हाल ही में प्रकाशित CEOWORLD Magazine और World Population Review की रिपोर्ट को देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि वर्ष 2024-25 में दुनिया में पढ़नेवाले देशों में भारत, अमेरिका से मामूली अंतर रखते हुए, दूसरे नंबर पर है। इसका मतलब है दुनिया में सबसे ज़्यादा लोग अमेरिका में पढ़ते हैं और उसके बाद भारत में ही। CEOWORLD का दावा है कि दुनिया के 102 देशों के 65 लाख लोगों से बात करके यह रिपोर्ट तैयार की गयी है। कतिपय सूचकांकों में अत्यंत पिछड़ापन के बीच यह सूचना कई लोगों के लिए संतोषजनक हो सकती है।
इस रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में लोग प्रतिवर्ष औसतन 17 किताबें पढ़ते हैं। भारत में उससे केवल एक किताब कम 16 किताबें पढ़ी जाती हैं। सालाना 15 किताबें पढ़नेवाला इंग्लैंड, 14 किताबें पढ़नेवाला फ्रांस और 13 किताबें पढ़नेवाला इटली, पढ़ने के मामले में, भारत से पीछे है। इतना ही नहीं, भारत में लोग प्रतिदिन 7 घंटे और वार्षिक 352 घंटे पढ़ते हैं। अध्ययन की यह कालावधि भी अमेरिका से मामूली रूप से कम है। World Culture Score Index के अनुसार भी भारत में लोग अन्य देशों के मुकाबले कहीं अधिक पढ़ते हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार भारत के लोग प्रति सप्ताह औसान 10.4 घंटे पढ़ते हैं, जबकि अमेरिका, इंग्लैंड, जापान आदि देशों में लोग इसका आधा समय भी किताब नहीं पढ़ते हैं।
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रिपोर्ट सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली किताबों का भी जिक्र करती है। उसके अनुसार सबसे ज़्यादा पढ़ी जानेवाली किताब बाइबिल है, उसके बाद कुरान फिर हॉरी पॉटर सीरीज और इसके बाद चौथे नंबर पर, आश्चर्याजक रूप से, The Questions from Mao Tse Tung है।
सर्वाधिक पसंदीदा किताबों की इस सूची से लोगों की मानसिकता का भी पता चलता है कि दुनिया में सबसे ज़्यादा लोग, इस वैज्ञानिक और संकटग्रस्त समय में भी धार्मिक पुस्तकों के वाचन में लगे हैं। भारत में धार्मिकता उफान पर है। लेकिन उफनती हुई धार्मिकता के बीच भी लोग यहाँ धार्मिक पुस्तकों का वाचन बहुत कम करते हैं। हैरी पॉटर सीरीज को पढ़ना काल्पनिक दुनिया में विचरण करना और मनोरंजन करना है। धार्मिक पुस्तकों के वाचन के बाद सबसे अधिक लोग काल्पनिकता और मनोरंजन में वक्त व्यतीत करते हैं। लेकिन चौथे नंबर पर अध्यक्ष माओ से प्रश्न है। इसका मतलब है कि दुनिया में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो समाज को, राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था को और परिवर्तन की गतिकी को समझना चाहते हैं।
लेकिन मेरा आश्चर्य भारत के पढ़ाकू होने के सन्दर्भ को लेकर था। जब मैं अपने चारों ओर देखता हूँ तो अक्सर लोग ह्वाट्सऐप, फेसबुक, इंस्टाग्राम को देखते हुए और यूट्यूब को सुनते हुए समय दिखते हैं। अब तो लोगों में अख़बार पढ़ने का प्रचलन भी समाप्त हो रहा है, वेब पोर्टल पर पढ़ने का भी। उसकी अपेक्षा समाचार भी यूट्यूब से ही जानते हैं। अधिकतर अर्थों में ह्वाट्सऐप, फेसबुक, यूट्यूब आदि पर समय व्यतीत करने को पढ़ना नहीं कह सकते हैं। वे किताबें तो हैं ही नहीं। और, यहाँ बात किताबों के पढ़ने की हो रही है। सोशल मीडिया ने ऐसा जाल पसार दिया है कि जो लोग पहले किताबों का कीड़ा हुआ करते थे, उनमें भी कई अब सोशल मीडिया में उलझ गए हैं। पढ़ना-लिखना सोशल मीडिया ही बनकर रह गया है। तो फिर पढ़ता कौन है?
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पहले तो मैंने जानने की कोशिश की कि भारत में आख़िर कितने लोग हैं, जो पढ़-लिख सकते हैं और किताबें पढ़ने में उनकी अभिरुचि हो सकती है। तो Comprehensive Annual Modular Survey2024 से पता चला कि 15 वर्ष और उससे अधिक की औपचारिक शिक्षा प्राप्त करनेवाले लोगों में शहरी पुरुष महज 11.2% हैं और शहरी महिलाएँ 9.7% हैं। ग्रामीण पुरुष तो 8.5% और महिलायें 6.4% ही हैं। हालाँकि यह रिपोर्ट जुलाई, 2022 से जून, 2023 के बीच की है। लेकिन एक साल में तस्वीर कुछ बदली नहीं है। दूसरे अध्ययन भी


देखें NFHS 5के स्क्रीनशॉट का रेखांकित अंश
लगभग इसी तथ्य की पुष्टि करते हैं। NFHS 5 का विश्लेषण करने पर भी इसी के आसपास का आँकड़ा मिलता है। उसके अनुसार देश में 10-11 साल तक की औपचारिक शिक्षा प्राप्त करनेवाले पुरुष महज 13% और महिलाएँ 10% ही हैं। 10-11 साल तक की औपचारिक शिक्षा को मैट्रिक तक पढ़ना माना जा सकता है। यह अविश्वसनीय प्रतीत होता है, परंतु यही सच है।
एक ओर तो 10-12 प्रतिशत लोग ही मैट्रिक तक पढ़े हुए हैं, दूसरी ओर कोढ़ पर खाज यह कि जितने लोग डिग्रीधारी हैं, उनमें भी पढ़-लिख सकने वाले लोगों का प्रतिशत और भी कम है। ‘असर’ की रिपोर्ट हर साल यही बात बताती है। तो प्रश्न फिर से वहीं पर अटकता है कि जहाँ इतने कम लोग पढ़े-लिखे हों और उनके पढ़ने का स्तर इतना निम्न हो कि वे बमुश्किल दुकानों के नाम पढ़ पाते हों और लिखने के नाम पर किसी तरह टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में अपना नाम लिख पाते हों, जिनके लिए तय है कि वे किताबें नहीं ही पढ़ते होंगे। तो पढ़नेवाले देशों में भारत दूसरे नंबर पर कैसे है?
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यह जानने के लिए यह जानना जरूरी था कि प्रकाशक किस तरह की किताबें अधिक प्रकाशित करते हैं ताकि पढ़नेवाले समूह की पहचान की जा सके। हालाँकि प्रकाशक या इंडस्ट्री एसोसिएशन ब्लैक मार्केटिंग के कारण सटीक आँकड़ा उपलब्ध नहीं कराते हैं। फिर भी नीलसन बुक डेटा और फेडरेशन ऑफ़ इंडिया पब्लिशर्स के द्वारा प्रदत्त आँकड़ों के आधार पर ‘फ्रैंकफर्ट वीक: भारतीय पुस्तक बाजार पर एक नयी रिपोर्ट’ के अनुसार भारत में क़रीब 90,000 पुस्तकें प्रतिवर्ष प्रकाशित होती हैं, जिनमें 71% पुस्तकें स्कूली शिक्षा से संबंधित होती हैं। देश के केंद्रीय और राज्य सरकार के विद्यालयों में लगभग 25 करोड़ बच्चे पढ़ रहे हैं। उनके लिए छपनेवाली पाठ्यपुस्तकें, पासपोर्ट, गेसपेपर, क्वेश्चन बैंक आदि का प्रतिशत 71% है। उच्च शिक्षा से संबंधित किताबों का प्रतिशत 25% है। देश में उच्च शिक्षा में करीब साढ़े चार करोड़ छात्र पढ़ते हैं। उनकी पाठ्यपुस्तकें, पासपोर्ट, गेसपेपर, प्रतियोगिता परीक्षा की किताबें आदि का प्रतिशत 25% है। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि किताबें पढ़नेवाले 76% लोग वे हैं, जो विभिन्न परीक्षाओं की तैयारी के लिए पढ़ते हैं। ये ही वे लोग हैं, जो सबसे अधिक समय तक भी पढ़ते हैं। बाक़ी 4% में ही साहित्यिक, धार्मिक, वैज्ञानिक, बाल साहित्य आदि छपते भी हैं और पढ़े भी जाते हैं।
इससे यह भी निष्कर्ष निकलता है कि भारत की जनसंख्या ही इतनी ज़्यादा है कि स्कूल-कॉलेज में पढ़नेवाले छात्र ही दुनिया में पढ़नेवालों की संख्या में भारत की भागीदारी का प्रतिशत बढ़ा देते हैं।
इसका यह अर्थ है कि भारत परीक्षा पास करने की तैयारी करनेवाले 29 करोड़ छात्रों के बल पर पढ़ाकुओं का सिरमौर है। दूसरी किताबें शायद ही पढ़ी जाती हैं, दूसरे देशों की तरह धार्मिक, मनोरंजक या बदलाव की किताबें भी बहुत कम।

कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।







[…] भारत पढ़ाकुओं का सिरमौर कैसे है? […]
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