बाजार में लुटेरे व्यापारियों ने हल्ला किया कि प्याज की कीमत सौ रुपए किलो हो गई है। जबकि प्याज की वास्तविक कीमत पच्चीस रुपए किलो थी। ग्राहक परेशान। वे सरकार के पास पहुँचे। हल्ला गुल्ला किया। सरकार ने आश्वासन दिया कि लुटेरे व्यापारियों पर कार्रवाई की जायेगी। सरकार ने रात के अंधेरे में लुटेरे व्यापारियों से समझौता किया। दोनों में लेन-देन हुई। प्याज की कीमत पचास रुपए किलो कर दी गई। सरकार ने अपनी पीठ थपथपाई। ग्राहक के सामने अपनी अकड़ दिखाई और कहा कि देखे, मैंने लुटेरे व्यापारियों को सीधा कर दिया। ग्राहक सब-कुछ समझ रहा है, लेकिन मसोसकर रह जाता है। पच्चीस रुपए का प्याज पचास रुपए में मिल रहा है। उसकी जेब पतली हो रही है, लेकिन समझ में नहीं आ रहा कि वह क्या करे?
सरकार और अमेरिका की डील कुछ ऐसी ही है। पहले ट्रंप भारत को धमकाता है कि कच्चा तेल हमसे खरीदो, वरना तुम्हारे सामान पर पच्चीस प्रतिशत टैरिफ लगायेंगे और नहीं माने तो तुम्हें दंडित करेंगे और टैरिफ पचास प्रतिशत करेंगे। एक अरब चालीस करोड़ का प्रधानमंत्री चुप, वाणिज्य मंत्री चुप और विदेश मंत्री मुँह चुराते रहे। छप्पन इंच का कलेजा कबूतर का हो गया। उस पर खासमखास मित्र और उनके फिनांसर अडानी पर केस और ऊपर से एपस्टीन फाइल। अचानक एक दिन अमेरिका ने खबर दी कि भारत से डील हो गई। अब हमारा सामान भारतीय बाजार में बिना टैरिफ के पहुँचेगा और भारत के सामान पर अट्ठारह प्रतिशत टैरिफ लगेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आ गये चुनावी मंच पर और गरजने लगे – झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए। पू्र्व के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने महज 2.93 प्रतिशत टैरिफ पर जो डील किया था, वह अट्ठारह प्रतिशत हो गया। गजब, बेशर्म है सरकार और बेशर्म हैं उनके समर्थक।
पंगुपना खानदानी होता है। अंग्रेजों से माफी माँगते-माँगते, अब बदतमीज ट्रंप के सामने गिड़गिड़ा रहे हैं। इस डील से सर्वाधिक हानि किसानों को होगी। अमेरिका अपने किसानों को अभूतपूर्व सब्सिडी देता है और भारतीय किसानों की हालत किसी से छुपी नहीं है। अब भारतीय बाजार में अमेरिका के ताजे फल, प्रोसेस्ड फूड, बादाम, अखरोट, सोया आयल धड़ल्ले से बिकेगा।
भारत के वाणिज्य मंत्री की हालत देखिए। जब उनसे पूछा गया कि क्या भारत रूस से तेल नहीं खरीदेगा, तब उनका जवाब था कि विदेश मंत्री ज़वाब देंगे। जब यही सवाल विदेश मंत्री जयशंकर से पूछा गया, तो उनका जवाब था कि इस प्रश्न का उत्तर वाणिज्य मंत्री देंगे। ये लोग देश चला रहे हैं!
अमेरिका छाती ठोक कर कह रहा है कि भारत रूस से तेल नहीं खरीदेगा। भारत की नीतियों की घोषणा अमेरिका कर रहा है। क्या भारत अमेरिका का बंधक नहीं हो गया है? एक स्वाभिमानी देश या समाज या व्यक्ति जान दे देगा, लेकिन स्वाभिमान नहीं बेचेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को अमेरिका के हाथों बेच दिया है। पाकिस्तान-भारत के बीच हुए युद्ध को बंद करवाने से लेकर रूस से कच्चा तेल नहीं खरीदने की घोषणा ट्रंप कर रहा है। मजा यह है कि जो डील राष्ट्रीय शर्म का विषय है, उसे राष्ट्रीय गौरव की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है।
दरअसल आज भारत की अपनी कोई विदेश नीति नहीं है। घर में कोसने के लिए नेहरू हैं, गलियाने के लिए कांग्रेस है और राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए हिन्दू-मुसलमान है। घर से बाहर मौज-मस्ती है, गिड़गिड़ाना है। भारत सरकार की इतनी लुंज-पुंज हालत देश को शर्मसार कर रही है। मनमोहन सिंह की छाती तो छप्पन इंच की नहीं थी, लेकिन उनकी छाती में स्वाभिमान और देशभक्ति की भावनायें बहती थीं। यहाँ तो सुनार की भाथी की तरह कलेजा है, भाँय-भाँय करता है।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







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