नोटिफिकेशन

लेखक को यह कहानी एक गीगा वर्कर ने सुनाई थी। यह उसी का कथात्मक रूपांतरण है। उसकी आत्मकथा की वह व्यथा, जो सुनाते समय उसकी आँखों और चेहरे से झलकती थी, उसे शब्द नहीं पकड़ सकते है। कहानी थोड़ी लंबी है। समय हो तो अवश्य पढ़ें।

ऑफिस के कमरे से निकलते समय उसी मकान के गलियारे में एक जगह टँगे हुए आईने में उसने ख़ुद को देखा। जो क़मीज़ पहनकर वह घर से आया था, उसके ऊपर अब कंपनी का नाम लिखा हुआ लाल टीशर्ट चढ़ा था और कंधे से एक लाल बैग लटक रहा था। एकबारगी वह ख़ुद को ही नहीं पहचान पाया। ठिठक गया। गौर से ऊपर से नीचे तक अपने को देखा। उसे लगा कि वह वही नहीं है, जो वह घर से निकलते वक्त तक था। कल तक उसके पास यूनिवर्सिटी का सेकंड टॉपर होने का गर्व था, सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक विषयों के विश्लेषण की तीक्ष्णता थी, पब्लिक सर्विस कमीशन में उत्तीर्ण होकर साहब बनने का सपना था; लेकिन अब वह एक डिलीवरी बॉय था। एक ऐसा डिलीवरी बॉय, जिसके पास गर्व करने को कुछ नहीं था, सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक विषयों को समझना बैक पॉइंट था, किसी बात पर तर्क करना उद्दंडता थी और धूप-धूल से जूझता हुआ यथार्थ था। अब वह वही रवि नहीं था।

एक बार हुआ कि वह टीशर्ट और बैग को उतार फेंके। वह खड़ा रहा। अपने को ही अपने से निहारता रहा। लेकिन बैग नहीं उतर सका। घर की जिल्लतों ने उसे बैग उतारने नहीं दिया। बदले में उसने अपना सपना, अपना गर्व और अपनी बौद्धिकता के एहसास को ही उतार दिया। कंधे पर नीचे सरकते बैग को खींचकर ऊपर किया और सीढ़ियों से नीचे उतर गया, वहाँ, जहाँ उसकी मोटरसाइकिल खड़ी थी और जहाँ उसके जैसे लोगो लगा टीशर्ट पहनकर बैग टाँगे अनेक लड़के आपस में बात कर रहे थे।

सभी लड़कों से अलग वह अकेले खड़ा था। यह वजह कम थी कि उनमें कोई उसका परिचित नहीं था। ज़्यादा बड़ी वजह थी कि वह अकेले अपने अतीत की आकांक्षाओं के साथ थोड़ी देर जीना चाहता था। यहाँ आने के पहले उसने हज़ार बार सोचा था। प्रतीक्षा भी की थी कि जिन परीक्षाओं को वह दे चुका था, उनका रिजल्ट आने तक वह किसी तरह रुके। उसे उम्मीद भी थी कि उसका सिलेक्शन हो जाएगा। लेकिन रिजल्ट थे कि आने का नाम नहीं लेते थे। रिजल्ट के आने में देरी से उसने चाहा कि जब तक रिजल्ट नहीं आता, तब तक किसी कंपनी वगैरह में ही काम ढूँढ ले। इसके लिए काफ़ी मेहनत की। सुबह उठकर ही अखबार में विज्ञापन देखता और करीने से सर्टिफिकेट रखे प्लास्टिक की फाइल को उठाकर पहुँच जाता और लाइन में खड़ा रहता। प्राइवेट नौकरी की लाइन में खड़े होते-होते बेरोजगारी की महामारी को वह समझ गया था। उसने बिना विज्ञापन देखे भी कई जगहों पर कोशिश की। लेकिन उसके इतिहास विषय का सर्टिफिकेट उसे चाहे जितना गर्वित करे, कंपनी में उस ज्ञान का महत्व नहीं है। कंपनियाँ ख़ुद अपना इतिहास बनाने की होड़ में लगी हैं। घर की हालत ने उसे लाचार कर दिया। अंत में चारों ओर से थक-हारकर उसने यह रास्ता चुना। आज उसे महसूस हुआ कि चाहतों से परिस्थितियों का निर्माण नहीं होता। परिस्थितियाँ अक्सर इच्छाओं का गला घोंट देती हैं। रवि को भी अपने गले पर कसाव महसूस हुआ। उसने डिक्की में रखी पानी की बोतल निकाली और कुछ घूँट निगले। तभी मोबाइल के स्क्रीन पर नोटिफिकेशन आया पहले ऑर्डर का। भीतर से उसे अब भी लौट जाने की इच्छा हो रही थी। लेकिन काँपती उँगलियों से उसने पहली बार ‘accept’ बटन दबा दिया।

कल जब उसकी नींद खुली तो सुबह की धूप खिड़की की सलाखों से छनकर कमरे के फर्श पर लंबी आयतें बना रही थी। बाहर गली में दूधवाले की साइकिल की घंटी बजी, उसके पीछे अख़बार फेंकने की आवाज़ आई। अख़बार दरवाज़े से टकराकर फर्श पर फिसला। पहले पन्ने पर मोटे अक्षरों में छपा था—“युवाओं के लिए लाखों नए रोज़गार अवसर।” नीचे छोटे अक्षरों में—“भर्ती प्रक्रिया अगले आदेश तक स्थगित।” पढ़कर उसने एक लंबी साँस ली। सामने वाले मकान की छत पर दो लड़के मोबाइल में झुके खड़े थे। उसे लगा शायद वे भी कहीं जॉब ढूँढ रहे हैं या फॉर्म भर रहे हैं। गली के मोड़ पर एक कोचिंग सेंटर की दीवार पर पोस्टर चिपका था: “सरकारी नौकरी की अंतिम तैयारी।” इस “अंतिम” शब्द को वह वर्षों से हर साल नया होकर लौटते देख रहा है। 

तैयार होकर रवि ने झुककर लाल डिलीवरी बैग उठाया। सामने की मेज़ पर पारदर्शी प्लास्टिक की फ़ाइल में उसके सारे सर्टिफिकेट रखे थे। वही सर्टिफिकेट्स, जिन्हें वह दर्जनों बार अपने से कम समझ वाले एचआर को दिखाकर रिजेक्ट हो चुका था। उस फाइल के अंदर नीली स्याही से छपी डिग्रियाँ, विश्वविद्यालय की गोल मुहर, कुलपति के हस्ताक्षर भीतर से ही दिख रहे थे। कल तक उन काग़ज़ों को देखते ही उसे गर्व का अनुभव होता था। लेकिन आज उसे वे केवल कागज लग रहे थे। ऐसे काग़ज़, जो अब भी इतने सधे हुए थे, जैसे उन्हें कभी मोड़ा ही न गया हो। कुछ देर वह उन्हें निहारता रहा। फिर यह सोचकर कि यदि यह फाइल साथ रही तो डिलीवरी करने के लिए आते-जाते समय निकालकर वह किसी कंपनी में इंटरव्यू दे सकेगा, उसने उँगलियों से फाइल पर पड़ी हल्की धूल झाड़ी और उसे बैग के भीतर करीने से रख लिया। अब बाहर से सिर्फ़ लाल बैग दिख रहा था। उसने कंपनी की टी-शर्ट पहनी, गर्दन में आईडी कार्ड लटकाया और बैग कंधे पर डाला। बैग खाली था, लेकिन उसने महसूस किया कि उसका कंधा थोड़ा नीचे झुक गया है। 

गली में उसी समय तीन बाइकें एक साथ स्टार्ट हुईं। सबके कंधों पर एक ही रंग का बैग। कुछ दूर मंदिर से आरती की आवाज़ आ रही थी, और उसी के बीच किसी घर में टीवी पर न्यूज़ एंकर ऊँची आवाज़ में कह रहा था— “देश का युवा आत्मनिर्भर बन रहा है।” बाहर सड़क पर धूप तेज़ हो रही थी। ट्रैफ़िक का शोर बढ़ रहा था। उसने मोबाइल में ऐप खोला। “Go Online.” उसने बटन दबाया। तभी मोबाइल स्क्रीन पर नोटिफिकेशन चमका— “High demand in your area. Surge pricing active.”

शहर पूरी आवाज़ में जाग चुका था। उसे चारों ओर नौकरी ढूँढने वालों की भीड़ ही दिखाई पड़ती थी। बस-स्टॉप पर लड़के-लड़कियाँ फाइलें दबाए खड़े थे। फोटोस्टेट की दुकान पर फ़ोटो कराने वाले लड़के-लड़कियों की भीड़ जमा थी। पोस्ट ऑफिस में एप्लीकेशन रजिस्ट्री करने वालों की कतार लगी थी। बगल में पेड़ के नीचे फॉर्म भरते और उसे लिफ़ाफ़े में भरते लड़कों का झुंड बैठा था। कहीं कोई मोबाइल पर “Exam Postponed” का मैसेज अपने दूसरे साथियों को दिखा रहा था। लेकिन चौराहे पर चाय की दुकान में अख़बार फैलाए दो आदमी बहस कर रहे थे— “नौकरियों की कमी नहीं है। बस, योग्यता की कमी है।” 

यूनिवर्सिटी में पढ़ते हुए और डिबेट में भाग लेते हुए उसने अब तक सोचना ही तो सीखा था। इस नए काम में सोचने की कहीं जगह नहीं थी। उसके काम के दूसरे लड़के नहीं सोचते थे। लेकिन उसका सोचना अभी छूटा नहीं था। ‘योग्यता’ शब्द उसके कानों में नश्तर की तरह घुसा। वह सोचने लगा – योग्यता किसे कहते हैं? उसका मापदंड क्या है? योग्यता का निर्धारण कौन करता है? क्या उसके पास भी योग्यता की कमी है? हर काम के लिए अलग-अलग योग्यता चाहिए। क्या एक आदमी इतनी योग्यताएँ हासिल कर सकता है? आदि-आदि। तब तक रेस्तराँ आ गया।

रेस्तराँ की किचन में भाप भरी हुई थी। स्टील के बर्तनों की आवाज़, काउंटर पर रखे पैकेट, स्क्रीन पर झिलमिलाते ऑर्डर नंबर। उसके जैसे पाँच और लड़के लाइन में खड़े थे—सबके कंधों पर वही लाल बैग। कोई चुप था, कोई हँसने की कोशिश कर रहा था। एक ने कहा— “भाई, आज इंसेंटिव अच्छा है। दस पूरे कर लिए तो दिन निकल जाएगा।” रवि ने पैकेट लिया। ऐप पर टाइमर चालू हो चुका था।

सड़क पर ट्रैफ़िक रेंग रहा था। एक कोचिंग सेंटर के बाहर भीड़ लगी थी—नया बैच शुरू हुआ था। दीवार पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था: “आप भी बन सकते हैं अफ़सर।” नीचे छोटे अक्षरों में फीस का आँकड़ा। मोबाइल स्क्रीन पर समय घट रहा था। पहली डिलीवरी एक ऊँची इमारत में थी। गेट पर सिक्योरिटी गार्ड ने रजिस्टर आगे बढ़ाया—
“नाम?”
“रवि।”
“कंपनी?”
उसने टी-शर्ट की ओर इशारा किया।

लिफ़्ट में शीशे की दीवारें थीं। ऊपर जाते हुए उसने नीचे सड़क को देखा – छोटे-छोटे लोग, भागती गाड़ियाँ। अभी-अभी जिस अव्यवस्थित रास्ते से होकर वह आया था, वह उसे बिल्कुल व्यवस्थित लग रहा था। उसे पहली बार अनुभव हुआ कि व्यवस्था को देखने की भी अपनी-अपनी जगह होती है। ऊपर से देखने वालों को शहर सुंदर और व्यवस्थित दिखता है। उस शहर में जीने वालों को वही शहर अपनी बदसूरती और अस्त-व्यस्तता से चिढ़ाता है। लेकिन क्या जमीन पर जीने वाले सारे लोग उस अस्त-व्यस्तता को देख पाते हैं? क्या यह देखने की दृष्टि भी व्यवस्थापक द्वारा नहीं प्रदान की जाती है कि बुराई को भी अच्छाई के रूप में देखा जाये?

तभी नौवीं मंज़िल आ गई। दरवाज़ा खुला। अंदर के एसी की ठंडी हवा का एक झोंका उसके झुलसते बदन से टकराया। एक युवक लैपटॉप पर झुका बैठा था। उसने बिना ऊपर देखे कहा— “टेबल पर रख दीजिए।”

रवि ने पैकेट रखा। “ओटीपी सर।”

युवक ने मोबाइल देखा, अंक पढ़े। रवि – “थैंक्यू सर।”

युवक ने कोई जवाब नहीं दिया, जैसे सुना ही न हो। 

मोबाइल तुरंत चमका— “Order delivered. Customer may rate you.” रवि को लगा कि उसकी परीक्षा चल रही है। ऐसी परीक्षा, जिसमें कस्टमर परीक्षक होते हैं।

लिफ़्ट में लौटते समय उसने अपने बैग का वजन महसूस किया। भीतर फ़ाइल शांत पड़ी थी। नीचे लॉबी में टीवी पर न्यूज़ चल रही थी— “सरकार ने कौशल विकास के नए कार्यक्रम की घोषणा की है।”

बाहर निकलते ही मोबाइल फिर बजा—दूसरा ऑर्डर। फिर तीसरा।

दोपहर चढ़ते-चढ़ते धूप कड़ी हो गई। हेलमेट के भीतर पसीना जमा होने लगा। उसने एक ट्रैफ़िक सिग्नल पर बाइक रोकी। बगल में खड़ा एक लड़का उसी जैसे बैग के साथ मोबाइल पर झुका था। शायद वही ऐप, वही टाइमर। रवि को लगा—शहर एक अदृश्य दौड़ है। कोई स्टार्टिंग लाइन नहीं, कोई फिनिश लाइन नहीं। बस टाइमर है, जो हर स्क्रीन पर घटता रहता है। सिग्नल हरा हुआ। दोनों ने एक साथ एक्सीलेरेटर घुमाया। 

मोबाइल फिर कंपनाया— “Keep your acceptance rate high to earn more.” उसने बाइक तेज़ कर दी। और उसे फिर वही दबाव महसूस हुआ— कंधे पर दो वज़न। उसे लगा वजन केवल वही नहीं ढो रहा है; पूरा शहर जैसे उन्हें उसके साथ ढो रहा था।

तीसरा ऑर्डर एक पुराने, लेकिन सँवारे हुए अपार्टमेंट में था। नाम पढ़कर वह ठिठका— निखिल वर्मा।उसे याद आया—विश्वविद्यालय में वही निखिल जो हर बहस में उसके सामने खड़ा होता था। दोनों लाइब्रेरी में देर तक बैठते थे। कॉलेज के दिनों का सबसे गहरा मित्र। फर्क बस इतना था कि निखिल के घर से हर महीने पैसे आते थे। लिफ़्ट में जाते हुए उसके भीतर हल्की-सी बेचैनी उठी। उसने हेलमेट उतार लिया। बालों में हाथ फेरा। अनजाने में टी-शर्ट सीधी की। इंटरकॉम दबाया।

“कौन?”

“डिलीवरी।”

दरवाज़ा खुला।

दो सेकंड तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

“रवि?”

“हाँ… निखिल।”

निखिल के चेहरे पर पहले आश्चर्य आया, फिर जल्दी से सँभाली हुई सहजता से कहा – “अरे यार! अंदर आओ।”

अंदर एसी की ठंडी हवा थी। दीवार पर फ्रेम में एक कॉर्पोरेट कंपनी का सर्टिफिकेट टंगा था—“Employee of the Quarter.” मेज़ पर खुला लैपटॉप, स्क्रीन पर एक्सेल शीट।

“तू… ये?” निखिल ने आधा सवाल हवा में छोड़ा।

“बस… अभी कर रहा हूँ।” रवि ने बैग नीचे रखा। “तैयारी भी चल रही है।”

“अच्छा है। कुछ-न-कुछ तो करना ही चाहिए। मेरा प्लेसमेंट लग गया।” उसने हँसते हुए कहा, “यहाँ पैकेज ठीक है, लेकिन काम बहुत है।”

रवि ने मुस्कराने की कोशिश की। “अच्छा है।”

लेकिन उसने उसे बैठने के लिए नहीं कहा। पता नहीं, याद नहीं रहा या एक डिलीवरी बॉय को बैठने के लिए कहना उचित नहीं समझा। उसे वहाँ रुकना अच्छा नहीं लग रहा था। उसने कहा – “ओटीपी बोल।”

कुछ पल की चुप्पी रही। फिर निखिल ने जैसे औपचारिकता पूरी की— “कभी मिल बैठते हैं आराम से। पुराने दिन याद करेंगे।”

“हाँ।”

रवि ने बैग उठाया। दरवाज़े तक पहुँचा ही था कि पीछे से निखिल की आवाज़ आई— “रुक… टिप दे देता हूँ।”

उसने ऐप खोला, स्क्रीन पर कुछ दबाया। “हो गया।”

दरवाज़ा बंद।

लिफ़्ट में उतरते समय मोबाइल कंपनाया— “Customer rated you 3 stars.”

रवि ने स्क्रीन को कुछ देर देखा। तीन सितारे। उसे याद आया—विश्वविद्यालय में उसके और निखिल के बीच कुल दो अंकों का अंतर था। उस दिन परिणाम की सूची में उसका नाम ऊपर था। उसी निखिल ने आज उसे दो अंक नीचे कर दिया था।

नीचे पार्किंग में आते-आते उसने हेलमेट पहन लिया। बाइक स्टार्ट की। सड़क पर निकलते ही शहर फिर सामान्य शोर में लौट आया—हॉर्न, धूप, ट्रैफ़िक।

मोबाइल में फिर नोटिफिकेशन चमका— “Improve your performance to earn incentives.”

उसने एक क्षण को सोचा—क्या प्रदर्शन सचमुच कम था, या बस समय बदल गया था?

सिग्नल हरा हुआ। उसने एक्सीलेरेटर घुमाया। कंधे पर दबाव थोड़ा और साफ़ महसूस हुआ, जैसे एक वज़न अभी-अभी और भारी हो गया हो।

शाम ढल रही थी जब ऐप ने अगला पता दिखाया— सी–302। ‘एक्सेप्ट’ का बटन दबाते हुए रवि की उँगली ठिठक गई। एक बार मन हुआ कि वह ‘एक्सेप्ट’ बटन न दबाये। उसका जी घबरा गया। अपनी इस पहचान के साथ वह उस पते पर पहुँचना नहीं चाहता था। फिर उसे लगा कि जब वह इस पेशे में है तो न जाने कितने ऐसे पहचाने हुए पते मिलेंगे। किस-किस से वह छिपता फिरेगा। यह पता तो पहचाना हुआ है। अनजाने भी तो कितने जाने हुए लोग मिल जाते हैं। निखिल तो इसी तरह मिला था। उससे अपने को वह कहाँ छिपा पाया? —– उसने ‘एक्सेप्ट’ बटन दबा दिया।

गेट पर गार्ड ने पूछा – “किसके यहाँ?”

“शर्मा सर।”

गार्ड ने बिना देखे रजिस्टर आगे बढ़ा दिया। जैसे यह नाम अपने आप में पर्याप्त हो।

लिफ़्ट ऊपर चढ़ती रही। हर मंज़िल पर लगी पीतल की पट्टियों पर नाम चमक रहे थे—डॉक्टर, एडवोकेट, प्रोफेसर।
उसे याद आया, प्रोफेसर शर्मा उसे कितना प्रोत्साहित करते थे। उसे ग़रीब जानकर कई बार सहायता भी की थी। उन्हें बहुत उम्मीद थी रवि से। तभी प्रोफेसर शर्मा का फ्लोर आ गया।

डोरबेल बजी। दरवाज़ा खुला। सामने वही चेहरा—थोड़ा और सफ़ेद, थोड़ा और भरा हुआ।

“जी?”

एक सेकंड की अनपहचान। फिर आँखों में हल्की चमक— “अरे… रवि?”

“जी, सर।”

“अंदर आओ… नहीं, मतलब… खाना दो।”

रवि ने बैग उतारा। पैकेट आगे बढ़ाया।

भीतर ड्रॉइंग रूम में किताबों की अलमारी थी। वही मोटी किताबें – राजनीतिक सिद्धांत, सामाजिक न्याय, आधुनिक भारत। दीवार पर विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह की तस्वीर टंगी थी। उसमें रवि भी था – दूसरी कतार में, मुस्कुराता हुआ।

“तुम क्या कर रहे हो आजकल?” प्रोफेसर ने जैसे औपचारिकता से पूछा।

“बस सर… तैयारी।”

“किसकी?”

“प्रतियोगिता की… कुछ परीक्षाएँ दी हैं। रिजल्ट अभी नहीं आया है। कुछ और फॉर्म भी भरे हैं।”

“अच्छा… अच्छा…” उन्होंने सिर हिलाया। “देखो, धैर्य रखना पड़ता है। आजकल प्रतियोगिता बहुत है। हम लोगों के समय अलग था।”

रवि चुप रहा। क्या कहता? उसके मन में आया कि कहे – सर, जिस ‘धैर्य’ की बात आप कह रहे हैं, उसका छोर ही लापता है। तीन साल पहले दी गई परीक्षा के रिजल्ट का वह धैर्य से ही राह देख रहा था। लेकिन जीवन की वास्तविकतायें टकरा-टकरा कर धैर्य के बाँध को तोड़ देती हैं। शायद, सिस्टम के भीतर का आदमी आदमियत की इस बात को नहीं समझ सकता है। —- उसने सोचा, मगर बोला नहीं। कल तक, जब वह विश्वविद्यालय में था, बोलता था, बहस करता था। अब उसका पेशा बदल चुका है। यह पेशा केवल सुनने की और आदेश का पालन करने की इजाजत देता है, बोलना और बहस करना उसके पेशे की अयोग्यता है। उसने सोचा कि कैसे कल तक की उसकी योग्यता अब अयोग्यता करार दी गई है। उसने सोचा बहुत, मगर बोला केवल ‘जी’। 

भीतर से आवाज़ आई— “खाना ठंडा हो रहा है।”

“सर…” वह कुछ कहना चाहता था। शायद पूछना चाहता था कि “क्या विभाग में मेरे लिए कोई जगह है?” पर शब्द गले में ही अटक गए। पूछने का साहस ही बटोर रहा था कि  प्रोफेसर ने जल्दी से पर्स निकाला। नोट टटोले। बीस रुपये का एक मुड़ा हुआ नोट उसकी ओर बढ़ाया। “रखो… और हाँ, कभी विभाग आओ। मिलेंगे।” रवि ने नोट तो ले लिया। लेकिन लेते समय उसके जो हाथ काँपे थे और उँगलियाँ ठंडी पड़ गई थीं, यह प्रोफेसर को पता भी नहीं चला। उसी समय मोबाइल पर नोटिफिकेशन कौंधा – “Delivery time exceeded.” और वह प्रणाम करके नीचे उतर गया। दरवाज़ा से निकलते ही वह बंद हो गया। 

कमरे से बाहर निकलकर उसने यकीन करने की कोशिश की कि अब वह विश्वविद्यालय का प्रतिभाशाली छात्र नहीं, महज एक डिलीवरी बॉय है। लिफ़्ट में उतरते समय उसने स्टील की चमकती दीवार में अपनी छवि देखी। देह पर लाल टीशर्ट और पीठ पर लाल बैग। बैग में प्लास्टिक की फाइल अब भी थी, मगर भीतर थी। मोबाइल पर फिर नोटिफिकेशन चमका – “Keep your rating above 4.5 to stay active.” कुछ देर वह नोटिफिकेशन को देखता रहा। उसे समझ आया, अब नोटिफिकेशन ही उसकी पढ़ाई है और उसका पालन करना ही उसकी काबिलियत है। वह केवल एक डिलीवरी आईडी नंबर है। बाइक स्टार्ट करते हुए उसने कंधा बदला। दबाव पहले से थोड़ा गहरा था। और इस बार उसे साफ़ महसूस हुआ – दो वज़नों के बीच अब तीसरा भी जुड़ गया है, चुप्पी का।

कॉलोनी से बाहर निकलते ही हवा में नमी बढ़ गई। जिस समय दूर कहीं बिजली चमकी, उसी समय मोबाइल पर नया नोटिफिकेशन भी आया – हिदायत का नहीं, ऑर्डर का। दूरी ज़्यादा, समय कम। नीचे लाल पट्टी चमक रही थी – “Complete 10 deliveries to earn extra reward.”

रवि ने एक क्षण को सोचा—घर चला जाए। फिर माँ का चेहरा याद आया। दवाइयों की पर्ची याद आई। उसने “Accept” दबा दिया।

पहली बूँद हेलमेट के शीशे पर गिरी। फिर दूसरी। कुछ ही मिनटों में बारिश तेज़ हो गई। सड़क पर जमे धूल की गंध उठी, फिर कीचड़ में बदल गई। हेडलाइटें धुँधली रोशनी में तैरती दिखने लगीं।

मोबाइल स्क्रीन पर टाइमर घट रहा था। 18:42… 18:41…

उसने गति बढ़ाई।

मोबाइल पर फिर नोटिफिकेशन कंपनाया— “You are taking longer than usual.”

उसने होंठ भींच लिए। हेलमेट के भीतर साँस भारी हो रही थी। बारिश शीशे पर चिपककर दृश्य को धुँधला कर रही थी।

एक मोड़ पर सड़क थोड़ी ढलान पर जाती थी। वहाँ पानी जमा था। सामने से आती कार की तेज़ रोशनी ने पल भर को आँखें चौंधिया दीं। उसने ब्रेक दबाया। बाइक फिसली। सब कुछ बहुत जल्दी हुआ। पहले टायर का नियंत्रण छूटा। फिर हैंडल काँपा। फिर शरीर हवा में हल्का-सा उठा और सड़क से टकराया। हेलमेट दूर जा गिरा। बैग कंधे से फिसलकर पानी में पड़ा था। कुछ सेकंड तक सिर्फ़ बारिश की आवाज़ थी।

फिर शोर – “अरे संभालो!” “उठाओ… उठाओ…” लेकिन कोई उसे उठाने नहीं आया। बारिश में भींगकर कौन उसकी मदद करने आता भला! बगल से गुजरती गाड़ियाँ उसी तरह गुज़रती रहीं, जैसे उसके गिरने के पहले गुज़र रही थीं।

रवि की आँखें आधी खुलीं। आसमान धुँधला था। स्ट्रीट लाइट की रोशनी पानी में टूट रही थी। उसे कंधे में तेज़ दर्द महसूस हुआ। उसकी नज़र बैग पर गई। लाल रंग पानी में भीगकर गहरा हो गया था। ज़िप आधी खुली थी। अंदर से प्लास्टिक की फ़ाइल का किनारा दिख रहा था। मोबाइल पास ही पड़ा था। स्क्रीन टूटी हुई, पर जल रही थी। “You have been inactive for 12 minutes.”

बारिश अब भी जारी थी। पानी फ़ाइल तक पहुँच रहा था। प्लास्टिक पारदर्शी था – भीतर की डिग्री साफ़ दिख रही थी। नीली स्याही फैल रही थी, किनारे गीले हो रहे थे। रवि ने हाथ बढ़ाने की कोशिश की। उँगलियाँ फिसल गईं।

उसे अचानक प्रोफेसर की आवाज़ याद आई- “प्रतिभा को जगह मिलती है।” फिर निखिल का चेहरा- “कुछ न कुछ तो करना ही चाहिए।” फिर माँ- “नौकरी मिलते ही छोड़ देगा न!”

मोबाइल फिर चमका। “Order will be reassigned if not picked up.”

उसने उठने की कोशिश की तो दर्द से कराह उठा। दाहिना हाथ उठ नहीं रहा था। कंधे में तेज दर्द था। किसी तरह बाएँ हाथ से उसने बैग उठाया। बैग में भरा पानी धारा की तरह नीचे गिरने लगा। केवल खाना ही नहीं, फाइल में रखे उसके सर्टिफिकेट भी भींगकर बर्बाद हो गए थे। बैग उलटकर उसमें भरा पानी उसने निकाला और सर्टिफिकेट वाली फाइल को जल्दी से उसी लथपथ बैग के अंदर किया, जैसे वर्षा से कहीं वह ख़राब न हो जाये। खाने के पैकेट को लेकर कहीं नहीं जा सकता था – न जहाँ पहुँचाना था, वहाँ और न ही जहाँ से लिया था, वहाँ। उसे वहीं गिरा दिया। आख़िर में उसने मोबाइल उठाया। उसका स्क्रीन टूट गया था। उसी टूटे हुए स्क्रीन पर नोटिफिकेशन चमक रहा था – “Your rating has dropped below 4. Continued performance issues may lead to suspension.”

रवि ने धुँधली आँखों से उसे देखा। उसे लगा, जैसे कोई अदृश्य उँगली उसके जीवन पर भी यही वाक्य लिख रही हो। उसने बैग को हल्का-सा दबाया। भीतर भीगी हुई डिग्री उसकी छाती से लग रही थी – ठंडी, गीली और निस्पंद।

दाँतों को आपस में भींचकर दर्द को दबाने की कोशिश करते हुए जब वह घर पहुँचा तो माँ ने दरवाजा खोला। पहले तो उसे आपादमस्तक भींगा हुआ देखकर और फिर दुर्घटना को जानकर वह स्तब्ध रह गयी थोड़ी देर। फिर जल्दी-जल्दी सूखे कपड़े लाकर दिए, तौलिए से सिर को पोंछा, गर्म पानी से कंधे को सेंका और उस पर मरहम लगाया। रवि ने खाना नहीं खाया। खाया ही नहीं गया। कंधे के दर्द के लिए एक गोली ली। मगर सभी दर्दों की गोलियाँ नहीं होती है। कंधे के दर्द से ज़्यादा ‘अब क्या होगा?’ की चिंता उसे खाये जा रही थी। 

सुबह जब नींद खुली तो माँ पैताने में बैठी हुई थी। माँ की आँखों को देखकर उसे लगा कि वह रात में सोयी नहीं है। वह हल्के से मुस्कुराया। माँ ने पूछा – “दर्द कैसा है?’ 

उसने बायें हाथ से कंधे को दबाकर देखा। सूजन ज़्यादा थी, लेकिन दर्द कम था। माँ मानो यही सुनने के लिए रात भर  प्रतीक्षा कर रही थी। उठाकर चाय बनाने चली गई, जिसकी तैयारी वह उसके जगने के पहले करके रखे हुए थी। केवल उसे खौलाना बाक़ी था।

माँ के चाय बनाने के लिए जाने के बाद उसने उठने की कोशिश की। दर्द कुछ बढ़ा। फिर भी उठकर वह मेज़ के पास बैठ गया। रात भर में कागज सूख गए थे। उसने डिग्रियों को उँगलियों से सहलाया फिर से फ़ाइल में रखा। लेकिन इस बार बैग में नहीं, अलमारी में। अलमारी का दरवाज़ा बंद करते समय चरचराहट की आवाज हुई, मानो वह डिग्रिओं को बंद किए जाने का विरोध कर रही हो। मेज पर ही पड़े मोबाइल को उठाकर देखा। स्क्रीन पर नोटिफिकेशन था – “Your account is under review and currently suspended.” कुछ सेकंड तक वह उसे देखता रहा। फिर मोबाइल को उलटकर मेज़ पर रख दिया।

माँ चाय को मेज़ पर रखकर बगल में बैठ गयी। वह रवि की चिंता और दर्द को महसूस कर सकती थी। उसने उसके सिर को प्यार से सहलाया और कहा – “चिंता मत कर। सब ठीक हो जाएगा।”

रवि ने माँ की ओर देखा। उस वाक्य में केवल प्यार नहीं, विश्वास भी था – एक माँ का अपने बेटे के प्रति। इस घर में वह ‘डिलीवरी बॉय’ नहीं था। यहाँ वह सिर्फ़ बेटा था। माँ न तो कस्टमर थी और न ही बॉस। बस माँ थी। उसने हल्के से माँ के कंधे से अपना सिर टिका लिया। उसे लगा कि एक अरसे के बाद वह ठहरा है बिना बोझ उठाए। कंधे में दर्द है, मगर बोझ नहीं है, जो बोझ वह लगातार ढोये जा रहा था। इस समय न तो कंपनी की हिदायत उसे डरा रही थी और न ही नोटिफिकेशन उसे दौड़ा रहा था।

जन पत्रकारिता को समर्थन देने के लिए उपर्युक्त QR Code को स्कैन करके 20, 50 या 100 रुपये की सहायता राशि प्रदान कर सकते हैं।
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कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।

Dr. Anil Kumar Roy
Dr. Anil Kumar Roy

कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।

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