लैनी की आत्मकथा 

कहानी में कुछ ऐसा नहीं है, जो आकर्षित कर सके - न कथ्य, न शिल्प। लेकिन यह कुछ ऐसा है, जिसे बार-बार दुहराया गया है। इसीलिए बार-बार कहे जाने की जरूरत भी है। इसी जरूरत के कारण इसे फिर से कहा गया है। आप चाहें तो इसे फिर से पढ़ सकते हैं।
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कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।

Dr. Anil Kumar Roy
Dr. Anil Kumar Roy

कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।

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4 Comments

  1. प्रतिरोध के स्वर को इस कथा में दिखाने की ज़रूरत मैंने महसूस की . कहानी रोचकता बनाये रखी जिस वज़ह से त्रासदियों के बीच भी की समाज की पतनगाथा रोमांचक बनी . सेंगर की ज़मानत की कहानी याद आ गयी

    • आपने यह कहानी पढ़ी, इसके लिए आभार! कहानी में नायिका को न्यायालय से उम्मीद नहीं दिखती है, चूँकि न्यायालय अपने दायित्व के निर्वहन में अविश्वसनीय लगता है, इसलिए वह जनता को अपनी कहानी सुनाती है। यहाँ यह ध्वनित करने की कोशिश की गई है कि जब व्यवस्था से नाउम्मीदी हो तो जनता ही उम्मीद होती है।

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