घर में पैसा नहीं है, चले हैं बाजार ख़रीदने! सब चीख रहे हैं, चिल्ला रहे हैं — पैसा कहाँ है? IMF के आंकड़े बताते हैं दुनिया पर आज लगभग $251 Trillion का कर्ज है। दुनिया पर। किसी एक देश पर नहीं, पूरी दुनिया पर। दो ही बातें हो सकती हैं, एक तो यह कि कुछ देशों के पास $251 Trillion से ज़्यादा पैसे हैं, और बाकी दुनिया पर इनकी उधारी है। यह फिर, पूरी दुनिया ही कर्ज में है। अगर ऐसा है तो यह कर्ज हम किससे ले सकते हैं?
आइए एक उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं। तेल जिस अनुपात में निकाला जा रहा है, 50 से 100 साल में यह ख़त्म हो जाएगा। संभवतः तब तक इंसान कोई और जुगाड़ खोज लेगा। खोज ही रहा है। मगर अगर हम आज से 50 साल पहले जिस रफ़्तार से तेल निकला जा रहा था, उस रफ़्तार से तेल और 200 साल चलता। धरती पर प्राकृतिक संपदा सीमित है। अगर हम इसका दुरुपयोग या अत्यधिक प्रयोग करते हैं, तो एक तरह से देख जाए तो हम भविष्य से उधार ले रहे हैं।
मुद्रण एक तरह से ऊर्जा का सिक्का है। मुर्दों को कभी पैसों के लिए मरते देखा है आपने?
ना जाने कितने लोग पैसे के लिए मर गए। ऊर्जा संरक्षण का नियम क्या उन पर लागू हो सकता है?
ऊर्जा का ना तो सृजन हो सकता है। ना ही ऊर्जा का विनाश संभव है। ऊर्जा बस एक रूप से दूसरे में बदल सकती है। मुद्रण पर भी तो यही नियम लागू होता है। सोचिए! अगर देश-दुनिया और पैसे छाप कर क़र्ज़ उतार पाता तो, कोई कर्जे में क्यों होता?
भगवद्गीता भी तो हमें यही पाठ पढ़ाती है, जो अर्थशास्त्र बताता है:
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥
ना कोई हथियार इस आत्मा हो काट सकता है, ना ही कोई आग इसे जला सकती है, ना पानी इसे भीगा सकता है, और ना ही हवा इसे सुखा सकती है।
दुनिया को यह समझना आज बहुत जरूरी है कि अर्थ जीवन में है, ऊर्जा में है। इसे व्यर्थ नहीं करना चाहिए। सूचना क्रांति के बाद शिक्षा और फिर प्रज्ञा क्रांति की जरूरत है। इसके लिए आज देश-दुनिया को शिक्षा पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए। वैसे तो ऐसा कोई काल आयेगा नहीं, जहाँ शिक्षा की जरूरत ना हो। पर विश्व-युद्ध की तरफ बढ़ते हमारे कदम ठिठक जाने चाहिए, यह सोचकर कि क्या होगा इन सूचनाओं का, इन मशीनों का, अगर इनका उपयोग करने वाला ही कोई ना हो?
जिस तरह अमेरिका के राष्ट्रपति दुनिया को धमका रहे हैं। पहला प्रतिकार तो अमेरिका के लोगों को करना चाहिए। क्या मिलेगा भारत के साथ ऐसा डील कर जहाँ भारत के किसान जो पहले से अपनी जान देने को मजबूर हैं, और असहाय हो जाएँगे? क्या मिलेगा अपने उत्पाद से भारत को भरकर, अगर हम, भारत के लोगों के पास उसे ख़रीदने का पैसा ही नहीं रहेगा?
कल संसद में राहुल गांधी जी ने बड़ी कुशलता से देश के सामने अपनी बात रखी। आज देश कठिन परिस्थितियों से गुजर रहा है। विडंबना यह है कि सरकार मानने को तैयार ही नहीं है। ना ही आने वाली विपदा का कोई समाधान उनके पास नजर आता है। मौजूदा बजट में बस घोषणाएँ है, ठीक वैसी ही जैसी पिछले 10-12 सालों से हम, भारत के लोगों को मिल रही है। इसके अलावा एक मन की बात मिलती है, या फिर परीक्षा पर चर्चा, और जो बचा वह जुमला मंत्रालय संभाल लेता है।
मुझे यह देखकर बड़ा आश्चर्य होता है कि देश में सरकार चलाने के लिए 272 संसद चाहिए। इस सरकार के पास थोड़े ज़्यादा होंगे। क्या इनमें से किसी को सामने से आता आर्थिक संकट नहीं नजर आता? कोई चर्चा नहीं। सब-के-सब बस हर-हर मोदी का नारा लगाने में व्यस्त हैं, इधर मोदीजी विदेश-दौरों में मस्त हैं। देश को तो इतना भी पता नहीं चल रहा तेल लेने कहाँ जाएँ? उधर माई फ्रेंड ट्रम्प बोलता है, वह निगरानी रखे है कि कहीं भारत चोरी-छिपे रूस से सस्ता तेल ना ख़रीद लें। निगहबंद भारत, में हम, भारत के लोग कैसे आजाद हो सकते हैं?
सांसद अभिषेक बनर्जी ने कहा बच्चे के पैदा होने से लेकर मौत तक हम, भारत के लोग बस टैक्स भरते हैं। दूध से लेकर अर्थी तक पर टैक्स लगा रखा है सरकार ने। इस पर निर्मला ताई ने उत्तर दिया। वह क्या जवाब था? मस्साल्लाह! सुन कर मजा आ गया। बोलती हैं कि दूध पर तो हमने कभी जीएसटी लगाया ही नहीं। विपक्ष बस सदन को गुमराह करने की कोशिश कर रहा है। सदन का तो पता नहीं, पर इतना सुनकर मुझे तो यकीन हो गया मुझे ज़रूर गुमराह किया जा रहा। पक्ष हो, या विपक्ष, सरकार किसी की भी हो, होती तो जनता के लिए ही है। मुझे तो यह देश अपना नहीं लगता। सड़कों पर घूमते हुए पुलिस दिख जाये तो डर लगता है। पकड़ा गया तो कोई-ना-कोई तो गलती तो ढूँढ ही लेगी। हेलमेट पहना है। लाइसेंस भी लेकर घूम रहा हूँ। इन्शुरन्स भी करवाया है। पुलिस वाले ने बोला — PUC पुराना हो गया है। देखा! मिल गया ना प्रदूषण, और मोदीजी बोलते हैं — मौसम का मजा लीजिए।
माफ कर दीजिए। आपका हर सांसद बकवास कर रहा है। आप ख़ुद मिस्टर इंडिया बने घूम रहे हो। कभी कहीं सुनायी तो देते हो, दिखते कम ही हो। कभी सदन में भी दर्शन दे दिया करो, मैंने तो आज तक वोट नहीं किया। पर जिसने भी आपको वोट किया होगा, वह तो आपका छप्पन इंची वाला सीना देखना चाहता होगा।
तू ज़िंदा है, तो पहले ख़ुद को तू स्वीकार कर, ज़िंदगी की जीत होगी, पहले ख़ुद से तो प्यार कर, अगर कहीं है स्वर्ग, इस बात से इंकार कर, है अगर ज़िद्द तो जन्नत का निर्माण कर! ग़म-सितम के उन चार दिनों का आज तू बहिष्कार कर, हज़ार दिन गुजर चुके, अब और ना तू इंतज़ार कर, आज ही होगी इस चमन में बाहर, रचकर कुछ बनकर तू ख़ुद से दीदार कर! पहले कारवाँ की मंज़िलों का फ़ैसला तो कर, हर हवा या लहर की तू परवाह ना कर, एक कदम तू आज चल, एक कदम और कल, मंज़िलों को छोड़कर आगे सफ़र की तैयारी तू कर! देख स्वराज मिल चुका, ख़ुद का तू अभिषेक कर, हर भेष धरकर आये जीवन तेरे द्वार पर, धर्म-अधर्म छोड़कर, जात-पात तोड़कर, संविधान को तू स्वीकार कर! साहित्य, भूगोल, अर्थ के ज्ञान से आज तू शृंगार कर, देख विज्ञान बढ़ रहा वक्त की पुकार पर, ज़रूरतों को जानकर, बाज़ार की बुनियाद तू तैयार कर, बहुत हुई उलझने, अब जीवन का तू चुनाव कर! लोकतंत्र आज है, इस सच का तू एतबार तो कर, हक़ का पत्र लेकर तू अब ना और माँगकर, यह लोक, यह तंत्र तेरा है, पहले इसकी कल्पना तो कर!

युवा लेखक और चिंतक, दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री ( गोल्ड मेडलिस्ट)







