मानो आकाश छूना चाहती थी, लेकिन माँ की ज़िद के कारण उसके पिता मरण पंडित को उसकी शादी महज़ चौदह वर्ष की कच्ची उम्र में ही करनी पड़ी। पिता ने कई बार माँ को समझाने का प्रयास किया कि मानो पहले अपनी पढ़ाई पूरी कर ले, कुछ बन जाए, उसके बाद विवाह करना अधिक उचित होगा। किंतु माँ की हठधर्मिता के आगे उनकी एक न चली। माँ का मानना था कि बेटी पराई संपत्ति होती है, अतः जितनी जल्दी उसका घर बस जाए, उतना ही अच्छा है।
गृहकलह की आशंका से भयभीत होकर मरण पंडित ने एक पंद्रह वर्षीय लड़के से मानो का विवाह निश्चित कर दिया। वह लड़का दसवीं कक्षा का छात्र था और विवाह जैसी जिम्मेदारियों से पूर्णतः अनभिज्ञ था। उस समय मानो भी नौवीं कक्षा में अध्ययनरत थी। लोग कहते हैं कि विवाह ईश्वर की कृपा से होता है और जोड़ियाँ ऊपर से बनकर आती हैं; किंतु मानो और भोनू की जोड़ी ऐसी थी, जिसमें दोनों ही विवाह के महत्व और दायित्वों से अनजान थे।
उस समय उनके घर में न तो टेलीविजन था, न अखबार आता था, और न ही आज की तरह मोबाइल या इंटरनेट का प्रचलन था, जहाँ बच्चे कम उम्र में ही फेसबुक, यूट्यूब या गूगल जैसे माध्यमों से संसार और उसकी वास्तविकताओं को समझ पाते।
भोनू और मानो दम्पति की अपेक्षा मित्रों की तरह अधिक रहते थे। भोनू प्रातः भोर में, जब अंधकार शेष रहता, अपने हमउम्र साथियों के साथ बोरा लेकर चौंड चला जाता और वहाँ से बर्तन बनाने योग्य मिट्टी लाता। फिर कुछ विश्राम कर स्नान करता, भोजन ग्रहण करता और दहेज में मिली अपनी हीरो साइकिल को पुराने कपड़े से साफ कर विद्यालय के लिए निकल जाता।
बारात गमन के समय भोनू की माँ ने उसे समझाया था कि विवाह की रस्मों में जहाँ अवसर मिले, रूठ जाना और जब ससुराल वाले मनाने आएँ, तो अपनी पसंद की वस्तुएँ अवश्य माँग लेना—इसे ही होशियारी कहते हैं, ऐसा करने से रस्म में निखार आता है। भोनू ने वैसा ही किया। उसने सिंदूरदान के समय अपनी पढ़ाई सुचारु रूप से करने के लिए सास-ससुर से एक मेज़ और कुर्सी की माँग की। उसका तर्क था कि मेज़-कुर्सी पर बैठकर पढ़ने से नींद नहीं आती, तन तना रहता है, ऊंघाई भी नहीं आती है। उसकी इस बात पर ससुराल पक्ष के लोग मुस्कराए भी, किंतु उसकी इच्छा का सम्मान करते हुए उन्होंने उसकी माँग पूरी कर दी। बेटी की विदाई के समय अन्य उपहारों के साथ मेज़ और कुर्सी भी भिजवा दी गई।
भोनू के पिता दीना पंडित ने विवाह निश्चित करते समय मानो के पिता से स्पष्ट रूप से कहा था, “लड़का अभी विद्यालय जाता है और विद्यालय पाँच किलोमीटर दूर है। अतः आप दहेज में कुछ दें या न दें, परंतु एक साइकिल अवश्य दे दीजिएगा।”
मरण पंडित की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ नहीं थी, फिर भी उन्होंने अपनी सामर्थ्य से बढ़कर घड़ी, रेडियो, एक सोने की अंगूठी और एक साइकिल दहेज में दी। उसी चमचमाती साइकिल पर, हाथ में दमकती पीली अंगूठी पहने, भोनू बड़े आनंद के साथ विद्यालय जाया करता था। वर्ग में भोनू के वर्ग के विद्यार्थीगण उससे विवाह की सारी घटनाओं को सविस्तार बतलाने का अनुरोध करते थे और भोनू भी अपनी शादी में हुई बातों को बड़े आनंद के साथ बखान करता था। उसके विद्यालय में उसकी कक्षा के सभी छात्र अविवाहित थे; यदि कोई विवाहित था, तो वह केवल भोनू ही था।
कभी-कभी विद्यालय के शिक्षक भी उससे हँसी-हँसी में पूछ बैठते—“भोनू, ससुराल से इस हीरो साइकिल और अंगूठी के अलावा और क्या-क्या मिला?” तब भोनू सरलता से विस्तारपूर्वक विवाह की रस्मों और उपहारों का वर्णन करने लगता। उसकी नादानी भरी बातें सुनकर शिक्षक और छात्र उसके भोलेपन का अनुमान लगाते और मुस्करा उठते।
विवाह के पश्चात मानो की पढ़ाई छूट गई, जबकि विवाह के समय यह तय हुआ था कि तीन वर्ष बाद गौना होगा और तब तक मानो नैहर में रहकर अपनी शिक्षा जारी रखेगी। किंतु इस विषय में भी माँ की ही बात मानी गई और विवाह के अगले ही दिन मानो को ससुराल भेज दिया गया। मानो इस वैवाहिक बंधन में बँधना नहीं चाहती थी; वह पढ़-लिखकर कुछ बनना चाहती थी। परंतु माँ की जिद ने उसे कच्ची उम्र में ही गृहस्थी संभालने के लिए विवश कर दिया।
कहते हैं—“जहाँ चाह, वहाँ राह।” मानो ससुराल तो आ गई, पर उसके साथ एक सुखद बात यह हुई कि उसे अत्यंत समझदार सास मिली। दो-चार दिनों में ही उसकी सास आनंदी देवी ने मानो के भीतर शिक्षा के प्रति गहरी लगन को पहचान लिया। उन्होंने मन-ही-मन उसे बहू नहीं, बल्कि बेटी के रूप में स्वीकार कर लिया और उसी प्रकार उसका पालन करने का निश्चय किया।
आनंदी देवी साधारण शिक्षित होते हुए भी विचारों से अत्यंत उच्च थीं। मानो के ज्ञानार्जन के प्रति अनुराग को देखकर वे प्रसन्न रहती थीं। सास और बहू के बीच संबंध औपचारिक न रहकर माँ-बेटी जैसा स्नेहपूर्ण बन गया था। दोनों अपने-अपने सुख-दुःख आपस में साझा करती थीं। आनंदी देवी मानो की पढ़ाई में हर संभव सहयोग करने लगीं।
मानो भी घर-आँगन के कार्यों को निपटाने के बाद अपने पुश्तैनी बर्तन बनाने के कार्य में सास-ससुर की सहायता कर देती थी। इन सबके पश्चात जो समय बचता, उसे वह पढ़ने-लिखने में लगाती। कभी-कभी वह भोनू के साथ बैठकर भी पढ़ाई करती थी।
भोनू का वास्तविक नाम भानु चन्द्र पंडित था, किंतु बचपन से ही उसके सरल स्वभाव के कारण सब उसे भोनू कहकर पुकारते थे। उसके छोटे भाई भलचन्द्र पंडित का स्वभाव उससे भिन्न था—वह चंचल और चतुर था। उनकी एक छोटी बहन भी थी, जो भलचन्द्र से भी छोटी थी—उसका नाम मोनी था; अत्यंत सुंदर और सुशील।
दीना पंडित आर्थिक रूप से भले ही कमजोर थे, किंतु अपने बच्चों की शिक्षा के प्रति अत्यंत सजग थे। उनका मानना था कि विद्या एक अनमोल आभूषण है—माता-पिता अपने बच्चों को कुछ दें या न दें, परंतु यह आभूषण अवश्य देना चाहिए।
प्रारंभ में तीनों भाई-बहन साथ-साथ विद्यालय जाते थे। रास्ते में ही भलचन्द्र और मोनी का विद्यालय पड़ता था, अतः प्रतिदिन भलचंद्र और मोनी अपने-अपने विद्यालय पर रूक जाते थे और भोनू आगे अपने विद्यालय की ओर बढ़ जाता। किंतु जब से उसे दहेजुआ साइकिल मिली, तब से वह दोनों को साइकिल पर आगे-पीछे बैठाकर आनंदपूर्वक उनके विद्यालय छोड़ता और फिर अपने विद्यालय के लिए प्रस्थान करता।
मानो की सास जब भी बाज़ार जाती, वह मानो से अवश्य पूछती कि उसके लिए कुछ लाना है या नहीं। मानो कभी अपने लिए कुछ नहीं मँगवाती थी—सिवाय किताब, कॉपी, कलम और पेंसिल के। आनंदी देवी भी हर बार उसके लिए ये आवश्यक वस्तुएँ खोज-खोजकर अवश्य ले आती थीं। उन्होंने एक स्कूल के मास्टर साहब से मिलकर मानो के मैट्रिक परीक्षा का फ़ॉर्म भरने की व्यवस्था भी कर दी थी।
जब मानो और भोनू साथ बैठकर पढ़ते, तो दोनों पूरे मनोयोग से अध्ययन करते। किंतु कभी-कभी उनके मन संबंधों की गहराई में उतर जाते और उनके हृदय में प्रेम की हल्की-सी चिंगारी सुलग उठती। पर उस भाव को शब्द कौन देता? भोनू स्वभाव से अत्यंत संकोची था; वह चाहकर भी पहल नहीं कर पाता था। मानो हल्की-सी मुस्कान बिखेर देती और भोनू भी प्रसन्न होकर मुस्कुरा उठता—यहीं से उनके भावों की शुरुआत होती थी। भोनू की माँ भी उन्हें एकांत और शांत स्थान पर जाकर पढ़ने की सलाह देकर अपने मातृत्व धर्म का निर्वाह करती थीं। धीरे-धीरे, दो वर्षों के अंतराल में, दोनों एक-दूसरे के प्रति आकर्षित होने लगे और अपने संबंध की पवित्रता को बनाए रखते हुए उसे सहेजने लगे। इस बीच भोनू इंटर पास कर चुका था और मानो भी प्राईवेट से परीक्षा देकर मैट्रिक उत्तीर्ण हो गई थी।
दीना पंडित के घर की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ नहीं थी। पुश्तैनी पेशे के साथ थोड़ी-सी ज़मीन थी, जिसकी उपज परिवार के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त नहीं थी। मिट्टी के बर्तनों का चलन भी धीरे-धीरे कम होता जा रहा था; केवल विवाह-शादी या पर्व-त्योहारों के अवसर पर ही माँग बढ़ती, अन्यथा व्यापार मंदा ही रहता था। भोनू अपने पिता के कार्य में निरंतर हाथ बँटाता और शेष समय पढ़ाई में लगाता। परिवार में प्रेम और सौहार्द का वातावरण था। जो कुछ था, उसी में संतोषपूर्वक जीवन यापन होता था—हाय-तौबा या शिकायत का कोई स्थान नहीं था।
दीना पंडित अब वृद्ध हो चले थे; शरीर भी शिथिल हो चुका था। पहले जैसी मेहनत अब संभव नहीं रह गई थी, फिर भी वे किसी तरह जीवन-यापन में लगे हुए थे। आनंदी देवी भी अब प्रायः अस्वस्थ रहने लगी थीं।
भोनू अपनी पढ़ाई चार वर्ष पहले ही बी.ए. तक करके छोड़ चुका था, जबकि मानो इंटरमीडिएट के बाद घर-गृहस्थी के कार्यों में लग गई थी। वह चूल्हा-चौका का कार्य पूरी तत्परता से करती, सास की सेवा में भी कोई कमी नहीं रखती, और जो समय बचता, उसे अध्ययन में लगाती। वह भोनू से विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की पुस्तकें मँगवाती; कभी-कभी सास-ससुर भी उसके लिए पुस्तकें ले आते थे।
मानो को लेखन में विशेष रुचि थी। वह तरह-तरह की कहानियाँ और कविताएँ लिखती तथा उन्हें विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन हेतु भेजती रहती थी। उसकी एक-दो सामाजिक कहानियाँ एक प्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशित भी हो चुकी थीं, जिससे उसका उत्साह और बढ़ गया था।
ईश्वर की कृपा से भलचंद्र स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण कर शिक्षा विभाग में लिपिक पद पर सरकारी नौकरी करने लगा था। किंतु माँ की बीमारी का उपचार और बहन मोनू के विवाह की जिम्मेदारी—दोनों ही भाइयों के सामने गंभीर चुनौती के रूप में उपस्थित थीं। भोनू अपने पिता के व्यवसाय को संभालने में लगा था, जबकि भलचंद्र अपनी आय में से थोड़ी-थोड़ी बचत करके धन एकत्र कर रहा था और आवश्यकता पड़ने पर ऋण लेकर अपनी छोटी बहन के विवाह के लिए एक उपयुक्त वर की तलाश में था।
एक दिन संध्या समय भलचंद्र ने अपने पिता से कहा—
“बाबूजी, मोनू अब विवाह योग्य हो गई है। अब उसका विवाह करना आवश्यक हो गया है।”
“हाँ बेटा, मैं भी यही सोच रहा हूँ, पर न तो पैसा है और न कोई अलग से थाती,” दीना पंडित ने चिंतित स्वर में कहा।
“मैं हूँ न, बाबूजी! थाती की क्या आवश्यकता है? मुझे ही अपनी थाती समझिए,” भलचंद्र ने दृढ़ता से उत्तर दिया। यह सुनकर दीना पंडित के मन को काफी सुकून मिला।
कुछ क्षण मौन रहने के बाद वे बोले, “तुम पर कितना बोझ डालूँ, बेटा! यदि भोनू को भी कोई अच्छा काम मिल जाता तो…” अपने मन की व्यथा उन्होंने छोटे पुत्र के सामने रख दी।
“बाबूजी, आप निराश मत होइए,” भलचंद्र ने समझाते हुए कहा, “क्या भैया आमदनी नहीं करते? दिन-रात भैया और भाभी कड़ी मेहनत करते हैं, हम सबका पूरा ध्यान रखते हैं। केवल पैसा ही सब कुछ नहीं होता, बाबूजी।”
दीना पंडित ने धीमे स्वर में कहा, “मेरा मतलब यह है, बेटा, कि बी.ए. पास करने के बाद भी वह मिट्टी के बर्तन बनाने का काम करता है—मिट्टी गूँधता है, चाक चलाता है… यह सोचकर मुझे अच्छा नहीं लगता।”
भलचंद्र मुस्कुराया, “बाबूजी, आप आवश्यकता से अधिक सोचते हैं। कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता। अपना पुश्तैनी काम करना तो गर्व की बात है। हाँ, मैं आपको एक और बात बताना चाहता था—मैंने मोनू के लिए एक योग्य लड़का देखा है। यदि आप अनुमति दें तो आगे बात बढ़ाऊँ।”
“कौन है वह?” दीना पंडित उत्सुकता से खटिया पर सीधा बैठते हुए बोले।
“आप जानते होंगे, अलाबलपुर के वाल्मीकि पंडित को। उनका बड़ा बेटा है—दीपक पंडित। वह मेरे ही कार्यालय में कार्यरत है। स्वभाव से बहुत ही सज्जन और सुसंस्कृत लड़का है।”
दीना पंडित को यह सुनकर विश्वास नहीं हुआ। वे सोचने लगे—कहाँ वाल्मीकि पंडित और कहाँ हम! क्या वे अपने बेटे का विवाह हमारे यहाँ करेंगे? और यदि कर भी दें, तो हम उनकी अपेक्षाएँ कैसे पूरी कर पाएँगे?
उनकी मनःस्थिति को भाँपते हुए भलचंद्र ने पूछा, “क्या सोच रहे हैं, बाबूजी?”
“मुझे लगता है, बेटा, वे हमारे यहाँ संबंध करना नहीं चाहेंगे, और यदि करेंगे भी, तो उनकी माँगों को पूरा करना हमारे बस में नहीं होगा,” दीना पंडित ने अपनी शंका प्रकट की।
भलचंद्र ने आत्मविश्वास से कहा, “आप केवल हाँ कह दीजिए, बाकी सब मुझ पर छोड़ दीजिए।”
“तुम इतनी निश्चितता से कैसे कह सकते हो?”
“इसलिए, बाबूजी, कि कल दीपक के पिता जी किसी कार्य से हमारे कार्यालय आए थे। उन्होंने स्वयं दीपक के सामने मुझसे कहा कि उन्होंने आपकी बेटी को एक समारोह में देखा था—वह बहुत सुंदर और सुशील है। जिस घर में जाएगी, उसे स्वर्ग बना देगी। उन्होंने तो उसे साक्षात लक्ष्मी तक कहा।”
“अरे! क्या सचमुच वाल्मीकि पंडित ऐसा कह रहे थे? मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा,” दीना पंडित ने आश्चर्य से भलचंद्र की ओर देखा।
“हाँ, बाबूजी,” भलचंद्र ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया।
“तब तो उनसे बात करनी ही चाहिए। मैं कल ही जाकर उनके बेटे के लिए मोनू का हाथ माँगता हूँ।”
“जी, बाबूजी। आप पहले पहल कीजिए, मैं भी कल दीपक से इस विषय में बात करूँगा।”
यह बातचीत घर के बाहर, जहाँ चाक रखा था, वहीं चल रही थी। मोनू गीली मिट्टी का लोंदा चाक के पास रखते हुए बोली, “बाबूजी, इस मिट्टी से अभी कुछ मत बनाइए। भोनू भैया कुछ नए तरह के बर्तन बनाएँगे, जिनकी आजकल बाज़ार में बहुत माँग है।”
मोनू के आते ही भलचंद्र और दीना पंडित चुप हो गए, परंतु मोनू को कुछ आभास हो गया था। दरअसल, इस विषय में भलचंद्र अपनी भाभी से चर्चा कर चुका था, और मानो ने यह बात मोनू को बता दी थी।
जब भोनू घर लौटा, तो दीना पंडित ने उसे मोनू के विवाह प्रस्ताव के विषय में बताया। यह सुनकर वह अत्यंत प्रसन्न हुआ। अगले दिन जब वे लोग बातचीत के लिए जाने लगे, तो भोनू को भी साथ चलने के लिए कहा गया। भोनू घर में भले ही सरल और संकोची था, किंतु बाहर के लोगों से संवाद करने में वह अत्यंत कुशल था।
वाल्मीकि पंडित ने बिना किसी शर्त के अपने पुत्र दीपक का विवाह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। शीघ्र ही मोनू और दीपक का विवाह संपन्न हो गया, और वह अपने ससुराल चली गई।
समय के साथ आनंदी देवी की स्थिति दिन-प्रतिदिन बिगड़ती चली गई। अब उनकी एक ही इच्छा रह गई थी—अपने छोटे बेटे की नई बहू को अपनी आँखों से देखना। शीघ्र ही उनकी यह इच्छा भी पूरी हो गई। एक सुसंस्कृत परिवार से भलचंद्र के लिए रिश्ता आया और दीना पंडित ने विवाह के लिए सहमति दे दी। पुत्र की सहमति लेकर ही यह निर्णय लिया गया।
भलचंद्र और शीला का विवाह धूमधाम से संपन्न हुआ। किंतु विवाह के मात्र सोलहवें दिन ही आनंदी देवी ने इस संसार से विदा ले लीं—मानो घर की लक्ष्मी ही चली गई हो।
पूरा परिवार शोक-सागर में डूब गया, पर सबसे अधिक आघात मानो को पहुँचा। सास के रूप में उसने केवल एक अभिभावक ही नहीं, बल्कि एक स्नेहमयी माँ को खो दिया था।
अभी मानो अपनी सास की दुखद मृत्यु के आघात से उबर भी न पाई थी कि नियति ने उस पर एक और वज्रपात कर दिया। किसी अज्ञात बीमारी ने उसके पति भोनू को इस तरह अपने शिकंजे में लिया कि देखते-ही-देखते वह काल-कवलित हो गया। मानो का संसार मानो एक ही क्षण में उजड़ गया। उसकी कोख में पल रहा अजन्मा शिशु और जीवनसाथी का असमय बिछोह—इन दोनों ने उसे भीतर तक झकझोर दिया था। वह सचमुच अंदर से टूट चुकी थी।
कहा भी गया है कि दुःख की घड़ी में ही मनुष्य के धैर्य और साहस की वास्तविक परीक्षा होती है। मानो के जीवन में भी यही परीक्षा का समय था। उसके सिर पर अब केवल उसके वृद्ध और लाचार ससुर का साया था, और उन्हीं की देखभाल का समस्त दायित्व भी उसके कंधों पर आ पड़ा था। भलचंद्र की बदली अन्यत्र हो चुकी थी और वह शीला के साथ वहीं रहने लगा था। घर में अब मात्र दो प्राणी रह गए थे—एक नवयुवती विधवा बहू और दूसरा असहाय, वृद्ध ससुर।
परिस्थितियाँ जितनी विकट थीं, मानो का संकल्प उतना ही दृढ़ होता गया। उसने अपने मनोबल को टूटने नहीं दिया। एक ओर गर्भ में पलता शिशु, दूसरी ओर वृद्ध ससुर की सेवा—इन दोनों के बीच उसने अपने जीवन का एक नया मार्ग खोज ही लिया। अपने दुःख और संवेदनाओं को उसने अपनी लेखनी का आधार बनाया। धीरे-धीरे उसकी लेखनी इतनी सशक्त और प्रभावशाली होती चली गई कि नामी-गिरामी प्रकाशक स्वयं उसके द्वार पर आने लगे। उसे न केवल आर्थिक समृद्धि मिलने लगी, बल्कि समाज में प्रतिष्ठा और सम्मान भी प्राप्त होने लगा।
किन्तु बाहरी सफलता के इस उजाले के पीछे उसके अंतर्मन में पीड़ा का अथाह सागर लहराता रहता था। वह अक्सर सोचती—”आज मेरी इस सफलता को देखने के लिए न तो मेरी सास जीवित हैं और न ही मेरे पति, जो वास्तव में इस सम्मान और सुख के सच्चे अधिकारी थे।” यह विचार उसके हृदय को बार-बार छलनी कर देता।
उसके ससुर अपनी बहू की उन्नति और बनती हुई पहचान को देखकर अत्यंत प्रसन्न होते थे। यद्यपि दादी आनन्दी देवी अपने पौत्र को गोद में खिलाने का सौभाग्य प्राप्त न कर सकीं, फिर भी दादा ने अपने पौत्र के साथ चार वर्षों तक स्नेह और आनंद के अनगिनत पल बिताए। अंततः वे भी इस संसार को छोड़कर स्वर्ग सिधार गए।
अब मानो के जीवन का केंद्र और उद्देश्य केवल उसका पुत्र ही रह गया था। वही उसका सहारा था, वही उसकी शक्ति, और वही उसके जीवन का सर्वस्व। अपने अतीत के घावों को हृदय में संजोए, वह अपने पुत्र के उज्ज्वल भविष्य के लिए निरंतर संघर्ष करती रही—एक सशक्त, साहसी और प्रेरणादायी नारी के रूप में।

प्राचार्य-सह- संचालक, एस.एन.मेमोरियल स्कूल, न्यु जगनपुरा,पटना एवं साहित्यकार







