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इन दिनों : जाति वह दीमक है जो भारत की आत्मा को चाट रही है

"आजादी की लड़ाई में जाति थोड़ी दबी थी। एकजुटता का बोध बढ़ा था। आजादी के बाद की राजनीति ने जातियों को और गाढ़ा किया है और अब सिर पर नाच रहा है।" - इसी लेख से

इन दिनों : अंधेपन की मर्यादा से चकाचौंध आंखें

"जो खिलवाड़ कर रहा है, वह तो जानबूझकर कर रहा है। वह दोषी कम है, उससे ज्यादा दोषी वह है जो खुली आंखों से देख कर भी नहीं देख रहा है या डर से तालियां पीट रहा है।" - इसी आलेख से

जारी है स्त्री विमर्श की यात्रा

परिवार, शिक्षा प्रणाली, राज्य-कानून, धर्म, कलाएँ, मिडिया आदि ये सारी सामाजिक संस्थाएँ हमारे समाज में औरत बनाने का काम करती हैं- मादा को स्त्री बनाती हैं। सर्वजनीन है कि स्त्री पैदा नहीं होती, बनायी जाती है, मार-मार के बनाया जाता है उसको स्त्री। यही स्त्री की स्थिति तय करती है और नारी विमर्श में इसे अनदेखा कर दिया जाता है।