गोवा में सूरज डूबता भी बाद में और उगता भी। रात और सुबह थोड़ी ठंड रहती है और दिन में सूरज दमखम के साथ उगा रहता है। मौसम सुहाना ही है। वसंत पेड़ों पर उतर आया है। आम मंजरियों से लदा है। आम के पेड़ बहुत लंबे-लंबे हैं और उससे प्रतियोगिता कर रहा होता नारियल का पेड़ है। कटहल, पतरज, मरीच और सैकड़ों तरह के पौधे हैं, जिन्हें मैं नहीं पहचानता। लगभग सभी घर पेड़ों से घिरा हुआ है। सुबह जब टहलते हुए एक पहाड़ी पर चढ़ गया तो गोवा पहाड़ियों और पेड़ों में डूबा नजर आया। पहाड़ी चिड़िया के स्वर सुनाई पड़े, लेकिन जितने पेड़ हैं, उनकी तुलना में चिड़िया कम हैं। कौए अभी तक दिखे नहीं, कबूतर है, मैना भी।
गोवा लोग आयें और समुद्र न देखें, यह कैसे संभव है? मैं साथियों के साथ दो समुद्री किनारों पर गया- मीराबार और दोनापाउना। दोनों पणजी में है। दोनापाउना को कृत्रिमता प्रदान कर दी गई है। पचास रुपए की वसूली होती है, तब आप अंदर जा सकते हैं। कहा जाता है कि ‘एक दूजे के लिए’ फिल्म की शूटिंग यहाँ हुई थी। मीराबार में समुद्र की हल्की लहरें किनारों पर आकर टूटती रहती हैं। रेत यहाँ हैं और आप चाहें तो देर तक समुद्री किनारों पर टहल सकते हैं। समुद्र की लहरों पर चलने का एक सुख है। समुद्र के अंदर थोड़ी दूर गया। रेत में पैर खुद-ब-खुद धंस जाते थे। डूबते सूरज की किरणें समुद्र की लहरों पर जब चमकती हैं तो मुश्किल से आँखें उस पर जमती हैं।
गोवा में मौर्य, चालुक्य, सातवाहन आदि ने राज्य किया और 1510 में पुर्तगालियों ने इस पर कब्जा किया। उन्होंने 450 वर्षों तक राज किया। 1961 में गोवा आजाद हुआ और वह भारत का हिस्सा हुआ। डॉ लोहिया का यहाँ बहुत सम्मान है, क्योंकि उन्होंने पहली बार 1946 में गोवा की आजादी के लिए आवाज बुलंद की। पुर्तगालियों के आने के बाद ईसाई धर्म का प्रचार हुआ। यहाँ पुराने गोवा में पंद्रहवीं शताब्दी के चर्च हैं। जब मैं बासिलिका आफ बाम जीसिस पहुँचा तो उसकी भव्यता मोहित करती है। ईसाईयों के स्मृति-चिह्न हैं और अभी जीवंत हैं। उसके सामने से कथेड्रल (प्रधान गिरिजाघर) है। यह सत्रहवीं सदी में बनाया गया है। पुर्तगाल के राजा डाम सबस्टियाओ ने इसे बनाने का आदेश दिया था। हजारों एकड़ में फैले इस गिरिजाघर में अनेक पूजा गृह हैं। कैम्पस नारियल के पेड़ों से आच्छादित है। यहाँ एक पुरातत्व संग्रहालय है।
ओल्ड गोवा के नाम पर मेरे मन में ओल्ड दिल्ली की ध्वनि आ रही थी और मुझे लग रहा था कि पुरानी दिल्ली की तरह ही ओल्ड गोवा भी गंदा होगा। लेकिन उसकी सफाई और शांति मुग्ध करती है। ओल्ड गोवा को रोम आप ईस्ट भी कहा जाता है। संग्रहालय के सामने तोप रखे हुए हैं। यह तोप औपनिवेशिक साम्राज्य की विजय गाथा भी है। भारत में तरह-तरह के रजवाड़े हुए और उनकी आपसी लड़ाई हुई। उनके बीच के अंतर्विरोध और संघर्ष ने बाहरी लोगों को अवसर दिया। आज भारत की एकता के लिए बहुसांस्कृतिक एकता की जरूरत है। जो भी निवासी हैं देश के, उनमें सांस्कृतिक एकता चाहिए। 2026 का भारत पंद्रहवीं या सत्रहवीं सदी का भारत नहीं है। देश को सम्मान के साथ जीना है तो बहुसांस्कृतिकता और बहुभाषिकता का सम्मान देना होगा। यहाँ की भाषा कोंकणी है, लेकिन हिंदी धड़ल्ले से बोली और समझी जाती है।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







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