छत्तीसगढ़ की धरती एक बार फिर नक्सली हिंसा से लहूलुहान हो गई है। बीजापुर जिले में नक्सलियों ने सोमवार को एक बार फिर कायरतापूर्ण हरकत करते हुए जिला रिजर्व गार्ड (डीआरजी) के वाहन को आईईडी विस्फोट से उड़ा दिया। इस घटना में 8 जवान और एक ड्राइवर शहीद हो गए। डीआरजी, जो स्थानीय आदिवासियों और आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों से बनी है, का निशाना बनना इस बात की ओर इशारा करता है कि नक्सली अब हताशा में अपने ही पूर्व साथियों और निर्दोष ग्रामीणों को भी नहीं बख्श रहे हैं। घटना की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि वाहन कई मीटर ऊपर उछल गया और जमीन में गहरा गड्ढा बन गया। घटना के बाद शहीद जवानों के परिवारों को सांत्वना देने और नक्सलवाद को समाप्त करने के दावे फिर से दोहराए गए। मुख्यमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री ने जवानों की शहादत को नमन करते हुए नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई जारी रखने का संकल्प व्यक्त किया।
नक्सलवाद : दावे और हकीकत
नक्सलवाद को समाप्त करने के दावों का सिलसिला दशकों से चला आ रहा है। चाहे 2010 में तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदंबरम का 2013 तक नक्सलवाद खत्म करने का दावा हो, 2018 में राजनाथ सिंह का 2021 तक नक्सलवाद खत्म करने का वादा हो, या फिर 2024 तक इसे जड़ से समाप्त करने का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संकल्प—ये सभी दावे कागजों पर ही सीमित रहे हैं। अब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मार्च 2026 तक नक्सलवाद समाप्त करने का लक्ष्य दोहराया है।
नक्सलवाद की जड़ें : विकास और शोषण
नक्सलवाद का अस्तित्व केवल बंदूक की नोक पर नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के जल, जंगल और जमीन से जुड़े शोषण और उनके विकास से कटे रहने के कारण है। 2011 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि विकास ही उग्रवाद को समाप्त करने का सबसे प्रभावी तरीका है। इस दिशा में छत्तीसगढ़ सरकार ने “नियाद नेल्लनार” जैसी योजनाएं लागू की हैं, जो स्थानीय भाषा में “आपका अच्छा गाँव” का संदेश देती हैं। इन योजनाओं के तहत सड़कों, बिजली, पानी, मोबाइल नेटवर्क और अन्य बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था की जा रही है।
आगे का रास्ता : संवाद और विश्वास
हालांकि सरकारी योजनाएं मुख्यधारा से कटे इलाकों तक पहुंच रही हैं, लेकिन नक्सलवाद खत्म नहीं हो रहा है। इसके पीछे बड़ी वजह है सरकार और नक्सल प्रभावित लोगों के बीच संवाद और विश्वास का अभाव। एक ओर नक्सली निर्दोष नागरिकों और सुरक्षाबलों को निशाना बनाकर हिंसा को जायज ठहराने की कोशिश करते हैं, तो दूसरी ओर सरकार के ऑपरेशन कभी-कभी निर्दोष ग्रामीणों को चपेट में ले लेते हैं। हजारों जानें और अरबों रुपये खर्च होने के बावजूद नक्सलवाद समाप्त नहीं हुआ है। स्थिति को सुधारने के लिए दोनों पक्षों के बीच निरंतर संवाद जरूरी है। इसके लिए राजनैतिक दलों को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर एकजुट होना होगा। शांति, विकास और विश्वास के साथ ही नक्सलवाद की समस्या का स्थायी समाधान संभव है। शहीदों का बलिदान तभी सार्थक होगा, जब हिंसा के इस चक्र को तोड़ने की ठोस और ईमानदार कोशिश की जाएगी।

शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना
रुपेश रॉय एक समर्पित शोधार्थी हैं जिनका राजनीतिक विज्ञान में किया गया कार्य शासन, नीति और सामाजिक न्याय के बीच के अन्तर्संबंधों का अन्वेषण करता है। उनका शोध समकालीन समाज के सामने आने वाली चुनौतियों को समझने और संबोधित करने की प्रतिबद्धता से निर्देशित है।







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