भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, किंतु आज यह गंभीर प्रश्न बार-बार उठ रहा है कि क्या यह वास्तव में जनता का लोकतंत्र रह गया है अथवा यह धन-बल संपन्न वर्ग का विशेषाधिकार बनता जा रहा है? कल्पना कीजिए एक ऐसा बाजार, जहाँ आप शेयर नहीं खरीदते, बल्कि भविष्य की नीतियाँ खरीदते हैं। जहाँ निवेश की राशि करोड़ों में होती है, और रिटर्न आता है सरकारी अनुबंधों, कर राहतों, पर्यावरणीय मंजूरियों या विनियामक ढील के रूप में। यह कोई काल्पनिक शेयर बाजार नहीं—यह भारत की राजनीतिक फंडिंग का वास्तविक चेहरा है। कॉर्पोरेट घराने राजनीतिक दलों को चंदा क्यों देते हैं? भावना से? वैचारिक समर्थन से? नहीं। वे इसे एक रणनीतिक निवेश मानते हैं, जहाँ जोखिम ऊँचा है, किंतु प्रतिफल और भी ऊँचा। एक आम आदमी सोचे—तो क्यों कोई कंपनी, जो अपना लाभ कमाने के लिए दिन-रात मेहनत करती है, अरबों रुपये किसी राजनीतिक दल को दे देगी? जवाब सरल है: क्योंकि यह निवेश उसे कई गुना वापस मिलता है। राजनीतिक दलों को प्राप्त होने वाला कॉरपोरेट चंदा अब इतनी विशाल राशि तक पहुँच चुका है कि यह मात्र “योगदान” नहीं, अपितु एक सुनियोजित निवेश प्रतीत होता है—जिसका प्रतिफल सरकारी अनुबंधों, नीतिगत छूटों तथा नियामक शिथिलता के रूप में प्राप्त होता है।
लोकतंत्र के संकट कभी-कभी स्पष्ट विद्रोह या संस्थागत टकराव के रूप में सामने आते हैं, किंतु अक्सर वे मौन और संरचनात्मक होते हैं—आँकड़ों की भाषा में छिपे, प्रक्रियाओं की आड़ में पनपते और कानूनी ढांचों के भीतर फलते-फूलते। भारत में राजनीतिक चंदे की वर्तमान व्यवस्था ऐसी ही एक मौन, पर गहन चुनौती प्रस्तुत करती है। चुनाव, जो लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव माने जाते हैं, आज वित्तीय असमानताओं के गहरे साए में आयोजित हो रहे हैं। प्रश्न अब केवल यह नहीं कि चंदा वैध है या अवैध, बल्कि यह कि धन का यह प्रवाह सत्ता की दिशा, नीति-निर्माण की प्राथमिकताओं और सार्वजनिक हित की व्याख्या को कितना प्रभावित कर रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने फरवरी 2024 में चुनावी बॉन्ड योजना को असंवैधानिक घोषित कर दिया, किंतु उसके पश्चात् इलेक्टोरल ट्रस्ट एक प्रमुख माध्यम के रूप में उभरे हैं। वित्तीय वर्ष 2024-25 में इन ट्रस्टों के माध्यम से राजनीतिक दलों को कुल 3,811 करोड़ रुपये का चंदा प्राप्त हुआ—यह पिछले वर्ष की तुलना में तीन गुना अधिक है। इनमें सर्वाधिक बड़ा ट्रस्ट प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट रहा, जिसने 2,668 करोड़ रुपये एकत्र किए। आश्चर्य की बात यह है कि इस राशि का 82 प्रतिशत से अधिक केवल एक ही राजनीतिक दल को प्राप्त हुआ।
सवाल सीधा है और असहज करने वाला भी— भारत का लोकतंत्र किसके लिए काम कर रहा है? उस आम नागरिक के लिए, जो टैक्स देता है, वोट देता है और नियम मानता है? या फिर उन कॉरपोरेट कंपनियों के लिए, जो राजनीतिक दलों को हज़ारों करोड़ रुपये का चंदा देकर नीतियों तक सीधी पहुँच बना लेती हैं? अगर जवाब दूसरा है, तो हमें ईमानदारी से स्वीकार करना होगा— लोकतंत्र खतरे में नहीं है, लोकतंत्र बिक रहा है। चंदा अब समर्थन नहीं, सत्ता में निवेश है राजनीतिक चंदे को लंबे समय तक “स्वैच्छिक योगदान” कहा जाता रहा। लेकिन आज के आँकड़े इस भ्रम को पूरी तरह तोड़ देते हैं। ये आँकड़े केवल संख्याएँ नहीं हैं; वे लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा की गहन असमानता को उजागर करते हैं। जिस दल के पास हजारों करोड़ का धन-संचय नेटवर्क हो, उसके समक्ष अन्य दल संसाधनों के लिए संघर्ष करते रहें तो चुनावी मुकाबला विचारों का कम तथा धन का अधिक हो जाता है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की हालिया रिपोर्ट से पता चलता है कि राष्ट्रीय दलों की कुल आय में 53 प्रतिशत राशि अज्ञात स्रोतों से आई, जबकि मात्र 11 प्रतिशत सदस्यता शुल्क तथा लघु योगदानों से संग्रहीत की गई। ज्ञात स्रोतों से प्राप्त आय का प्रमुख भाग भी कॉरपोरेट चंदा ही था।
चंदा प्रदान करने वाली कंपनियों की सूची देखें—मेघा इंजीनियरिंग, वेदांता, टाटा, महिंद्रा, ओपी जिंदल, एलएंडटी आदि। ये सभी कंपनियाँ उन क्षेत्रों में सक्रिय हैं जहाँ सरकारी अनुबंध सबसे विशाल होते हैं : आधारभूत संरचना, खनन, ऊर्जा, इस्पात, राजमार्ग तथा विद्युत परियोजनाएँ। इन क्षेत्रों में पर्यावरणीय अनुमति, नियामक शिथिलता अथवा नीतिगत परिवर्तन से अरबों का लाभ संभव है। “सीधा प्रमाण नहीं है” वाला तर्क प्रस्तुत किया जाता है, किंतु व्यावसायिक तर्क स्पष्ट है—कोई कंपनी भावनात्मक अथवा वैचारिक समर्थन से अरबों का चंदा नहीं देती; वह इसे न्यूनतम जोखिम वाला, उच्च प्रतिफल वाला निवेश मानती है।
यह व्यवस्था केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रहती; इसका प्रभाव साधारण नागरिक पर भी पड़ता है। जब अनुबंध सीमित कंपनियों को मिलते हैं, प्रतिस्पर्धा क्षीण होती है और मूल्य बढ़ जाते हैं। जब पर्यावरणीय नियमों में शिथिलता दी जाती है, उसकी कीमत प्रदूषण तथा स्वास्थ्य संकट के रूप में जनता चुकाती है। जब नीतियाँ चुनिंदा हितों के अनुकूल बनाई जाती हैं, तब करदाता का धन उन परियोजनाओं में व्यय होता है जिनसे लाभ कुछ ही हाथों तक पहुँचता है।
राजनीतिक निधि-संग्रह में पारदर्शिता बढ़ाने के नाम पर पिछले कुछ वर्षों में कई परिवर्तन किए गए—कंपनियों को असीमित चंदा देने की छूट, विदेशी चंदे की अनुमति तथा नकद चंदे की सीमा को 20,000 से घटाकर 2,000 रुपये करना। किंतु ये उपाय अपर्याप्त सिद्ध हुए हैं, क्योंकि अज्ञात तथा कॉरपोरेट स्रोतों से आने वाली राशि निरंतर वृद्धि कर रही है।
लोकतंत्र की आधारशिला समान अवसर तथा जनता की आवाज पर टिकी है। जब धन की शक्ति मत की शक्ति से बड़ी हो जाए, तब लोकतंत्र केवल एक औपचारिक प्रक्रिया रह जाता है। प्रश्न यह नहीं है कि कोई एक दल लाभान्वित हो रहा है; प्रश्न यह है कि समग्र व्यवस्था धन-प्रभावित हो रही है अथवा नहीं। यदि हम इस प्रवृत्ति को नहीं रोका, तो आगामी वर्षों में चुनाव और भी महँगे होंगे, राजनीति और भी संकुचित होगी तथा नीतियाँ कुछ चुनिंदा हाथों में सिमट जाएँगी।
यह समय है कि हम मौन तोड़ें और कठोर पारदर्शिता, चंदे की ऊपरी सीमा तथा सार्वजनिक निधि-संग्रह जैसे सुधारों की माँग करें। क्या लोकतंत्र अब अमीरों का क्लब है? ईमानदारी से पूछिए—क्या आज का लोकतंत्र हर नागरिक को बराबर आवाज़ देता है? या फिर यह एक ऐसा क्लब बनता जा रहा है जहाँ— प्रवेश टिकट करोड़ों में है और आम आदमी सिर्फ़ बाहर खड़ा दर्शक है? अगर यही हाल रहा, तो आने वाले सालों में— चुनाव और महँगे होंगे, राजनीति और बंद होगी और नीति कुछ चुनिंदा हाथों में सिमट जाएगी। यह लोकतंत्र नहीं, कॉरपोरेट-प्रायोजित सत्ता होगी। अंतिम सवाल: चुप्पी या बदलाव? यह विचार किसी पार्टी के खिलाफ नहीं है। यह चेतावनी है— पूरी व्यवस्था के लिए। लोकतंत्र केवल वोट डालने का नाम नहीं। लोकतंत्र भरोसे का नाम है— कि सत्ता जनता के लिए काम कर रही है। जब धन की ताकत मत की ताकत से बड़ी हो जाए, तो लोकतंत्र सिर्फ़ दिखावा रह जाता है।
सवाल साफ है— क्या हम इस खेल के दर्शक बने रहेंगे? या इस ‘लोकतंत्र के कैसीनो’ के नियम बदलने की माँग करेंगे? क्योंकि इस बार दांव सिर्फ़ सत्ता पर नहीं— आपके भविष्य पर लगा है। लोकतंत्र केवल मतदान का नाम नहीं—यह विश्वास है कि सत्ता जनता के लिए कार्य कर रही है। इस विश्वास की रक्षा अब हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। क्या हम इस चुनौती को स्वीकार करेंगे, अथवा इसे अनदेखा कर लोकतंत्र को क्रमशः खोखला होने देंगे?

शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना
रुपेश रॉय एक समर्पित शोधार्थी हैं जिनका राजनीतिक विज्ञान में किया गया कार्य शासन, नीति और सामाजिक न्याय के बीच के अन्तर्संबंधों का अन्वेषण करता है। उनका शोध समकालीन समाज के सामने आने वाली चुनौतियों को समझने और संबोधित करने की प्रतिबद्धता से निर्देशित है।







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