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इन दिनों : एलन मस्क, भीष्म और जूनियर ट्रंप

"डोनाल्ड ट्रम्प जूनियर और एलन मस्क की वैवाहिक कथा आधुनिक युग की है और शांतनु, विचित्रवीर्य, धृतराष्ट्र और पांडु की पुरातन। दोनों ही स्थितियों में स्त्रियों की दशा क्या है?" - पढ़िए इस आलेख में

बुलडोज़र न्याय बनाम संवैधानिक नैतिकता

"झोपड़ियाँ इसलिए नहीं उगतीं कि लोग क़ानून तोड़ने का आनंद लेते हैं, बल्कि इसलिए कि शहर रोज़गार तो देता है, रहने की जगह नहीं। गाँवों से मजबूरी में हुआ पलायन, असंगठित श्रम, न्यूनतम मज़दूरी और महँगा शहरी आवास—ये सब मिलकर झोपड़ी को अपराध नहीं, बल्कि विकल्पहीनता का परिणाम बना देते हैं।" - इसी आलेख से।

इन दिनों : महात्मा गांधी की दृष्टि में वकील और डॉक्टर

चिकित्सा और वकालत - दोनों ऐसे पेशे हैं, जहाँ पीड़ित और परेशान लोग ही पहुँचते हैं। परंतु दोनों ही जगहों पर उनकी पीड़ा और परेशानी का लाभ उठाया जाता है। इन पेशों में किसी के दुख का इस्तेमाल लाभ पाने के साधन के रूप में किया जाता है।

इन दिनों : पुनर्जागरण की जरूरत और पाखंडियों के स्वर

यह देश आज भी अस्त-व्यस्त, शंकालु और अरक्षित है। अनेक प्रयासों के बावजूद पुनर्जागरण के बदले प्रतिपुनर्जागरण हो रहा है। पढ़िए इस लेख में।

इन दिनों : तुलसीदास मस्जिद में क्यों सोना चाहते थे

"तुलसीदास बहुत तंग हुए बनारस में। उनके समय से लेकर अब तक कितने मंदिर बने। आश्चर्य यह है कि मंदिर बनाने के लिए मुस्लिम बादशाहों ने जमीन दी।‌ मगर एक बनावटी कथा में तुलसीदास के राम घिर गए। बाबरी मस्जिद में आधुनिक स्वार्थी राजनीतिक संतों ने राम को उलझा दिया।" - इसी आलेख से

इन दिनों : माथे पर मुरैठा और दिमाग में नफ़रत की नदी

आज डॉ० अम्बेडकर का परिनिर्वाण दिवस है और बाबरी मस्जिद को ढाहने का दिवस भी। अम्बेडकर परिनिर्वाण दिवस के दिन बाबरी मस्जिद को ढाहने वाले आज भी झुग्गी-झोपड़ियों को ढाहते चले जा रहे हैं।

इन दिनों : सैंया भए कोतवाल

सुबह सूरज ठीक से उगा नहीं। सूरज पर कटे-कटे बादल छाये रहे। ठंड के कारण खिड़कियां बंद रहती हैं, इसलिए चिड़िया के स्वर सुनाई नहीं पड़े। खिड़कियों में लगे शीशे के बाहर सबकुछ शांत लगता है। आम, नारियल और महुगनी…

इन दिनों : आँख के अंधे, नाम नयनसुख

कुछ संत महिलाओं पर लगातार अभद्र टिप्पणियाँ कर रहे हैं। इसके बावजूद उन्हें प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सत्ता का संरक्षण प्राप्त है। ये वही संत हैं, जो हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं। ऐसा हिंदू राष्ट्र, जिसमें महिलायें मानवीय इकाई नहीं, एंजॉयमेंट का उपकरण होंगी।

इन दिनों : धार्मिकता और कट्टरता

"सच्चाई यह है कि दाढ़ी बढ़ाने या भगवा पहन कर टीका ललाट पर लगाने से कोई धार्मिक नहीं हो जाता। मन धार्मिक होना चाहिए। यानी उसे मनुष्यता, करुणा और संवेदना में विश्वास होना चाहिए।" - इसी आलेख से

लैनी की आत्मकथा 

कहानी में कुछ ऐसा नहीं है, जो आकर्षित कर सके - न कथ्य, न शिल्प। लेकिन यह कुछ ऐसा है, जिसे बार-बार दुहराया गया है। इसीलिए बार-बार कहे जाने की जरूरत भी है। इसी जरूरत के कारण इसे फिर से कहा गया है। आप चाहें तो इसे फिर से पढ़ सकते हैं।