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बिहार की शिक्षा सामाजिक असमानता को पुनर्स्थापित कर रही है 

जिस राज्य में महज 22% लोग ही किसी तरह पाँचवीं कक्षा तक पहुँच सके हों, एक तिहाई लोगों ने कभी स्कूल-कॉलेज का मुँह नहीं देखा हो और 21% बच्चे दसवीं कक्षा की चौखट तक पहुँचने के पहले ही स्कूल से बाहर हो जाते हों, वह राज्य तो मध्यकाल के किसी पिछड़े हुए असभ्य समाज की तस्वीर पेश करता है। वहाँ के लिए स्वास्थ्य, रोजगार, समृद्धि आदि की बात ही बेमानी है। - इसी आलेख से

क्यों बन रही है स्कूल पर गुप्त छापेमारी की योजना?

सांकेतिक चित्र

धूल उड़ाती सन्न-सन्न भागती गाड़ियों का क़ाफ़िला। साहब के इशारे पर गाड़ी घुमाता ड्राइवर। टास्क से अनजान एक-दूसरे का मुँह ताकते ऑर्डर की प्रतीक्षा में बंदूक़ थामे पुलिसकर्मी।  तभी साहब की गाड़ी रुकती है। क़ाफ़िले की दूसरी गाड़ियाँ भी। पुलिसवाले कूदकर…

बीपीएससी पेपर लीक : भ्रष्ट एवं नाकाबिल प्रणाली की प्रताड़ना भुगतते छात्र

बिहार लोक सेवा आयोग की परीक्षा में पेपर लीक मामले के संदर्भ में डॉ० नीरज कुमार का यह आलेख आयोग की प्रणालीगत ख़ामियों को उजागर करता है। यदि ये ख़ामियाँ विद्यमान रहती हैं तो उसके नतीजे इसी प्रकार होते रहेंगे। आवश्यक रूप से पठनीय आलेख।

धार्मिक बयानों की कुहेलिका और राजनीतिक कर्तव्य

लोकतंत्र की अवधारणा इस तरह यह गढ़ी गयी है कि सत्ता और उसकी मशीनरी नागरिक हितों की पूर्ति के लिए होती हैं। परंतु व्यवहार में ऐसा नहीं होता है। राज्य के कर्मचारी सत्ता की इच्छाओं की पूर्ति के लिए होते हैं और सत्ता स्वयं पूँजीपतियों के के हितों के संरक्षण में लगी रहती है।