ऐसे कितने सामाजिक और सांस्कृतिक विकास का केंद्र बन सकता है।
लेखक बस इतना चाहता है कि इस परियोजना पर बहस हो। वह आप तक पहुँचने की लगातार कोशिश कर रहा है। आप भी थोड़ा ध्यान दीजिए।

युवा लेखक और चिंतक, दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री ( गोल्ड मेडलिस्ट)







