पहले गाँव छूटा। गाँव ही नहीं, गाँव की भाषा छूटी, लोग-बाग सगे-संबंधी, दोस्त-दुश्मन सब छूटे। गाँव की भाषा न पूरी तरह अंगिका है, न मगही। पहले इसी भाषा में सोचता था, हिंदी परायी-सी थी। कब गाँव की भाषा को विस्थापित कर हिन्दी ने कब उस पर क़ब्ज़ा जमा लिया, पता ही नहीं चला। अब हिन्दी में सोचना, लिखना, पढ़ना। वे ताड़-खजूर के पेड़, आम-बैर, पीपल-बरगद, नदी-नाले। गलियाँ, गुल्ली, सेल-कबड्डी, दोलपत्ता। भों-भों करता भोमा एक्सप्रेस, होली-दिवाली, गाँव के शब्द, घटनाएँ और चिह्न- सब विस्मृत होते गये।
फिर आया शहर। बहाना बना पढ़ाई। उस वक़्त पढ़ाई से ज़्यादा गाँव छोड़ने की ख़ुशी थी, लेकिन महीना भी नहीं बीता होगा कि रात को तकिए भींगने लगे। यह मेरा खुद का चुना हुआ दुख था, जिसे झेलना था। झेलते, हँसते-हँसाते, रोते-गाते सफ़र जारी रहा। ज़िंदगी के पचास वर्ष। शहर में शादी, नौकरी, संतान और फिर घर। जब आया था तो सड़कों पर सिर्फ़ टमटम, साइकिल और रिक्शे थे और अब छूटेगा तो क्या नहीं है! कारों, मोटरसाइकिलों और आबादी से भरा शहर।
पचास वर्ष में मैंने सबसे महत्वपूर्ण शख़्सियत खोयी- मेरे शिक्षक राधाकृष्ण सहाय और उनकी पत्नी मालती सहाय। मैं उन्हें भूल जाता, लेकिन वे दो-तीन दिनों में फ़ोन ज़रूर करते।कहानीकार शिव कुमार शिव कोरोना में हमसे बिछड़ गये। साथियों ने तो पहले ही शहर छोड़ दिया था। ज़्यादातर परदेशी हो गए। उनमें भी कइयों ने अज्ञात दिशा की राह पकड़ ली। ऐसे वक़्त में मुश्किल यह होती है कि आप जो समय या संग-साथ जी लेते हैं, उन्हें भी याद करें तो याद नहीं आता।
मुझे पता नहीं क्यों बुद्धिनाथ मिश्र का एक गीत और अज्ञेय की एक कविता याद आ रही है । बुद्धिनाथ मिश्र ने गीत लिखा – जाल फेंक रे मछेरे। उसकी दो पंक्तियाँ हैं- ‘एक बार और जाल फेंक रे मछेरे / जाने किस मछली में बंधन की चाह हो।’ मछली के लिए जाल मौत की पुकार है। फिर जाल में बँधने की चाह, क्यों? उत्तर शायद अज्ञेय की कविता ‘सोन मछरी’ देती है-
हम निहारते रूप, काँच के पीछे हाँप रही है मछली। रूप-तृषा भी (और काँच के पीछे) है जिजीविषा।
जाल, संसार-रूप का बंधन और जिजीविषा। गांधीवादी अमरनाथ भाई को देखने गया था । उन्हें देखकर मन उदास हो उठा। 92-93 वर्ष की उम्र, जांघ की हड्डी का टूटना, असहनीय पीड़ा, कराहते हुए। संसार-जाल में क़ैद रहे। मछेरे ने बार-बार जाल फेंका। बंधन की चाह में बँधे भी। जिजीविषा ने उन्हें बार-बार मुक्त किया। इस उम्र में भी भटकते रहे। सेवा में कोई कमी नहीं है, लेकिन मजबूरियों ने घेर लिया है। असहनीय पीड़ा में अकेला। कोई क्या करे!
मैंने अपने पिता को इसी रूप में देखा है। उनकी भी जांघ की हड्डी टूट गई थी। दिन-महीने साल गुज़रते जायेंगे / हम प्यार में जीते प्यार में मरते जायेंगे। वैसे भी हर क्षण हम थोड़ा-थोड़ा जीते और मरते जाते हैं। जो चीज़ें छूट जाती हैं, वे मर ही तो जाती हैं। अपने अंदर मृत्यु हर वक़्त नाचती रहती है। उसी तरह जीवन भी। कोई भी शहर या गाँव हो, जहाँ जीते हैं और फिर वहाँ से उखड़ जाते हैं तो एक आँधी-सी उठती है। अमरनाथ भाई ने बहुत दिन इस शहर में नहीं बिताये। अंतिम दस्तक इस शहर में दी। लंबी यात्रा का कारुणिक अंत। संभव है कि उनकी रूप-तृषा और जिजीविषा पुकार उठे और फिर एक यात्रा पर निकल पड़ें।
संभावनाओं में ढाढ़स है और मृत्यु को चुनौती भी। वैसे सच यही है कि वरण करो दोनों को- मृत्यु को भी, जीवन को भी।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







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