इन दिनों, जन पत्रकारिताइन दिनों : एक बार, जाल फेंक रे मछेरे"हर क्षण हम थोड़ा-थोड़ा जीते और मरते जाते हैं। जो चीज़ें छूट जाती हैं, वे मर ही तो जाती हैं। अपने अंदर मृत्यु हर वक़्त नाचती रहती है।" - इसी आलेख से डॉ योगेन्द्रApril 16, 20264 Comments