इन दिनों : नारों का डंका, आग में जले लंका

नारे हैं, नारों का क्या? नारों के झाँसे में देश देश संकट में फँसता गया, राष्ट्रीय संपत्तियाँ नीलाम होती गईं, मार्केट क्रैश कर गया, राष्ट्रीय संप्रभुता गिरवी पड़ती गई और अब तो पेमेंट तक का क्राइसिस खड़ा हो गया है।
