इन दिनों : नारों का डंका, आग में जले लंका

नारे हैं, नारों का क्या? नारों के झाँसे में देश देश संकट में फँसता गया, राष्ट्रीय संपत्तियाँ नीलाम होती गईं, मार्केट क्रैश कर गया, राष्ट्रीय संप्रभुता गिरवी पड़ती गई और अब तो पेमेंट तक का क्राइसिस खड़ा हो गया है।

नारे से सरकार बदलती है, देश नहीं। ‘अच्छे दिन आयेंगे‘ – यह नारा 2014 के लोकसभा चुनाव में धूम मचा रहा था। सरकार बदली और यह नारा ग़ायब हो गया। 2019 के चुनाव में नारे ने करवट ली। अब वह ‘मैं भी चौकीदार’ के रूप में सामने था। इस नारे का खूब डंका बजा। अब ये दोनों नारे कोई नहीं लगाता। न प्रधानमंत्री, न गृहमंत्री, न बीजेपी के कार्यकर्ता और नेता, न कोई युवा। उस वक्त युवाओं का पागलपन चरम पर था। वे नारे लगा रहे थे और ‘हर हर मोदी‘ कर रहे थे। बीच में अन्ना आये। ‘मैं भी अन्ना’ के नारे उछले। अन्ना जीवित हैं और वह एक कोने में बैठे हैं। उनके पीछे से आरएसएस और बीजेपी ने साज़िश रची थी। अब एक नया नारा गूँजने लगा है – ‘मैं हूँ कॉकरोच‘। युवाओं को कॉकरोच का दर्जा प्राप्त हो गया है और वे कॉकरोच का रूप धारण कर अपना असंतोष और ग़ुस्सा ज़ाहिर कर रहे हैं। कॉकरोच बन कर व्यवस्था बदलने के ख्वाब सजाने की तैयारी चल रही है।

विचार और संघर्ष के बिना सरकार बदल सकती है, व्यवस्था नहीं। युवाओं और देश के ग़ुस्से को साजिशकर्ता कैसे भंजाते हैं, इसके गवाह हम सब रहे हैं। युवाओं के असंतोष को कैस कर नरेंद्र मोदी सरकार में आये और उन्होंने युवाओं को नारों में उलझाये रखा। केंद्र सरकार के पास जो महकमे हैं, उनमें जो रिक्तियाँ हैं, उसे भी नहीं भरा गया और यह सरकार खुलेआम अड़ानी को देश लुटाती रही – चाहे ज़मीन हो, जंगल हो, पानी हो या देश के संसाधन हों।

न तो इतनी धृष्टता कभी नहीं देखी गई और न ही इतनी मजबूर सरकार से कभी पाला नहीं पड़ा। एक अरब चालीस करोड़ की आबादी वाले देश के प्रधानमंत्री अमेरिका के सामने गिड़गिड़ा कर रूस से तेल ख़रीदने का आदेश माँगे। क्या यह उदाहरण काफ़ी नहीं है यह समझने के लिए कि अच्छे दिन और विश्वगुरु का नारा लगाकर कितनी गिरावट आई है और उसने देश की संप्रभुता को किस तरह दाँव पर लगा दिया है। एक ऐसा आदमी जो अपनी शैक्षणिक डिग्री भी नहीं दिखा सकता, बल्कि इसे छुपाने के लिए नौ-नौ वर्ष मुक़दमा लड़ता रहा, उससे भी लोग उम्मीद करते रहे कि वह सब कुछ स्वच्छ, पारदर्शी और सम्मानजनक तरीक़े से होगा। फ़र्ज़ी डिग्री पर तो क्लर्क की नौकरी नहीं मिलती, बल्कि ऐसे लोगों के लिए सज़ा का प्रावधान है। ये लोग हर चुनाव में नारे बदलते रहे और नये-नये नारों के चक्कर में सरकारें बनती रहीं।

तेल और गैस का संकट, रुपये का गिरना, बैलेंस ऑफ पेमेन्ट क्राइसिस, महंगाई, मुद्रास्फीति, इन्वेस्टमेंट गिरावट, मार्किट क्रेश, बेरोजगारी, डिसरप्शन मुँह बाये खड़ा है और विदेश मंत्री ‘इंडिया फर्स्ट‘ का नारा लगा रहे हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने बयान दिया है कि भारत अगले 5 वर्षों में 500 अरब डॉलर (लगभग 47 हजार अरब रुपये) के अमेरिकी उत्पाद ख़रीदेगा। भारत की वाणिज्यिक नीतियों की घोषणा अमेरिका कर रहा है। अमेरिका पाकिस्तान-भारत युद्ध बंद करने की घोषणा कर रहा है। तेल-गैस ख़रीदने के लिए आदेश दे रहा है।

अब बचा क्या है? भारत फर्स्ट कह देने से भारत फर्स्ट नहीं हो जाता। उसके लिए चाल और चरित्र चाहिए। डालर के सामने रूपया लुंजपुंज हो गया है। लंबी-लंबी फेंक रहे थे और अब चुपाय मारे दुलहिन बने बैठे हैं। झारखंड में नारा बुलंद किया जा रहा है- सरना और सनातन एक है। सनातन इंसान और इंसान में विभेद करता है, सरना नहीं। सरना स्वशासन पर जीता है और आत्म स्वाभिमानी होता है। वह जान कुर्बान कर देता है, लेकिन अपनी बात से नहीं फिरता, लेकिन सनातनी को देखिए- बात पलटने में वह माहिर होता है और वह अपना क्या देश के स्वाभिमान को भी बेच देता है। वह महज नारे गढ़ सकता है। देश चलाना उसके बूते के बाहर है।

जन पत्रकारिता को समर्थन देने के लिए उपर्युक्त QR Code को स्कैन करके 20, 50 या 100 रुपये की सहायता राशि प्रदान कर सकते हैं।
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प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर

डॉ योगेन्द्र
डॉ योगेन्द्र

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू, ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर

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