“We want JUSTICE!” — आज देश में एक तरफ़ विपक्ष चीख रहा था। उधर मंत्री जी कह रहे थे — “मोदी जी के नेतृत्व में पोलिटिकल स्टेबिलिटी है, और ये पोलिटिकल स्टेबिलिटी अभी लंबे समय तक चलने वाली है।” — देश में जिस तरह से सदन चल रहा है, देखकर लगता नहीं है कि सरकार ज़्यादा दिन चल पायेगी। पिछले साल बजट सत्र के साथ दिल्ली के चुनाव भी हो रहे थे। मैंने तभी अपने ब्लॉग पर लिखा था कि अगर दिल्ली में भाजपा की सरकार बन गई, तो केंद्र ख़तरे में आ जाएगी। मेरा अनुमान था कि एक साल के अंदर सरकार गिर जाएगी।
मैं इतना सोच ही रहा था कि संसद में नया नारा गूंजा — “नरेंद्र सरेंडर!”, “मोदी सरकार! डाउन! डाउन!”
इधर संसद की कार्यवाही चली जा रही है। कोई नहीं रुक रहा। सवाल जवाब का सिलसिला चला जा रहा है। एक मंत्री जी बता रहे थे कि मोदी जी का सपना है कि 6G कि अगुवाई भारत करेगा। साथ ही 5G भारत में सबसे तेजी से फैल रहा है। सरकार क्या यह अपनी उपलब्धि बता रही है? पूरा का पूरा टेलीकॉम सेक्टर निजी हाथों में है। बीएसएनएल की हालत देखी है। बेचारा! आज भी 2G टेक्नोलॉजी पर चल रहा है।
फिर से संसद गूंजा — “जो उचित लगे, वही करो!”
यह कैसा नारा है? जिसे इसका संदर्भ मालूम न हो, वह तो इसका मजा भी नहीं ले पाएगा। बात कुछ दिनों पहले संसद में राहुल गांधी पूर्व सेना अध्यक्ष मनोज मुकुंद नरवाने की किताब “Four Stars of Destiny” से कुछ पंक्ति पढ़ना चाहते थे। पूरी सरकार एक साथ विपक्ष बन गई। क्या एक किताब की कुछ पंक्ति सरकार हिला सकती है? ऐसा क्या लिखा है? सबकी जिज्ञासा जागी। पता चला, जब चाइना की सेना भारत की तरफ़ बढ़ रही थी, तब पीएम मोदी ने सेना अध्यक्ष से कहा — “जो उचित लगे, वही करो!”
किसी भी देश की सेना अगर युद्ध का निर्णय लेने लगा, तो ना जाने कितने युद्ध इस दुनिया को बर्बाद करके ही मानेंगे। वैसे देश के अंदर आरएसएस और बजरंग दल जैसी सेना यही तो कर रही है। देश परेशान है। क्यों? क्योंकि शिक्षा की भारी कमी है। रोजगार की कंगाली है। ऐसी दशा में दंगे करने-करवाने की नौकरी भी मिल जाए तो कोई क्या करेगा? जो मिल रहा, देश का युवा कर रहा है। एक तरह से देखें तो देश की जवानी भी जो उचित लग रहा है, वही कर रही है!
यह पूरा सिस्टम ही सड़ चुका है। क्या आपको भी एक नए सिस्टम की जरूरत नहीं लगती? क्या सूचना के बाद आपको शिक्षा क्रांति की जरूरत महसूस नहीं होती?
सूचनाओं से हम सभी घिरे हुए हैं। हम सबके पास अलग-अलग सूचनाएँ हैं। क्योंकि आज हम सबके पास सूचनाओं के अलग-अलग संसाधन मौजूद हैं। पहले एक टीवी, एक रेडियो से पूरा परिवार, पूरा गाँव, पूरा देश देख कर अपनी सच्चाई जानता था। फिर डिश टीवी आ गया। जब तक डीडी 1 चैनल था, तब तक तो देश संसद देख भी लेता था। अब कौन ही यूट्यूब पर जाकर दिन भर संसद देखेगा। वैसे तो पहले भी यह करना संभव ना था। पर तब एक मीडिया थी, जो देश तक सही सूचनाएँ पहुँचा रहा था। अब तो विभिन्न चैनलों पर चिल्लाते पत्रकार किसी तरह पैसे कमाने की कोशिश कर रहा है। किसी भी देश में सबसे ज़्यादा पैसा सरकार के पास ही होता है। तो आप भी अनुमान लगा सकते हैं कि मीडिया अगर अपनी नैतिकता को त्याग देगी तो किसका प्रचार-प्रसार करेगी?
वैसे भी देश की सरकार जो पार्टी चला रही है, संसद में ही खुलासा हुआ कि उसके पास 1000 करोड़ रुपये हैं।
मैं बचपन से लेखक बनना चाहता था। यहाँ तक पहुँचते-पहुँचते मैं इंजीनियर भी बन गया, दो बार अधिकारी बनते-बनते बाल-बाल बचा। फिर मैं एक दार्शनिक बना, मुझे दर्शनशास्त्र में मास्टरी डिग्री का एक स्वर्ण पदक भी मिला। यह अलग बात है, मैं लेने नहीं गया। क्योंकि मैं लिख रहा था। समय नहीं था। पिछले पाँच साल से निरंतर लिख रहा हूँ। हालाँकि मुझे आज तक कोई पाठक नहीं मिला। बाक़ी सब तो ठीक है, मगर गृहस्थी चलाने को पैसा लगता है।
आजकल महाराजा लोगों का राजकाज तो है नहीं, जो साहित्यकारों और कलाकारों को अपने दरबार में पालेंगे। आज तो लोकतंत्र है, लोक ही राजा है। अगर उन्हें ये रचना पसंद आयी, तो उम्मीद करता हूँ – लोक ही मुझे और मेरे परिवार को पाल लेगा। वैसे भी, यहाँ इस संसार में जब एक कुत्ता भी पैदा होता है ना, तब वो भी अपनी जीवनरेखा कहीं तो लिखवा कर आता है। उसके जीवन के लिए सारी सुविधाएँ पहले से मौजूद हैं। आप तो संभवतः धार्मिक ही होंगे, भाग्य की रेखाओं पर तो भरोसा रखते ही होंगे। ठीक वैसे ही, मुझे अपनी कलम पर भरोसा है। आपने गीता में तो पढ़ा ही होगा, शायद – “तुम कर्म करो और मुझे अर्पित कर दो।” ख़ुद कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं। मैं भी अपना यह कर्म अपने ही इहलोक को अर्पित करता हूँ।
मगर सरकार क्या कर रही है?
सारे टैक्स भरती है, जनता! इनकम टैक्स के बाद जीएसटी, उसके बाद प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने के लिये एजुकेशन टैक्स या शिक्षा उपकर के हेतु हम अलग से पैसे भरते हैं। ताकि ग़रीबों के बच्चे पढ़ सकें। वहाँ मुश्किल से दो वक़्त की रोटी छिपकली की सब्ज़ी के साथ परोसा जाता है। जिसके बहाने उनसे स्कूल का असली उद्देश्य जो शिक्षा है, उससे वंचित कर दिया जाता है। नंबर तो तब भी छप्पर-फाड़ आते हैं। तो चिंता की क्या बात है?
क्या सिर्फ़ डिग्री और गुणवत्ता के आधार पर आज नौकरी के बाज़ार में मजदूरी मिल रही है?पीएचडी की डिग्री लिए छात्र 10 मिनट की डिलीवरी में लगे हुए हैं। क्या होगा अगर सरकार एक किताब ही ढंग से पढ़ ले — अपने संविधान को, समझ ले उसकी भावना को, तो हम, भारत के लोगों को वोटर बनने के लिए भी डिग्री नहीं दिखानी पड़ती। आज तो हम, ढंग से मतदाता नहीं बन पा रहे।
हर दान से पुण्य नहीं मिलता। मतदान से तो लगता नहीं है, कोई पुण्य की संभावना भी बनती है। पुण्य कमाने के लिए आपके दान किए वस्तु के सदुपयोग भी होना चाहिए। सोचिए! दान में अगर आपने किसी को छुरा दिया और उसी छुरे से आपका क़त्ल हो गया, तो कौन सा पुण्य कमा लिया आपने?
मतदान के बाद हमने टैक्स-दान भी किया! जिसके बदले ना हमें शिक्षा मिली, ना स्वास्थ्य, ना ही रोज़गार! आपको सुरक्षित महसूस हुआ, या नहीं? हर नुक्कड़ पर हमारी ही इज्जत तो उछाली जा रही है! ख़ैर, हमें क्या?
क्या कर सकते हैं?
मुझे तो लगता है, मोदीजी ने सही ही कहा था — “जो उचित लगे, वही करो!”
हमें बस इतना निर्धारित करना है कि हमें उचित क्या लगता है।

युवा लेखक और चिंतक, दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री ( गोल्ड मेडलिस्ट)







