पंद्रह-बीस दिनों से कभी कभार कुहर-कुहर कर धूप उगती थी। आज सुबह से ही धूप है। आम के वृक्ष की फुनगियों पर बैठी धूप रात भर भींगते रहे पत्ते-पत्तियों से खेल रही है। आम के भी दिन बहुरने वाले हैं। शिशिर ऋतु ज्यादा दिन नहीं टिकने वाली। वसंत ऋतु दस्तक दे रही है। 23 जनवरी को वसंत पंचमी है। मंजर डालियों पर इतराने से पूर्व प्रसव की पीड़ा तो होती ही है। आम्र कुंजों के लिए यह प्रसव काल ही है। टहनियों से जुड़ी पत्तियां थोड़ी और झुक जाती हैं और मंजरियों के लिए रास्ता सुगम बनाती हैं। मंजरियां खबर लेकर आती हैं कि ऋतुराज आ गया है। कविवर रामदयाल पांडेय ने वसंत की पुकार में इन अनुभूतियों का अहसास किया है –
“वसन्त की पुकार है- ‘धरा सुहागिनी रहे,
प्रभा सुहासिनी रहे, कली सुवासिनी रहे;
कि जीर्ण-शीर्ण विश्व का हृदय सदा तरुण रहे;
हरीतिमा मिटे नहीं, कपोल चिर अरुण रहें।”
सुहागिन रहे धरा, इसके लिए वसंत का आगमन होता है। ऋतुएँ हर समय सदय रहती हैं, पर कुछ आदमी प्रकृति के प्रति एकदम निर्दय होता है। खासकर वे जो या तो धनाढ्य होते हैं या पदधारी। वे अपनी हवस और स्वार्थ के लिए प्रकृति को तहस-नहस कर देते हैं। उनका ढोंग और पाखंड देखते बनता है। साल भर में एक दिन पर्यावरण दिवस आता है। एक पौधा लगा देता है। उसकी तस्वीरें फेसबुक से लेकर मुख्य मीडिया में तैरने लगती हैं और फिर अपने एयरकंडीशन कमरे में बैठ कर लाखों पेड़ काटने का आदेश दे देता है। लगता है कि पेड़ और जमीन इनकी जागीर है।
जंगल और वनों को हमने नहीं बनाये। कुदरत ने करोड़ों पेड़ों का संवर्धन किया। जीव जंतु, झरने, नदियाँ। खूबसूरती। मगर दो टके के राजनेता और पूँजीपतियों ने इस खूबसूरती को उजाड़ा। हम मान नहीं रहे। हम कृत्रिम मंदिरों में जाकर स्वाभिमान ढूँढते हैं। बेटियों को जिसने कुचला, उसे संरक्षण देते हैं। किसी के लिए धन अय्याशी का साधन है और किसी की भूख मिटाने के लिए धन नहीं है। धन और धरती को हमने ऐसे बाँटा कि बहुसंख्यक लोगों के पास स्वाभिमान कहाँ से आयेगा? राजनेताओं के पीछे दुम हिलाते लोग कितने स्वाभिमानी हैं? स्वाभिमानी दोनों नहीं हैं। चाहे वह किसी का स्वाभिमान कुचले या वह जो स्वार्थ के लिए अपना स्वाभिमान गिरवी रख दे।
पर निर्भरता स्वाभिमान को कुचल कर रख देती है। आज ज्यादातर देश कर्ज में डूबा है। कर्ज भी इतना कि उसे चुकता करना मुश्किल। ऐसे देश का स्वाभिमान कहाँ से बचेगा? पिछले दो दिनों से मैंने देश के तीन तथाकथित महत्वपूर्ण व्यक्तियों के कार्यकलाप को देखा। सुरक्षा विशेषज्ञ डोभाल, विदेश मंत्री जयशंकर और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी। डोभाल और जयशंकर खुलेआम हिन्दू-मुस्लिम कर रहे हैं और प्रधानमंत्री स्वाभिमान ढूँढने सोमनाथ जा रहे हैं। पिछले बारह सालों में प्रधानमंत्री ने 140 लाख करोड़ कर्ज लिया। कर्ज में डूबे देश का प्रधानमंत्री कितना स्वाभिमानी होगा? बदतमीज ट्रंप प्रधानमंत्री के खिलाफ निचले दर्जे की भाषा बोलता है और प्रधानमंत्री चुप रहते हैं। क्या यह स्वाभिमानी व्यक्ति का धर्म है?
सोमनाथ मंदिर में जाकर हिन्दू-मुस्लिम कर लेने से देश स्वाभिमानी नहीं हो जाता। स्वाभिमान की भी एक शर्त होती है। उसके लिए मूल्य चुकाना पड़ता है।
वेनेज़ुएला पर कब्जा कर ट्रंप स्वाभिमानी नहीं हो जाता। वेनेज़ुएला के तेल कुओं पर कब्जा कर वह तेल बेचने पर आतुर है। यह सरेआम अंतर्राष्ट्रीय डकैती है और डकैत कभी स्वाभिमानी नहीं होता। उसे स्वाभिमान से नफ़रत होता है और नफ़रत किसी समाज या मुल्क को विश्व गुरु नहीं बनाती।
प्रकृति के पास है सौंदर्य और सुख का खजाना, उसे अपनी बेवकूफी से तबाह मत कीजिए।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर






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