परीक्षाओं को लेकर इतनी दीवानगी क्यों है? आईआईटी की परीक्षा हो, या यूपीएससी की। पागलों की तरह परिवार लगा हुआ है कि किसी तरह उनके बच्चे की लॉटरी लग जाए। बस फिर सबका कल्याण हो जाएगा। एक भी बच्चा कलेक्टर बन गया तो, गाँव-गोतिया में सब बिल-बिला उठते हैं। दो भावनाएँ एक साथ उठती हैं। पहली तो ईर्ष्या और गुस्सा कि उनके बच्चे का काहे नहीं हुआ? फिर, एक उम्मीद कि चलो उसका तो हुआ, कभी ना कभी काम तो आयेगा। कुछ नहीं तो ट्रेन का टिकट ही वीआईपी कोटे में कटवा देगा।
परीक्षा इतनी जरूरी हो गई है कि कुछ भी कर उसे जीतना है। युद्ध भी है, और प्यार भी — यहाँ सबने सब कुछ जायज़ मान लिया है। साम-दाम-दंड-भेद किसी भी तरह बस परीक्षा निकालनी है। देश गया तेल लेने। लोक सेवा आयोग से सेवा समाप्त हो चुकी है। चुनाव आयोग की हालत देखी है। यही यूपीएससी पास करके ही ना गए होंगे केंचुआ में अपनी सेवा देने, वह केंचुआ अब साँप बन गया है। दीदी ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगायी है। देखते हैं! क्या होता है?
जिस तरह के पूल से लेकर प्रोडक्ट भारत में बन रहे हैं, वह साफ़ संकेत है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में भारी कमी है। हमारे स्कूल चाहे निजी हों, या सरकारी, हुआरे ही बच्चों के लिए सुरक्षित नहीं बचे हैं। बच्चों के स्वाथ्य पर इसका सीधा असर देखा जा सकता है। चिड़-चिड़ापन तो देश में आम हो गया है। गली-मुहल्लों में आप लोगों को चीखते-चिल्लाते देख सकते हो। क्या इस देश को और प्रशासनिक अधिकारियों की जरूरत नहीं है? क्या हमें बेहतर डॉक्टर और इंजीनियर नहीं चाहिए?
कुछ आईआईटी और सरकारी संस्थाएँ ही ऐसी हैं, जो बाक़ी निजी कॉलेजों में भर्ती का कारण बनती हैं। 10 में से कोई 1 होगा जो आईआईटी में जाएगा, बाक़ी कहाँ जाएँ? इस ख़ाली जगह को शिक्षा के व्यापारी भर रहे हैं। इन निजी कॉलेजों के पास ना इतना संसाधन होता है, ना ही कोई नेटवर्क जो छात्रों को एक व्यापक फलक दे सके। हर निजी कॉलेज में अपनी व्यवस्था होती है, जिस कारण वहाँ के छात्रों की गुणवत्ता भी अलग-अलग होती है। टीचर्स ट्रेनिंग संस्थाओं की तो और भी बुरी दशा है। इसका निजीकरण लगभग पूरा हो चुका है। कुछ संस्थाओं में मैंने रेट कार्ड देखा है। लाखों की फीस देने के बाद, रू० 5000 हाजरी बनाने के लिए, रू० 10,000 इंटरनल में मार्क्स के, और ना जाने कितनी सुविधाएँ ये संस्थान उपलब्ध करवा रहे हैं।
अब एग्ज़ामों की अम्मा यूपीएससी को ही देख लीजिए, एक पूरा आदमी भी इस परीक्षा में पास नहीं हो सकता, आधा भी नहीं, 0.1% है इसमें सफलता का चांस। सरकारी आँकड़ों के अनुसार 2024 में 5,83,213 अभ्यर्थियों में मात्र 1009 की भर्ती हुई। क्या देश में और प्रशासनिक अधिकारी नहीं चाहिए? लगता नहीं कि ज़्यादा दिन दूर है जब यूपीएससी भी निजी हाथों में चली जाएगी।
इस देश की अकादमिक संरचना—और उसकी शैक्षिक बुनावट—सड़ चुकी है। हमें अपनी मुक्ति के लिए एक नया रास्ता तलाशना होगा। मैं अपने आसपास निराशा और बेबसी देखता हूँ—चाहे वे लोग हों जिन्हें सफलता मिली है, या वे जिनसे असफलता हुई है। दोनों ही हताश हैं।
वर्तमान सरकार की रणनीति देखते हुए लगता है कि उनकी दिलचप्सी देश में कम और शेयर मार्केट में ज़्यादा है। मार्केट उछलता है, सरकार भी उछल जाती है। ख़ुद को माला पहनाने लगती है। सैलरी और पेंशन पर खर्च ना करना पड़े, इसलिए सरकार निवेश में लगी हुई है। मुनाफा कमाकर सरकार कहाँ जाएगी? हम, भारत के लोगों के पैसों पर जुआ खेल रही है, सरकार, और हम अपने बच्चों को दाँव पर लगा रखा है। जुआ खेलने भी भेज दें आज हम अपने बच्चों को, तब भी उन्हें परीक्षा की तैयारी पर भेजने से बेहतर होगा। अग्निवीर ना सिर्फ देश की शरहद पर ठिठुर रहा है, देश का हर छात्र जबरदस्ती परीक्षा की अग्नि में अपनी वीरता दिखाने को विवश है।
मेरे नज़रिए से देखें तो हमें एक बेहद नुकसानदेह तरीके से संस्थागत मानसिकता में ढाल दिया गया है।
भारत में तीन तरह के लोग ही रहते हैं — एक अभिभावक, दूसरा विद्यार्थी, और तीसरा शिक्षक। आप किसी भी नौकरी पेशे में हों, अगर आपकी कोई संतान है, तो आप उसके अभिभावक हुए। विद्यार्थी और शिक्षक तो हर कोई होता है। मगर शैक्षणिक स्तर पर देखा जाए तो अगर शिक्षक और विद्यार्थी की गुणवत्ता घटती है, तो बाज़ार पर इसका सीधा असर देखा जा सकता है। हमारे उत्पाद की गुणवत्ता घटी है, तभी तो वैश्विक बाजार में उनकी माँग भी घटी है। किसी तरह निजी कॉलेजों से डिग्री लेकर इंजीनियर बने छात्र आज देश को एक अच्छा इंफ्रास्ट्रक्चर बना कर नहीं दे पा रहे हैं। 90 डिग्री के फ्लाइओवर से लेकर करोड़ों में बनी पानी टंकी का धड़ाम से गिर जाना इसका प्रमाण है। सबसे बड़ा सबूत तो चूती संसद की नई इमारत है। भारत का IT सेक्टर ऐसे ही नहीं बर्बाद हुआ है। मेरे पास ख़ुद एक बीटेक की डिग्री है। दो बार यूपीएससी में असफल रहा हूँ। पिछली बार तो मेरी सारी मेहनत सही में पानी में डूब गई थी, जब मेरा OMR sheet जर्जर सरकारी स्कूल की खिड़की से आए बारिश के पानी में गिरकर बर्बाद हो गया था। मैं गिड़गिड़ाता रहा, मुझे दूसरी उत्तरपुस्तिका नहीं मिली। नियम यही है। गई भैंस पानी में। परिणाम आने से पहले ही मेरा रिजल्ट घोषित हो चुका था। एक साल की मेहनत बर्बाद हुई, सो अलग। आगे क्या? यह सवाल अलग।
तब से लिख रहा हूँ। मैंने अपना अनुभव ही नहीं लिखा है। मैंने अपना अनुमान भी लिखा है। जो कुछ भी मैंने इंजीनियरिंग कॉलेज में सीखा, उसके आधार पर अपने काम को इंटरनेट के माध्यम से अपनी दुनिया तक पहुँचाने कर प्रयास भी किया। कोई ध्यान ही नहीं देता है। पैसे के लिए नहीं, मैंने यह सब नहीं किया। आप मेरे किसी भी साईट पर एक प्रचार नहीं देख पाएंगे। पर मैं भी इसका प्रचार नहीं कर पाया। लोक सेवा की तैयारी में दोनों बार Public Administration ही mains का मेरा विषय रहा है। पब्लिक पालिका कोई हवा महल नहीं है। मेरी मंशा सिर्फ़ इतनी है कि इस पर एक व्यापक बहस हो, आख़िर यह हमारे बच्चों का सवाल है। जिस दिन मैं पिछली बार 2019 में यूपीएससी की परीक्षा देकर लौटा था, मैं बाप बना था।
उसी दिन मैंने निर्णय कर लिया था कि अपनी बेटी को मैं परीक्षा के पाप से बचाऊँगा। वह चाहे पढ़े, या चित्रकारी करे, या खेले, वह जो चाहे करे। मैं बस उसे सीखना सिखाऊँगा। मैं बस उसे एक अच्छा इंसान बनते देखता जाऊँगा। संभव है, मेरा पितृ ऋण तब उतर पाएगा।

युवा लेखक और चिंतक, दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री ( गोल्ड मेडलिस्ट)








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