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इन दिनों : बरसे कंबल, भीजे पानी

"जिस देश की अस्सी फीसदी जनता को खाने के पाँच किलो अनाज सरकार दे रही है ।‌ दो सौ लाख करोड़ रुपए देश पर विदेशी कर्ज है। डालर की तुलना में रुपये की कीमत धड़ाधड़ गिर रही है। पेट्रोल से लेकर बाजारू सामान की कीमत पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। वहाँ प्रधानमंत्री की रैलियों पर इतना खर्चा क्या बताता है?" - इसी लेख से

इन दिनों : पिघलते रुपये का राजनैतिक हल गीता – कुरान पाठ

डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार गिरता जा रहा है। लेकिन प्रधानमंत्री चुप हैं। उनके मंत्रीगण अजब-ग़ज़ब जवाब दे रहे हैं। पहले जो लोग हर छोटी-बड़ी बात पर हाहाकार मचाते थे, वे भी आज चुप हैं। मीडिया मौन है। शोर है तो केवल मंदिर और मस्जिद बनने का। क्या कारण है इसका? पढ़िए इस आलेख में।

इन दिनों : प्रधानमंत्री का कट्टा प्रेम और बिहार का दुखड़ा

कल भागलपुर में पुराने साथियों की बैठक हुई। संदर्भ बिहार का चुनाव था। पुराने साथियों का जिक्र इसलिए किया, क्योंकि किसी का संबंध जेपी आंदोलन से था, किसी का झुग्गी झोपड़ी आंदोलन से तो किसी का गंगा मुक्ति आंदोलन से।…

संविधान पर चर्चा या कांग्रेस पर वार?

लोकसभा के शीतकालीन सत्र में संविधान के 75वें वर्ष के उपलक्ष्य में संविधान पर विशेष चर्चा आयोजित की गई थी। सत्तारूढ़ दल और उसके मुखिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सारी ऊर्जा, लोकतंत्र के सशक्तिकरण और संवैधानिक मूल्यों को व्यावहारिक जीवन में उतारने के दृष्टिकोण की प्रस्तुति की अपेक्षा कांग्रेस की निंदा करते हुए खर्च हो गई।