इन दिनों, जन पत्रकारिताइन दिनों : एक बार, जाल फेंक रे मछेरे"हर क्षण हम थोड़ा-थोड़ा जीते और मरते जाते हैं। जो चीज़ें छूट जाती हैं, वे मर ही तो जाती हैं। अपने अंदर मृत्यु हर वक़्त नाचती रहती है।" - इसी आलेख से डॉ योगेन्द्रApril 16, 20264 Comments
इन दिनों, जन पत्रकारिताइन दिनों : जड़ों को याद करने या भूलने का मतलब क्या है?"जड़ों से उखड़े हुए लोग आदतन प्रेम, सद्भाव और सहकार से वंचित होते जाते हैं। माँ की गोदी, पिता से मिले व्यवहार, आस-पड़ोस के संबंधों की ख़ुशबू से अगर उखड़ गए तो फिर वे कहीं टिकते नहीं।" - इसी आलेख से डॉ योगेन्द्रMarch 25, 20264 Comments